26/11 मुंबई आतंकी हमले के मामले में भारत ने पाकिस्तान में मौजूद छह आरोपियों के खिलाफ गैरहाजिरी में मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ाई है। अदालत ने कानूनी नोटिस की तामील के लिए समय दिया है। यह कदम BNSS की धारा 356 के तहत न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिश है।
📍 मुंबई
📰 22 अगस्त 2026
✍️ APURVA CHOUDHARY
26/11 मामले में न्यायिक प्रक्रिया ने पकड़ी नई रफ्तार
मुंबई के 26/11 आतंकी हमले से जुड़े मामले में करीब 18 साल बाद छह पाकिस्तानी आरोपियों के खिलाफ भारतीय अदालत में एक नई कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। महाराष्ट्र सरकार ने इन आरोपियों के खिलाफ उनकी गैरमौजूदगी में मुकदमा चलाने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
इनमें हाफिज सईद और जकी-उर-रहमान लखवी समेत छह पाकिस्तानी नागरिक शामिल हैं। मुंबई की अदालत में शुक्रवार को हुई कार्यवाही के बाद अब इन आरोपियों तक औपचारिक कानूनी नोटिस पहुंचाने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो गई है।
यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि आरोपी भारत की न्यायिक पहुंच से बाहर हैं। ऐसे में सामान्य प्रक्रिया के तहत उनकी व्यक्तिगत मौजूदगी सुनिश्चित करना मुश्किल रहा है।
अदालत में क्या हुआ
महाराष्ट्र सरकार की तरफ से अदालत में एक अंतरिम रिपोर्ट पेश की गई। इसमें बताया गया कि छह आरोपियों के खिलाफ पहले जारी की गई सार्वजनिक उद्घोषणा और संबंधित कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है।
विशेष लोक अभियोजक उज्ज्वल निकम की ओर से अदालत को बताया गया कि पाकिस्तान में मौजूद आरोपियों तक आदेश पहुंचाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय की मदद ली जा रही है। इसके लिए इंटरपोल के माध्यम से प्रक्रिया आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
अदालत ने राज्य को अगली प्रक्रिया पूरी करने के लिए 17 सितंबर तक का समय दिया है। इसलिए अभी इसे अंतिम ट्रायल की शुरुआत के बजाय उस दिशा में आगे बढ़ती न्यायिक प्रक्रिया के तौर पर देखना अधिक सटीक होगा।
छह आरोपियों पर क्यों है अदालत की नजर
मामले में जिन छह पाकिस्तानी नागरिकों के खिलाफ यह प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है, उनमें हाफिज सईद, जकी-उर-रहमान लखवी, साजिद मीर, अबू अलकामा, आसिम उर्फ अबू काहफा और मेजर अब्दुर रहमान पाशा के नाम शामिल हैं।
भारतीय जांच और अभियोजन के मुताबिक इन आरोपियों की भूमिका 26/11 हमले की साजिश और उसके संचालन से जुड़े मामले में सामने आई है। अभियोजन पक्ष के पास इस मामले में पहले से उपलब्ध गवाही और जांच सामग्री को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि किसी आरोपी के खिलाफ आरोप होना और अदालत द्वारा उसे दोषी ठहराना दो अलग कानूनी स्थितियां हैं। अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही निकलेगा।
गैरहाजिरी में ट्रायल का मतलब क्या है
गैरहाजिरी में ट्रायल यानी ट्रायल इन एब्सेंटिया का सीधा मतलब है कि कानून में तय शर्तें पूरी होने पर आरोपी की शारीरिक मौजूदगी के बिना भी मुकदमे की न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।
भारत के नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 356 में घोषित अपराधियों के खिलाफ उनकी गैरमौजूदगी में जांच, ट्रायल और फैसला आगे बढ़ाने का प्रावधान है।
