भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए कानूनी ढांचा मौजूद है। लिविंग विल मरीज को भविष्य के इलाज संबंधी निर्देश देने का अधिकार देती है। 2026 के फैसले ने प्रक्रिया स्पष्ट की, लेकिन जागरूकता, मेडिकल तैयारी और परिवारों की समझ अब भी बड़ी चुनौती हैं। यही वजह है कि एंड-ऑफ-लाइफ योजना जरूरी बनती जा रही है।
नई दिल्ली | 20 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
भारत में एंड-ऑफ-लाइफ मेडिकल फैसलों पर सुप्रीम कोर्ट का रुख अब पहले से ज्यादा स्पष्ट है। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में जीवनरक्षक मेडिकल ट्रीटमेंट, जिसमें क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन शामिल था, हटाने की अनुमति दी। अदालत ने इसे मरीज के गरिमापूर्ण जीवन और पेलिएटिव केयर के अधिकार से जोड़ा।लेकिन इस फैसले के साथ एक दूसरा सवाल भी सामने आता है। अगर किसी व्यक्ति को भविष्य में ऐसी स्थिति का सामना करना पड़े, जहां वह खुद अपने इलाज के बारे में फैसला लेने की स्थिति में न रहे, तो उसकी इच्छा कौन बताएगा?
यहीं लिविंग विल, जिसे कानूनी भाषा में एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव कहा जाता है, महत्वपूर्ण हो जाती है।
लिविंग विल सामान्य वसीयत से अलग दस्तावेज है। इसमें व्यक्ति पहले से यह दर्ज करता है कि अगर भविष्य में वह निर्णय लेने की क्षमता खो दे, तो किन परिस्थितियों में जीवनरक्षक मेडिकल ट्रीटमेंट को जारी रखा जाए या रोका जाए। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव को कानूनी मान्यता दी थी। अदालत ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने के अधिकार में गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी शामिल है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत में किसी व्यक्ति को जानबूझकर घातक इंजेक्शन देकर मृत्यु देने की अनुमति मिल गई है। एक्टिव यूथेनेशिया और पैसिव यूथेनेशिया के बीच कानूनी अंतर महत्वपूर्ण है। पैसिव यूथेनेशिया के संदर्भ में जीवनरक्षक इलाज को रोकना या वापस लेना उस मेडिकल हस्तक्षेप को समाप्त करना है जो मृत्यु की प्राकृतिक प्रक्रिया को लंबे समय तक टाल रहा हो। 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी अंतर को फिर स्पष्ट किया।
हरीश राणा 2013 में गंभीर ब्रेन इंजरी के बाद परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में चले गए थे। लंबे समय तक उन्हें क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन दिया जाता रहा। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने उनके मामले में मेडिकल ट्रीटमेंट, जिसमें सीएएनएच शामिल था, वापस लेने की अनुमति दी। अदालत ने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को पेलिएटिव और एंड-ऑफ-लाइफ केयर के तहत प्रक्रिया लागू करने का निर्देश दिया। फैसले का एक अहम पहलू यह था कि अदालत ने सीएएनएच को केवल सामान्य भोजन या बुनियादी देखभाल नहीं माना। पीईजी ट्यूब के जरिए पोषण और हाइड्रेशन देने में लगातार मेडिकल इंटरवेंशन, निगरानी और संभावित जटिलताएं शामिल होती हैं। इसलिए इसे मेडिकल ट्रीटमेंट के दायरे में माना गया।
नहीं। यही वह बिंदु है जहां इस मुद्दे को लेकर सबसे ज्यादा गलतफहमी होती है।
सुप्रीम कोर्ट का ढांचा किसी मरीज या परिवार को जीवनरक्षक इलाज मनमाने ढंग से बंद करने की खुली अनुमति नहीं देता। मरीज की मेडिकल स्थिति, बीमारी की अपरिवर्तनीयता, उपचार की प्रकृति और उसके हितों का आकलन जरूरी है। असमर्थ मरीजों के मामलों में मेडिकल बोर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण है। 2026 के फैसले ने प्राइमरी और सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड की प्रक्रिया को और स्पष्ट किया तथा मरीज के सर्वोत्तम हित को केंद्रीय कसौटी बनाया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इलाज हटाने का अर्थ मरीज को छोड़ देना नहीं है। क्योरिटिव ट्रीटमेंट से पेलिएटिव और एंड-ऑफ-लाइफ केयर की तरफ संक्रमण होना चाहिए। मरीज को मेडिकल निगरानी और आराम आधारित देखभाल मिलती रहनी चाहिए।
