सुप्रीम कोर्ट ने यूपी गैंगस्टर्स एक्ट के मौजूदा स्वरूप में स्वतंत्र अपराध न बनने पर सवाल उठाते हुए दो वकीलों के खिलाफ कार्यवाही रद्द की। अदालत ने कहा कि केवल गैंगस्टर की पहचान के आधार पर दंड नहीं दिया जा सकता। हालांकि दूसरे आपराधिक कानूनों के तहत चल रही कार्यवाही पर इस फैसले का स्वतः असर नहीं पड़ेगा।
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नई दिल्ली | 20 अगस्त 2026 | Apurva Choudhary
सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट, 1986 को लेकर गुरुवार को अहम कानूनी फैसला सुनाया। जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि कानून के मौजूदा स्वरूप में ऐसा कोई स्वतंत्र आपराधिक अपराध निर्मित नहीं किया गया है, जिसके आधार पर केवल ‘गैंगस्टर’ के तौर पर पहचान होने से व्यक्ति को दंडित किया जा सके।
अदालत ने इसी आधार पर दो वकीलों, शिव प्रताप सिंह उर्फ चिनू और हिमांशु श्रीवास्तव, के खिलाफ यूपी गैंगस्टर्स एक्ट के तहत चल रही संबंधित कार्यवाही रद्द कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने कानून को मौजूदा स्वरूप में ‘स्टिलबॉर्न’ कहा। यह टिप्पणी कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि अदालत ने मौजूदा प्रावधानों में स्वतंत्र अपराध के अभाव को फैसले का आधार बनाया है।
‘गैंगस्टर’ की पहचान और अपराध में क्या फर्क है?
फैसले का केंद्रीय सवाल यही है कि किसी व्यक्ति को ‘गैंगस्टर’ बताने और उसके खिलाफ स्वतंत्र आपराधिक दायित्व स्थापित करने में कानून क्या भूमिका निभाता है।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक यूपी का कानून ‘गैंग’ और ‘गैंगस्टर’ की परिभाषा देता है तथा ऐसी गतिविधियों का उल्लेख करता है जो दूसरे आपराधिक कानूनों के तहत पहले से अपराध हैं। लेकिन अदालत ने पाया कि मौजूदा कानून स्वयं कोई अलग और स्वतंत्र अपराध निर्मित नहीं करता, जबकि उसके तहत सजा का प्रावधान मौजूद है।
यही बिंदु अदालत के फैसले का आधार बना। सरल शब्दों में, किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले से मौजूद आपराधिक मामलों या गतिविधियों को आधार बनाकर उसे गैंगस्टर की श्रेणी में रखना और फिर उसी पहचान के आधार पर इस कानून के तहत सजा देना तभी टिकाऊ हो सकता है जब संबंधित कानून स्वयं दंडनीय अपराध का स्पष्ट आधार उपलब्ध कराए।
अनुच्छेद 20(1) का सिद्धांत क्यों महत्वपूर्ण है?
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) में निहित आपराधिक कानून के बुनियादी सिद्धांत का भी उल्लेख किया। इसका मूल विचार यह है कि किसी ऐसे कृत्य के लिए व्यक्ति को दंडित नहीं किया जा सकता जिसे कानून ने अपराध के तौर पर निर्धारित ही नहीं किया है।
अदालत ने ‘नलम क्रिमेन नल पोएना सिने लेगे’ के सिद्धांत का संदर्भ देते हुए अपराध और सजा के बीच स्पष्ट वैधानिक आधार की जरूरत पर जोर दिया। यानी केवल किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति या पहचान अपने आप में दंड का आधार नहीं बन सकती।
यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आपराधिक कानून में नागरिक के खिलाफ राज्य की दंडात्मक शक्ति का इस्तेमाल स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों के तहत होना चाहिए। अदालत ने इसी कसौटी पर यूपी गैंगस्टर्स एक्ट की मौजूदा संरचना की समीक्षा की।
मामला किन दो वकीलों से जुड़ा था?
पहला मामला अधिवक्ता शिव प्रताप सिंह उर्फ चिनू से संबंधित था। यह विवाद फर्रुखाबाद के फतेहगढ़ बार एसोसिएशन के चुनाव से जुड़े घटनाक्रम के बाद सामने आया। उनके खिलाफ यूपी गैंगस्टर्स एक्ट की धाराओं 2 और 3 के तहत कार्रवाई की गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
दूसरा मामला अधिवक्ता हिमांशु श्रीवास्तव से जुड़ा था। उनके खिलाफ भी यूपी गैंगस्टर्स एक्ट के तहत कार्यवाही शुरू हुई थी और हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
दोनों मामलों में मुख्य कानूनी आपत्ति यह थी कि गैंग चार्ट और पहले से दर्ज मामलों के आधार पर गैंगस्टर्स एक्ट की कार्यवाही आगे बढ़ाई जा रही थी, जबकि एक्ट स्वयं कोई अलग अपराध परिभाषित नहीं करता।
गैंग चार्ट पर अदालत ने क्या कहा?