यह व्यवस्था सामान्य अनुपस्थिति के हर मामले पर लागू नहीं होती। आरोपी के खिलाफ निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी होना और उसे अदालत की कार्रवाई की जानकारी देने के लिए जरूरी कदम उठाना इसकी अहम शर्तों में शामिल है।
26/11 मामले में यह रास्ता क्यों अपनाया गया
2008 के मुंबई हमलों के बाद भारत में इस मामले की जांच और अभियोजन लंबे समय से चला है। हमले में 166 लोगों की जान गई थी और मुंबई कई प्रमुख स्थानों पर आतंकवादी हमलों का सामना कर रही थी।
मामले की एक बड़ी कानूनी चुनौती यह रही कि पाकिस्तान में मौजूद कई आरोपी भारतीय अदालत के सामने पेश नहीं हो सके। उनकी गिरफ्तारी या भारत में मौजूदगी सुनिश्चित न होने के कारण उनके खिलाफ पारंपरिक तरीके से मुकदमा आगे बढ़ाना कठिन रहा।
अब BNSS में मौजूद कानूनी व्यवस्था ने अभियोजन को एक वैकल्पिक रास्ता दिया है। इसका मकसद यह है कि किसी घोषित अपराधी की गैरमौजूदगी के कारण न्यायिक प्रक्रिया अनिश्चित समय तक रुकी न रहे।
अभी ट्रायल पूरा शुरू नहीं हुआ है
इस मामले में एक अहम फर्क समझना जरूरी है। छह आरोपियों के खिलाफ गैरहाजिरी में ट्रायल की प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश हो रही है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने उन्हें दोषी करार दे दिया है।
अभी कानूनी नोटिस और अन्य जरूरी औपचारिकताओं की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। इसके बाद अदालत यह देखेगी कि गैरहाजिरी में मुकदमा चलाने के लिए कानून में निर्धारित सभी शर्तें पूरी हुई हैं या नहीं।
इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को ट्रायल की दिशा में महत्वपूर्ण कदम कहना सही है, लेकिन इसे अंतिम न्यायिक फैसला बताना गलत होगा।
इंटरपोल की भूमिका क्यों अहम है
इस मामले में इंटरपोल के जरिए कानूनी आदेश पहुंचाने की कोशिश का खास महत्व है। जब आरोपी किसी दूसरे मुल्क में हों, तब अदालत की कार्यवाही और संबंधित आदेशों की जानकारी औपचारिक तरीके से पहुंचाना न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है।
महाराष्ट्र सरकार ने इस सिलसिले में केंद्रीय गृह मंत्रालय से मदद मांगी है। अदालत को बताया गया है कि संबंधित प्रक्रिया के लिए मंत्रालय की ओर से कदम उठाए जा रहे हैं।
इसका उद्देश्य केवल नोटिस भेजना नहीं है। गैरहाजिरी में मुकदमे की वैधता के लिए यह दिखाना भी महत्वपूर्ण है कि आरोपी को कानूनी कार्रवाई की जानकारी देने के लिए निर्धारित प्रक्रिया अपनाई गई।
महाराष्ट्र में कानूनी ढांचा पहले से तैयार
BNSS की धारा 356 ने भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। इसके तहत घोषित अपराधी के खिलाफ उसकी गैरमौजूदगी में न्यायिक कार्रवाई आगे बढ़ाने का वैधानिक आधार बनाया गया है।
महाराष्ट्र सरकार ने 2025 में संबंधित प्रावधानों को राज्य में लागू करने की दिशा में अधिसूचना जारी की थी। इसका मकसद उन मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था, जहां आरोपी कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए फरार हैं।
26/11 मामले में इसी कानूनी ढांचे का इस्तेमाल एक बेहद संवेदनशील और पुराने आतंकवाद मामले में किया जा रहा है।
हाफिज सईद और लखवी का मामला क्यों संवेदनशील
हाफिज सईद और जकी-उर-रहमान लखवी का नाम 26/11 हमले से जुड़े भारतीय अभियोजन के प्रमुख आरोपों में लंबे समय से सामने आता रहा है।
भारत की जांच एजेंसियों ने इस मामले में पाकिस्तान स्थित आतंकी नेटवर्क की भूमिका को लेकर विस्तृत जांच की थी। मुंबई हमले में पकड़े गए अजमल कसाब की गवाही और बाद में अमेरिकी नागरिक डेविड हेडली से जुड़ी जांच सामग्री को भी अभियोजन के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया है।
