पूर्व राजदूत नवदीप सूरी को SIR में नोटिस, क्यों उठा सवाल?
पंजाब SIR में नवदीप सूरी के दस्तावेजों का नहीं हुआ मिलान
तीन देशों में भारत का प्रतिनिधित्व, फिर SIR में नागरिकता का सबूत
पंजाब में SIR प्रक्रिया के दौरान पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी ने अपने दस्तावेजों के सत्यापन को लेकर चिंता जताई। उनके मुताबिक वोटर आईडी और आधार जमा करने के बाद भी 2003 के रिकॉर्ड से कुछ जानकारी मेल नहीं खाई। उनसे अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए। निर्वाचन आयोग की ओर से मामले पर अभी आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
चंडीगढ़, पंजाब | 24 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
पंजाब में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR को लेकर पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी के एक अनुभव ने चुनावी प्रक्रिया में दस्तावेजी सत्यापन और पुराने रिकॉर्ड के मिलान पर नई बहस छेड़ दी है। सूरी ने सोशल मीडिया पर बताया कि SIR प्रक्रिया के दौरान उनके दस्तावेज जमा करने के बाद भी 2003 के रिकॉर्ड से कुछ जानकारी मेल नहीं खाने की सूचना दी गई। नवदीप सूरी भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी हैं और ऑस्ट्रेलिया में भारत के हाई कमिश्नर तथा संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र में भारत के राजदूत के रूप में काम कर चुके हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने 1983 से 2019 तक भारतीय विदेश सेवा में काम किया।
सूरी के मुताबिक वह पंजाब में बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO के पास गए और अपना वोटर आईडी तथा आधार कार्ड जमा किया। उनके अनुसार शुरुआत में उन्हें बताया गया कि दस्तावेजों की प्रक्रिया ठीक है। बाद में उन्हें एक वॉलंटियर के संदेश से जानकारी मिली कि उनके कुछ विवरण 2003 के SIR रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रहे हैं। इसके बाद BLO से संपर्क करने पर उन्हें नोटिस लेने और अतिरिक्त दस्तावेजों के साथ वापस आने को कहा गया। सूरी ने बताया कि वह 2003 में भारत में मौजूद नहीं थे क्योंकि उस समय वह विदेश में तैनात थे। रिपोर्टों के मुताबिक इसी संदर्भ में उनसे पासपोर्ट को नागरिकता के प्रमाण के तौर पर पेश करने को कहा गया।
नवदीप सूरी ने अपने अनुभव को व्यक्तिगत शिकायत तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर तीन देशों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके एक पूर्व राजनयिक को भी पुराने मतदाता रिकॉर्ड से जुड़ी प्रक्रिया में दस्तावेजी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, तो आम नागरिक के लिए यह प्रक्रिया कितनी कठिन होगी। उनका सवाल SIR की प्रशासनिक प्रक्रिया, पुराने रिकॉर्ड की उपलब्धता और मतदाताओं को सत्यापन के दौरान मिलने वाली स्पष्ट जानकारी से जुड़ा है। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि सूरी का अनुभव अपने आप में पूरी SIR प्रक्रिया की विफलता का प्रमाण नहीं है।
यहां सबसे जरूरी संपादकीय अंतर समझना होगा। उपलब्ध रिपोर्टों में यह कहा गया है कि सूरी से भारतीय नागरिकता साबित करने वाले अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि निर्वाचन आयोग ने उनकी भारतीय नागरिकता को खारिज कर दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार इस मामले पर भारत निर्वाचन आयोग, पंजाब सरकार या केंद्र सरकार की ओर से अभी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। इसलिए फिलहाल सूरी के अनुभव और आरोप को उनके बयान के रूप में ही रिपोर्ट करना उचित है। यानी “नागरिकता रद्द”, “नाम काट दिया गया” या “SIR ने उन्हें विदेशी घोषित कर दिया” जैसे दावे उपलब्ध तथ्यों से साबित नहीं होते।