फैसले में गैंग चार्ट की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। अदालत ने इस बात पर आपत्ति जताई कि किसी व्यक्ति को गैंग चार्ट में शामिल किए जाने के बाद उसके खिलाफ हिरासत, मुकदमे और सजा की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है, जबकि उसी कानून में स्वतंत्र अपराध की स्पष्ट रचना नहीं की गई है।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता यह थी कि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का आधार मुख्य रूप से उसकी ‘गैंगस्टर’ के तौर पर पहचान और गैंग चार्ट है, तो वास्तविक अपराध और उस अपराध के वैधानिक आधार के बीच स्पष्ट संबंध होना जरूरी है।
अदालत ने इस स्थिति को समझाने के लिए एक अंग्रेजी कहावत का भी इस्तेमाल किया, जिसका आशय है कि किसी व्यक्ति को पहले खराब नाम दे दिया जाए और फिर उसी आधार पर उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए। हालांकि यह टिप्पणी मामले के कानूनी संदर्भ में थी और इसे अदालत द्वारा हर गैंग चार्ट को अवैध घोषित करने के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने यूपी गैंगस्टर्स एक्ट खत्म कर दिया?
नहीं। इस फैसले को ‘यूपी गैंगस्टर्स एक्ट खत्म’ कहना सटीक नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा स्वरूप में कानून को ‘स्टिलबॉर्न’ बताते हुए कहा कि उसमें स्वतंत्र अपराध का निर्माण नहीं हुआ है। लेकिन अदालत ने कानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं दिया। उसने यह भी स्पष्ट किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की उस फुल बेंच के फैसले को इस निर्णय के जरिए मंजूर नहीं माना जाना चाहिए, जिसने कानून से जुड़ी संवैधानिक चुनौतियों को खारिज किया था।
इसका मतलब है कि इस कानून की संवैधानिक वैधता से जुड़े व्यापक सवाल आगे भी न्यायिक विचार के लिए खुले रह सकते हैं।
क्या दूसरे आपराधिक मामले भी खत्म होंगे?
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यही है कि दूसरे आपराधिक कानूनों के तहत दर्ज मामलों पर इसका स्वतः असर नहीं पड़ेगा।
अगर किसी व्यक्ति पर हत्या, मारपीट, हथियार, धमकी, मादक पदार्थ या किसी अन्य अपराध से जुड़े आरोप किसी अलग लागू कानून के तहत हैं, तो उन मामलों की कानूनी स्थिति उस संबंधित कानून के आधार पर तय होगी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसके फैसले का असर दूसरे दंडात्मक कानूनों के तहत चल रही कार्यवाही पर स्वतः नहीं पड़ेगा।
इसलिए इस फैसले को उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध या गंभीर आपराधिक मामलों पर कार्रवाई खत्म होने के रूप में देखना गलत होगा।
राज्य सरकार की दलील क्या थी?
सुप्रीम कोर्ट के सामने राज्य की ओर से इस तरह की दलील रखी गई कि संबंधित आरोपियों के आपराधिक इतिहास और गतिविधियों के आधार पर गैंग चार्ट तैयार किया गया था। दूसरे शब्दों में, राज्य का पक्ष यह था कि कानून का इस्तेमाल ऐसे लोगों के खिलाफ किया जा रहा है जिनके बारे में पुलिस रिकॉर्ड में आपराधिक गतिविधियों से जुड़े तथ्य मौजूद हैं।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद को केवल आरोपियों के कथित आपराधिक इतिहास के आधार पर तय नहीं किया। अदालत ने कानून की संरचना पर ध्यान केंद्रित किया और पूछा कि जिस कानून के तहत सजा दी जा रही है, क्या वह स्वयं कोई स्वतंत्र अपराध बनाता है।
यहीं से फैसला कानूनी तकनीकी सवाल से आगे बढ़कर आपराधिक न्याय व्यवस्था में वैधानिक स्पष्टता के मुद्दे से जुड़ जाता है।
कानून लागू करने की प्रक्रिया पर इसका क्या असर होगा?
फैसले के बाद यूपी गैंगस्टर्स एक्ट के तहत दर्ज मामलों में कानूनी आधार की जांच महत्वपूर्ण हो सकती है। खास तौर पर ऐसे मामलों में सवाल उठ सकता है कि क्या संबंधित कार्रवाई सिर्फ गैंग चार्ट और पहले से दर्ज मामलों पर आधारित है या उसके पीछे कानून के तहत टिकाऊ स्वतंत्र अपराध का आधार भी मौजूद है।
हालांकि हर पुराने मामले को इस फैसले के आधार पर स्वतः समाप्त मानना उचित नहीं होगा। किसी केस का परिणाम उसके तथ्य, आरोप, लागू कानून और न्यायिक रिकॉर्ड पर निर्भर करेगा।
यूपी में गैंगस्टर्स एक्ट के इस्तेमाल को लेकर यह फैसला पुलिस और अभियोजन के लिए भी एक महत्वपूर्ण कानूनी कसौटी पेश करता है। भविष्य में जांच और अभियोजन को यह स्पष्ट करना पड़ सकता है कि संबंधित कार्रवाई किस वैधानिक अपराध और किस दंडात्मक प्रावधान पर आधारित है।
क्या इस फैसले का असर गैंगस्टर्स एक्ट की सभी धाराओं पर है?
फैसले का व्यापक महत्व जरूर है, लेकिन इसे हर संभव स्थिति में हर धारा पर समान प्रभाव डालने वाला आदेश मानना जल्दबाजी होगी।
अदालत ने जिन कार्यवाहियों को रद्द किया, वे उसके सामने मौजूद विशेष मामलों और कानून की मौजूदा संरचना से संबंधित थीं। इसलिए अन्य मामलों में अदालतें अलग तथ्यों और कानूनी परिस्थितियों को ध्यान में रख सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने खुद यह स्पष्ट किया कि उसने दूसरे दंडात्मक कानूनों के तहत आरोपों को प्रभावित नहीं किया है और संवैधानिक वैधता से जुड़े व्यापक सवालों को भी इस फैसले में अंतिम रूप से तय नहीं किया गया।