अंतिम चरण की बीमारी में परिवार अक्सर अचानक ऐसे फैसलों के सामने खड़ा होता है जिनके लिए उसने पहले कोई तैयारी नहीं की होती।
किस इलाज को जारी रखना है, किस मेडिकल इंटरवेंशन का फायदा नहीं मिल रहा, मरीज की अपनी इच्छा क्या थी और परिवार किस आधार पर फैसला करे, ऐसे सवाल तनावपूर्ण स्थिति में सामने आते हैं। लिविंग विल इस प्रक्रिया में मरीज की पहले से व्यक्त इच्छा को रिकॉर्ड पर लाने का माध्यम बनती है। इससे परिवार के सदस्यों पर अकेले यह अनुमान लगाने का दबाव कम हो सकता है कि मरीज ऐसी स्थिति में क्या चाहता।
लेकिन लिविंग विल भी कोई ऐसा दस्तावेज नहीं है जिसे अस्पताल में दिखाते ही इलाज स्वतः बंद हो जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए मेडिकल और संस्थागत सुरक्षा उपाय निर्धारित किए हैं।
सामान्य वसीयत मृत्यु के बाद संपत्ति और दूसरे मामलों से जुड़ी इच्छाओं को दर्ज करती है। लिविंग विल व्यक्ति के जीवित रहते उस स्थिति के लिए निर्देश देती है जब वह स्वयं मेडिकल निर्णय लेने की क्षमता खो दे। यानी एक दस्तावेज मृत्यु के बाद के मामलों से संबंधित होता है, जबकि दूसरा गंभीर बीमारी या अक्षम अवस्था में मेडिकल ट्रीटमेंट से जुड़े फैसलों को प्रभावित करता है। इसीलिए परिवारों को दोनों दस्तावेजों की कानूनी भूमिका अलग-अलग समझनी चाहिए।
उपलब्ध स्रोत सामग्री में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि अंतिम चरण की बीमारी से जूझ रहे मरीजों के परिवारों के पास अक्सर आगे की मेडिकल प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त जानकारी या तैयारी नहीं होती। यहां सावधानी जरूरी है। उपलब्ध सामग्री यह बताती है कि जागरूकता एक चुनौती है, लेकिन इससे पूरे भारत में कितने प्रतिशत लोग लिविंग विल से अनजान हैं, इसका विश्वसनीय राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध स्रोतों में नहीं दिया गया है।
इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि कोई निश्चित प्रतिशत भारतीय लिविंग विल के बारे में नहीं जानते। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के कानूनी ढांचे के बावजूद इसके इस्तेमाल, प्रक्रिया और व्यावहारिक असर को लेकर सार्वजनिक समझ सीमित रहने की चिंता मौजूद है।
यह सवाल सबसे जटिल है।
अगर मरीज निर्णय लेने में सक्षम है, तो उसके अपने मेडिकल फैसले को प्राथमिकता मिलती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के ढांचे में सक्षम व्यक्ति को जीवनरक्षक इलाज से इनकार करने का अधिकार स्वीकार किया था। अगर मरीज निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है, तो मामला अलग हो जाता है। ऐसे मामलों में मेडिकल बोर्ड और निर्धारित सुरक्षा प्रक्रिया सक्रिय होती है। परिवार की राय महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल परिवार की इच्छा अपने आप में इलाज हटाने का अंतिम आधार नहीं है। 2026 के फैसले में अदालत ने कहा कि नेक्स्ट ऑफ किन से चर्चा होनी चाहिए और उनकी लिखित सहमति मरीज के सर्वोत्तम हित को प्रतिबिंबित करनी चाहिए, केवल रिश्तेदारों की निजी पसंद को नहीं।
एंड-ऑफ-लाइफ फैसलों में डॉक्टरों के लिए कानूनी जोखिम और नैतिक दुविधा बड़ी समस्या रही है।
2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि डॉक्टर निर्धारित प्रक्रिया शुरू करने को लेकर हिचकिचा सकते हैं। इसी वजह से अदालत ने मल्टी-टियर मेडिकल बोर्ड व्यवस्था और सुरक्षा उपायों को अधिक स्पष्ट किया। यह व्यवस्था एक तरह का चेक एंड बैलेंस तैयार करती है। मकसद यह है कि जीवनरक्षक इलाज हटाने का फैसला अकेले किसी एक डॉक्टर, रिश्तेदार या संस्था के विवेक पर निर्भर न रहे।
नहीं।
लिविंग विल एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन एंड-ऑफ-लाइफ प्लानिंग इससे आगे जाती है। परिवार को मरीज की बीमारी, संभावित मेडिकल स्थितियों, पेलिएटिव केयर के विकल्प और अस्पताल की प्रक्रिया के बारे में पहले से जानकारी रखनी चाहिए।