SIR में पुराने मतदाता रिकॉर्ड का इस्तेमाल मतदाता की जानकारी के सत्यापन के लिए किया जा रहा है। पंजाब में भी मतदाताओं के मौजूदा रिकॉर्ड को पुराने चुनावी डेटा से मिलाने की प्रक्रिया चल रही है। सूरी के मामले में समस्या इसलिए सामने आई क्योंकि उन्होंने बताया कि 2003 में वह भारत में नहीं थे। ऐसे में पुराने रिकॉर्ड से उनका व्यक्तिगत मिलान कठिन होना उनके लिए एक प्रशासनिक समस्या बन गया। उपलब्ध रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं है कि उनके मामले में अंतिम सत्यापन किस दस्तावेज के आधार पर पूरा हुआ या होगा। यही वह बिंदु है जहां SIR की प्रक्रिया और व्यक्तिगत मतदाता रिकॉर्ड के बीच अंतर समझना जरूरी है। किसी पुराने रिकॉर्ड में नाम या विवरण का मिलान न होना अपने आप में नागरिकता समाप्त होने का प्रमाण नहीं है।
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची का व्यापक पुनरीक्षण और सत्यापन करना है। प्रक्रिया में मौजूदा मतदाता रिकॉर्ड की जांच, पुराने रिकॉर्ड से मिलान और जरूरी सुधार शामिल हैं। पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों के लिए 2026 की प्रारूप मतदाता सूची SIR के तहत प्रकाशित की जा चुकी है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी अनिंदिता मित्रा ने इसे निर्वाचन आयोग के घोषित कार्यक्रम के तहत जारी किए जाने की जानकारी दी है। इस प्रक्रिया का घोषित मकसद मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है। लेकिन जब पुराने रिकॉर्ड और मौजूदा दस्तावेजों में अंतर सामने आता है, तो मतदाता के लिए सत्यापन प्रक्रिया स्पष्ट और सुलभ होना महत्वपूर्ण हो जाता है।
सूरी ने बताया कि उन्होंने वोटर आईडी और आधार कार्ड जमा किए थे। इसके बावजूद उन्हें पुराने रिकॉर्ड से जुड़ी विसंगति की सूचना मिली और अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने को कहा गया। इससे एक अहम सवाल सामने आता है कि SIR में अलग-अलग दस्तावेजों की भूमिका क्या है और किस परिस्थिति में मतदाता से अतिरिक्त प्रमाण मांगा जाता है। सूरी के मामले में यह प्रक्रिया किस विशिष्ट नियम के तहत आगे बढ़ी, इस पर निर्वाचन आयोग की आधिकारिक व्याख्या अभी उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह कहना भी उचित नहीं होगा कि आधार या वोटर आईडी को हर परिस्थिति में अपर्याप्त माना जा रहा है। इस खास मामले में प्रशासनिक स्तर पर अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जाने की बात सामने आई है।
पूर्व राजनयिकों और विदेश में लंबे समय तक रहने वाले भारतीय नागरिकों के मामले में पुराने मतदाता रिकॉर्ड का मिलान अलग तरह की चुनौती पेश कर सकता है। सूरी ने इसी पहलू को अपने अनुभव से सामने रखा है। यदि कोई भारतीय नागरिक लंबे समय तक विदेश में सरकारी सेवा पर तैनात रहा हो, तो किसी खास वर्ष के स्थानीय मतदाता रिकॉर्ड में उसकी मौजूदगी या उसका नाम अलग रूप में दर्ज हो सकता है। ऐसे मामलों में रिकॉर्ड सत्यापन की प्रक्रिया को स्पष्ट निर्देशों के साथ चलाना प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण होगा। लेकिन इस आधार पर पूरी SIR प्रक्रिया को दोषपूर्ण घोषित करना भी जल्दबाजी होगी। इसके लिए बड़े पैमाने के सत्यापन डेटा और निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी जरूरी होगी।
सूरी का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह SIR के एक संवेदनशील पहलू को सामने लाता है। अगर पुराने रिकॉर्ड और मौजूदा दस्तावेजों में अंतर हो, तो मतदाता को यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि समस्या क्या है, कौन सा दस्तावेज चाहिए और जवाब देने की प्रक्रिया क्या है।
मतदाता सूची से जुड़े किसी भी पुनरीक्षण में पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय महत्वपूर्ण हैं। किसी नागरिक को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का उचित अवसर मिलना चाहिए। यही वजह है कि ऐसे मामलों में आधिकारिक नोटिस की भाषा, दस्तावेजों की सूची और आपत्ति दर्ज कराने की प्रक्रिया की स्पष्टता महत्वपूर्ण हो जाती है।
