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सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बंद कमरे में जातिसूचक अपशब्द पर SC/ST एक्ट तभी, जब ‘पब्लिक व्यू’ हो

Apurva Choudhary 2026-08-20 21:42:37
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बंद कमरे में जातिसूचक अपशब्द पर SC/ST एक्ट तभी, जब ‘पब्लिक व्यू’ हो
सुप्रीम कोर्ट ने रामकृष्ण चौहान मामले में कहा कि SC/ST एक्ट की धाराओं 3(1)(r) और 3(1)(s) के लिए कथित जातिसूचक अपमान ‘पब्लिक व्यू’ में होना जरूरी है। बंद कमरे में सार्वजनिक मौजूदगी या पहुंच नहीं होने पर इन धाराओं के आवश्यक तत्व प्रथमदृष्टया पूरे नहीं होते। 

Location:नई दिल्ली
Date:20 अगस्त 2026
By: Apurva Choudhary 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बंद कमरे में जातिसूचक अपशब्द पर SC/ST एक्ट तभी, जब ‘पब्लिक व्यू’ हो
सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। रामकृष्ण चौहान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में अदालत ने कहा कि अधिनियम की धाराओं 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध के लिए कथित जातिगत अपमान या जाति के नाम से गाली ऐसी जगह पर होनी चाहिए जो ‘पब्लिक व्यू’ में हो। 
दो सदस्यीय पीठ में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता शामिल थे। अदालत ने इस मामले में SC/ST एक्ट के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया, जबकि अन्य आपराधिक आरोपों से संबंधित कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी। 

क्या हुआ?
मामला एक स्कूल से जुड़े विवाद का था। अभियोजन के अनुसार, दो छात्रों के बीच विवाद के बाद उनके पिता स्कूल मैनेजर से मिलने पहुंचे। आरोप लगाया गया कि बातचीत के दौरान विवाद बढ़ा और मारपीट के साथ जातिसूचक अपशब्द कहे गए।
इस मामले में आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ SC/ST एक्ट की धाराओं 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत भी एफआईआर दर्ज हुई थी। चार्जशीट दाखिल होने के बाद विशेष अदालत ने मामले का संज्ञान लिया।
आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस कार्रवाई को चुनौती दी, लेकिन राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल क्या था?
अदालत के सामने प्रमुख सवाल यह था कि कथित जातिसूचक अपशब्द जिस स्थान पर कहे गए, क्या वह कानून के अर्थ में ‘पब्लिक व्यू’ में था।
SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) जानबूझकर किसी SC या ST सदस्य का अपमान या धमकी देकर उसे अपमानित करने से संबंधित है, जबकि धारा 3(1)(s) जाति के नाम से गाली देने से संबंधित है। दोनों प्रावधानों में ‘किसी ऐसे स्थान पर जो पब्लिक व्यू में हो’ होना महत्वपूर्ण कानूनी तत्व है। 

‘पब्लिक व्यू’ का मतलब क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पहले के फैसलों पर भरोसा किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘पब्लिक प्लेस’ और ‘प्लेस विदिन पब्लिक व्यू’ एक ही बात नहीं हैं।
किसी निजी स्थान पर हुई घटना भी ‘पब्लिक व्यू’ में आ सकती है, अगर वहां मौजूद घटना को आम लोग देख या सुन सकते हों। इसके विपरीत, किसी बंद कमरे या चारदीवारी के भीतर ऐसी जगह पर हुई घटना, जहां जनता मौजूद नहीं थी और उसे देखने-सुनने का सार्वजनिक अवसर नहीं था, इस कानूनी कसौटी को पूरा नहीं करती। 
यही सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट ने पहले हाइटेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य और बाद में करुप्पुदयार बनाम राज्य जैसे मामलों में भी स्पष्ट किया था। 

स्कूल परिसर में गवाह होने के बावजूद क्या हुआ?
मामले में स्कूल के शिक्षकों के बयान भी रिकॉर्ड पर थे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि उनके बयान मुख्य रूप से विवाद और हाथापाई से संबंधित थे।
अदालत के अनुसार, किसी गवाह का स्कूल परिसर में मौजूद होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि वह कथित जातिसूचक शब्दों के बोले जाने के समय उसी कमरे में मौजूद था या उसने उन्हें सुना था। 
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि एफआईआर और उपलब्ध बयानों में आरोपी द्वारा कथित जातिसूचक अपशब्द कहे जाने का पर्याप्त विशिष्ट विवरण सामने नहीं आया था। 