फिर भी अदालत में किसी आरोपी की जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण केवल आरोपों के आधार पर नहीं किया जा सकता। यह काम मुकदमे में पेश साक्ष्यों और कानूनी परीक्षण के बाद ही होगा।
क्या यह भारत की आतंकवाद विरोधी रणनीति में बदलाव है
इस घटनाक्रम को केवल एक पुराने मामले की कानूनी कार्रवाई मानना पूरी तस्वीर नहीं होगी। यह भारत की उस कोशिश को भी दिखाता है जिसमें देश से बाहर मौजूद आरोपियों के खिलाफ घरेलू कानून के तहत न्यायिक जवाबदेही तय करने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं।
भारत-पाकिस्तान के बीच प्रत्यर्पण और आपराधिक मामलों में सहयोग का मुद्दा लंबे समय से जटिल रहा है। ऐसे में गैरहाजिरी में ट्रायल का प्रावधान भारतीय अदालतों को एक वैधानिक विकल्प देता है।
लेकिन इस विकल्प की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि अदालत प्रक्रिया के हर चरण में निष्पक्षता और आरोपी के कानूनी अधिकारों से जुड़े प्रावधानों का कितना सख्ती से पालन करती है।
पीड़ितों के लिए इसका क्या मतलब
26/11 के पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए इस मामले में न्याय की प्रक्रिया सिर्फ कानूनी औपचारिकता नहीं है। करीब दो दशक बाद भी मामले के कुछ आरोपी भारतीय अदालत की पहुंच से बाहर हैं।
नई प्रक्रिया इस लंबे इंतजार को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कोशिश हो सकती है। लेकिन न्यायिक प्रक्रिया को तेज करने और निष्पक्ष सुनवाई के बीच संतुलन बनाए रखना उतना ही जरूरी है।
किसी आरोपी की गैरमौजूदगी में मुकदमा चलाने का उद्देश्य न्याय को आगे बढ़ाना है, न कि पहले से दोष तय कर देना। यही अंतर इस मामले की रिपोर्टिंग में भी बनाए रखना जरूरी है।
अगली सुनवाई पर टिकी नजर
अब 17 सितंबर की तारीख महत्वपूर्ण है। तब अदालत के सामने कानूनी नोटिस और संबंधित औपचारिकताओं की स्थिति रखी जानी है।
इसके बाद अदालत तय करेगी कि गैरहाजिरी में ट्रायल को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी कानूनी शर्तें किस हद तक पूरी हुई हैं। यदि प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो यह BNSS के नए प्रावधान के तहत आतंकवाद से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक की परीक्षा होगी।
यह भी साफ है कि आने वाले चरण में अभियोजन को अपने आरोपों और साक्ष्यों को न्यायिक कसौटी पर साबित करना होगा। केवल आरोपी की गैरमौजूदगी से आरोप अपने आप सिद्ध नहीं हो जाते।
26/11 केस में अब असली परीक्षा
करीब 18 साल पुराने इस मामले में भारत ने अब एक ऐसा कानूनी रास्ता चुना है जो आरोपियों की भौतिक गैरमौजूदगी के बावजूद न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति देता है।
26/11 मामले में गैरहाजिरी में ट्रायल की पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल छह आरोपियों तक सीमित घटनाक्रम नहीं है। यह भारत के नए आपराधिक कानून के उस प्रावधान की भी वास्तविक परीक्षा है, जिसका मकसद फरार घोषित अपराधियों की वजह से मुकदमों को अनिश्चितकाल तक लंबित रहने से रोकना है।
अब आगे की दिशा मुंबई की अदालत तय करेगी। इस मामले में सबसे अहम बात यही रहेगी कि न्याय की रफ्तार के साथ कानून की प्रक्रिया, साक्ष्यों की जांच और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत भी पूरी मजबूती से कायम रहें।