पंजाब में SIR को लेकर दूसरे राजनीतिक और सार्वजनिक व्यक्तियों की ओर से भी सवाल उठाए गए हैं। एबीपी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक आम आदमी पार्टी नेता सोमनाथ भट्टी ने भी पुराने मतदाता रिकॉर्ड में अपना नाम नहीं मिलने का दावा किया था। हालांकि किसी व्यक्ति के अनुभव और पूरे राज्य की मतदाता सूची के आंकड़ों के बीच अंतर करना जरूरी है। अलग-अलग दावों को व्यापक निष्कर्ष में बदलने से पहले निर्वाचन आयोग के आधिकारिक डेटा की जरूरत होगी। इसी तरह SIR के दौरान कितने नाम हटे, कितने नाम संशोधित हुए और कितने मामलों में आपत्तियां दर्ज हुईं, इन सभी आंकड़ों को अलग-अलग श्रेणियों में देखना जरूरी है।
नवदीप सूरी के मामले में अब सबसे अहम पक्ष निर्वाचन आयोग का आधिकारिक स्पष्टीकरण होगा। इससे पता चलेगा कि उनके रिकॉर्ड में किस तरह की विसंगति मिली, नोटिस किस आधार पर जारी हुआ और अतिरिक्त दस्तावेज क्यों मांगे गए। अगर आयोग इस प्रक्रिया को सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट करता है, तो इससे दूसरे मतदाताओं की आशंकाएं भी कम हो सकती हैं। साथ ही इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि SIR के दौरान पुराने रिकॉर्ड से मेल न खाने वाले मामलों को किस प्रशासनिक प्रक्रिया से सुलझाया जाता है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी में इस मामले का अंतिम प्रशासनिक परिणाम स्पष्ट नहीं है।
SIR पर बहस अब केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रही है। मतदाता सूची किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियादी संरचना है और इसमें नाम जोड़ने, हटाने या सत्यापित करने की प्रक्रिया का सीधा असर नागरिकों के मतदान अधिकार पर पड़ता है। इसलिए सरकार, निर्वाचन आयोग और राजनीतिक दलों के लिए सबसे अहम चुनौती यही है कि प्रक्रिया को नियमों के मुताबिक, पारदर्शी और मतदाता के लिए समझने योग्य रखा जाए। वहीं नागरिकों के लिए भी जरूरी है कि वे आधिकारिक नोटिस और निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपने दस्तावेज समय पर जमा करें।
नवदीप सूरी के मामले में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उनके दस्तावेजों का अंतिम सत्यापन कैसे होता है। साथ ही निर्वाचन आयोग की ओर से यदि कोई स्पष्टीकरण आता है, तो उससे इस मामले की वास्तविक प्रशासनिक स्थिति और साफ होगी। पंजाब में SIR के तहत प्रारूप मतदाता सूची जारी हो चुकी है। आगे आपत्तियों, दावों और सुधारों की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। इस दौरान किसी भी वायरल दावे को आधिकारिक रिकॉर्ड से मिलाना जरूरी रहेगा।
पंजाब SIR को लेकर पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी का अनुभव एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सवाल उठाता है। उन्होंने बताया कि वोटर आईडी और आधार जमा करने के बाद भी 2003 के रिकॉर्ड से कुछ जानकारी मेल नहीं खाने की सूचना मिली और उनसे अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए।
लेकिन फैक्ट-चेक के स्तर पर अभी यह कहना सही नहीं होगा कि उनकी नागरिकता खारिज की गई या उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया। उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है। इस मामले की पूरी तस्वीर निर्वाचन आयोग के आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद ही साफ होगी। फिलहाल स्थापित तथ्य इतना है कि एक पूर्व राजनयिक ने SIR की दस्तावेजी प्रक्रिया में अपने अनुभव को सार्वजनिक किया है और पुराने रिकॉर्ड के मिलान को लेकर सवाल उठाए हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।