मरीज को अपनी इच्छाओं पर परिवार और डॉक्टर से बातचीत भी करनी चाहिए। लिखित निर्देश और वास्तविक मेडिकल रिकॉर्ड के बीच समन्वय जितना स्पष्ट होगा, संकट की स्थिति में विवाद की गुंजाइश उतनी कम होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने भी यह स्पष्ट किया है कि एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव का अस्तित्व अपने आप में हर परिस्थिति में उसके तत्काल अमल की गारंटी नहीं है। मौजूदा मेडिकल स्थिति और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का परीक्षण जरूरी है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु का मतलब इलाज बंद करके मरीज को अकेला छोड़ देना नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में खास तौर पर कहा कि जीवनरक्षक उपचार वापस लेने के बाद भी मरीज पेलिएटिव और एंड-ऑफ-लाइफ केयर का हकदार रहता है। अदालत ने इलाज वापस लेने और मरीज को मेडिकल देखभाल से वंचित करने के बीच स्पष्ट अंतर रखा।
इसका मतलब है कि दर्द, बेचैनी और दूसरे लक्षणों को नियंत्रित करने वाली देखभाल जारी रह सकती है। उद्देश्य इलाज को बेवजह लंबा खींचने के बजाय मरीज की गरिमा और आराम को केंद्र में रखना है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के फैसले में मौजूदा कॉमन कॉज़ दिशानिर्देशों को व्यवस्थित किया और केंद्र सरकार से इस विषय पर व्यापक कानून बनाने की दिशा में कदम उठाने का आग्रह किया।
यह संकेत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में अभी एंड-ऑफ-लाइफ मेडिकल फैसलों के लिए अलग व्यापक संसदीय कानून मौजूद नहीं है। मौजूदा ढांचा मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक फैसलों और उनके तहत विकसित प्रक्रिया पर आधारित है।
आगे की बहस केवल यह नहीं होगी कि जीवनरक्षक इलाज कब हटाया जाए। असल सवाल यह भी होगा कि मरीजों को उनके अधिकारों के बारे में कैसे बताया जाए, डॉक्टरों को स्पष्ट प्रोटोकॉल कैसे मिले और परिवारों को संकट से पहले बेहतर तैयारी कैसे दी जाए।
लिविंग विल या एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव वह अग्रिम निर्देश है जिसमें व्यक्ति भविष्य की ऐसी स्थिति के लिए अपनी मेडिकल इच्छाएं दर्ज करता है, जब वह खुद निर्णय लेने में सक्षम न रहे।
नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने एक्टिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता नहीं दी है। जीवनरक्षक मेडिकल ट्रीटमेंट को निर्धारित परिस्थितियों और सुरक्षा प्रक्रिया के तहत रोकने या वापस लेने का ढांचा अलग है।
नहीं। असमर्थ मरीज के मामले में निर्धारित मेडिकल प्रक्रिया और मरीज के सर्वोत्तम हित का आकलन जरूरी है। परिवार की राय प्रक्रिया का हिस्सा है, अंतिम और अकेला आधार नहीं।
नहीं। एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव को निर्धारित मेडिकल और कानूनी प्रक्रिया के तहत परखा जाता है। उसकी मौजूदगी स्वतः इलाज बंद करने का आदेश नहीं है।
इलाज हटाने का अर्थ मेडिकल परित्याग नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पेलिएटिव और एंड-ऑफ-लाइफ केयर जारी रखने पर जोर दिया है।
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का कानूनी ढांचा अचानक नहीं बना। इसकी संवैधानिक नींव 2018 में रखी गई और 2023 में प्रक्रिया में बदलाव हुए। 2026 के हरीश राणा फैसले ने इस ढांचे को वास्तविक मामले में लागू करते हुए कई व्यावहारिक पहलुओं को और स्पष्ट किया।
अब अगली बड़ी चुनौती जागरूकता की है। लिविंग विल किसी व्यक्ति को मृत्यु का फैसला सौंपने वाला दस्तावेज नहीं, बल्कि उस स्थिति के लिए पहले से व्यक्त मेडिकल इच्छा है जब वह खुद बोलने या फैसला लेने की स्थिति में न हो।
एंड-ऑफ-लाइफ फैसलों में कानून, मेडिकल साइंस, परिवार और मरीज की गरिमा चारों को साथ रखना होगा। आने वाले वर्षों में इस बहस का केंद्र यही होना चाहिए कि भारत में लोग संकट आने से पहले अपने मेडिकल अधिकारों और इच्छाओं के बारे में कितनी स्पष्ट जानकारी हासिल कर पाते हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।