क्या अदालत ने कहा कि बंद कमरे में जातिसूचक गाली अपराध नहीं है?
इस फैसले को इस तरह पढ़ना सही नहीं होगा कि बंद कमरे में जातिसूचक अपमान हर परिस्थिति में कानूनी अपराध नहीं हो सकता।
अदालत ने विशेष रूप से SC/ST एक्ट की संबंधित धाराओं के आवश्यक तत्वों पर फैसला दिया। उसका निष्कर्ष इस मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड और कथित घटना के स्थान से जुड़ा था।
यानी किसी घटना के दूसरे तथ्य, गवाह, परिस्थितियां और अन्य लागू कानून अलग कानूनी परिणाम पैदा कर सकते हैं।

SC/ST एक्ट की पूरी कार्यवाही क्यों रद्द हुई?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संज्ञान के चरण में अदालत को सबूतों का मुकदमे की तरह विस्तृत मूल्यांकन नहीं करना होता। लेकिन जिस अपराध का आरोप लगाया गया है, उसके बुनियादी कानूनी तत्व रिकॉर्ड पर प्रथमदृष्टया दिखाई देने चाहिए।
इस मामले में अदालत को यह आधार पर्याप्त नहीं लगा कि कथित जातिसूचक अपशब्द ‘पब्लिक व्यू’ में कहे गए थे। साथ ही उपलब्ध सामग्री में आरोपी से संबंधित विशिष्ट जातिसूचक कथन का पर्याप्त आधार भी नहीं मिला। 
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को अलग करते हुए SC/ST एक्ट के तहत कार्यवाही समाप्त कर दी।

क्या बाकी आपराधिक मामला भी खत्म हो गया?
नहीं। यह इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू है।
सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत लगाए गए आरोपों से संबंधित कार्यवाही को रद्द किया। लेकिन मारपीट और अन्य सामान्य आपराधिक धाराओं से जुड़े मामले को जारी रखने की अनुमति दी। 
इसलिए इस फैसले को आरोपी की सभी आपराधिक जिम्मेदारियों से पूर्ण मुक्ति के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।

पहले के फैसलों से क्या संबंध है?
‘पब्लिक व्यू’ की शर्त सुप्रीम कोर्ट के लिए नई कानूनी अवधारणा नहीं है।
स्वर्ण सिंह बनाम राज्य, हाइटेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य और करुप्पुदयार बनाम राज्य जैसे फैसलों में अदालत ने इस शर्त की व्याख्या की है। करुप्पुदयार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से कहा था कि संबंधित स्थान ऐसा होना चाहिए जहां जनता कथित घटना को देख या सुन सके। 
मई 2026 के एक अन्य सुप्रीम कोर्ट फैसले में भी अदालत ने SC/ST एक्ट के संदर्भ में ‘पब्लिक व्यू’ की इसी आवश्यकता पर विचार किया था। 

इस फैसले का कानूनी महत्व क्या है?
फैसले का महत्व इस बात में है कि अदालत ने एक बार फिर यह रेखांकित किया कि किसी विशेष दंडात्मक प्रावधान को लागू करने के लिए कानून में निर्धारित सभी आवश्यक तत्वों का प्रथमदृष्टया मौजूद होना जरूरी है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि SC/ST एक्ट की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर कर दी गई है। बल्कि अदालत ने संबंधित धाराओं की वैधानिक भाषा और पहले से स्थापित न्यायिक व्याख्या को लागू किया है।
साथ ही ‘पब्लिक व्यू’ को केवल ‘पब्लिक प्लेस’ समझना भी गलत होगा। निजी परिसर भी परिस्थितियों के आधार पर पब्लिक व्यू में हो सकता है, जबकि सार्वजनिक संस्थान का कोई बंद कमरा हर स्थिति में अपने आप ‘पब्लिक व्यू’ नहीं बन जाता। 

आगे क्या समझना जरूरी है?
इस फैसले के बाद SC/ST एक्ट से जुड़े मामलों में घटना के स्थान, वहां मौजूद लोगों और कथित अपशब्दों के प्रत्यक्ष ज्ञान से जुड़े तथ्यों का महत्व बना रहेगा।
किसी शिकायत में केवल जातिसूचक शब्द इस्तेमाल होने का आरोप पर्याप्त नहीं माना जा सकता, यदि जिस विशेष धारा के तहत कार्रवाई की जा रही है उसके अन्य आवश्यक तत्व प्रथमदृष्टया सामने नहीं आते।
दूसरी ओर, यदि कथित घटना ऐसी जगह हुई हो जहां जनता उसे देख या सुन सकती थी, तो केवल यह तथ्य कि स्थान निजी संपत्ति है, अपने आप SC/ST एक्ट की संबंधित धाराओं को बाहर नहीं करता। 

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Apurva Choudhary

Apurva Choudhary

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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