वॉशिंगटन डीसी | 26 सितंबर 2026
By Mohd Naved
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच वॉशिंगटन में हुई बातचीत में ईरान युद्ध भी अहम मुद्दा रहा। दोनों नेताओं की मुलाकात ऐसे वक्त हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से सैन्य संघर्ष जारी है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही पर संकट बना हुआ है।
चीनी राष्ट्रपति ने अमेरिका और ईरान से बातचीत और कूटनीति की राह पर लौटने की अपील की। चीन ने दोनों देशों के बीच पहले हुए समझौते के ढांचे को फिर सक्रिय करने की भी वकालत की है।
शी जिनपिंग ने बातचीत बहाल करने पर दिया जोर
चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, शी जिनपिंग ने ट्रंप से कहा कि अमेरिका और ईरान को जल्द से जल्द संवाद और वार्ता के रास्ते पर लौटना चाहिए। उन्होंने कहा कि चीन तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान को आगे बढ़ाने के लिए रचनात्मक भूमिका निभाता रहा है।
शी ने अमेरिका और ईरान से जून में बने इस्लामाबाद एमओयू की ओर लौटने की अपील भी की। उनके मुताबिक, दोनों देशों को परमाणु मुद्दे समेत दूसरे विवादित विषयों को शामिल करते हुए व्यापक समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
ट्रंप ने चीन को लेकर क्या कहा
अमेरिकी पक्ष ने बातचीत के दौरान ईरान को चीन की संभावित सहायता को लेकर अपनी चिंता स्पष्ट की। अमेरिका के चीन में राजदूत डेविड पर्ड्यू ने कहा कि ट्रंप ने शी को स्पष्ट किया कि ईरान को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मदद देना वॉशिंगटन के लिए स्वीकार्य नहीं है। इसमें खुफिया जानकारी, सैन्य उपकरण और अन्य पुर्जों से जुड़ी सहायता भी शामिल है।
अमेरिकी आरोपों के मुताबिक, चीन से ईरान को संभावित सैन्य और अन्य सहायता मिलने की चिंता वॉशिंगटन पहले भी उठा चुका है। हालांकि, इन आरोपों और चीनी भूमिका को लेकर बीजिंग की अपनी स्थिति अलग है। इसलिए इसे अमेरिकी पक्ष का दावा मानकर ही रिपोर्ट करना उचित है।
चीन का रुख क्या है
बीजिंग ने सार्वजनिक रूप से युद्ध के समाधान के लिए बातचीत और तनाव कम करने पर जोर दिया है। शी ने कहा कि चीन सभी देशों की संप्रभुता और सुरक्षा का सम्मान करने के पक्ष में है और संबंधित पक्षों से शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की अपील करता रहा है।
चीन के लिए ईरान संकट का आर्थिक पहलू भी महत्वपूर्ण है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान का असर चीन समेत एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। रॉयटर्स के अनुसार, क्षेत्रीय संघर्ष ने दुनिया के महत्वपूर्ण तेल और शिपिंग मार्गों पर दबाव बढ़ाया है।
होर्मुज़ संकट क्यों महत्वपूर्ण है
ट्रंप और शी की बातचीत ऐसे समय हुई जब ईरान ने अमेरिका के सामने सात दिन का एक प्रस्ताव रखा है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के अनुसार, जरूरी शर्तें स्वीकार होने पर सात दिनों के भीतर होर्मुज़ जलडमरूमध्य में सामान्य समुद्री आवाजाही बहाल करने का प्रस्ताव है।
ईरानी प्रस्ताव में अमेरिकी नाकेबंदी हटाने, जमे हुए ईरानी फंड जारी करने और तेल प्रतिबंधों में राहत जैसी मांगें शामिल हैं। इसके बदले तेहरान होर्मुज़ को खोलने और व्यापक वार्ता शुरू करने की बात कर रहा है।
अमेरिका ने अभी तक इस प्रस्ताव को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, मध्यस्थों के जरिए बातचीत जारी है।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर मतभेद
ईरान युद्ध के साथ सबसे जटिल मुद्दा उसका परमाणु कार्यक्रम है। तेहरान ने संकेत दिया है कि वह अपने परमाणु अधिकारों पर रियायत देने के लिए तैयार नहीं है।
रॉयटर्स के अनुसार, एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा कि अमेरिका के प्रस्ताव को स्वीकार करने की स्थिति में भी ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम से संबंधित अधिकारों पर समझौता नहीं करेगा। इसमें यूरेनियम संवर्धन और देश में मौजूद अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
अमेरिका की सार्वजनिक स्थिति इसके विपरीत है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकने की प्रतिबद्धता दोहराई है। इसलिए परमाणु कार्यक्रम आगे की किसी भी वार्ता में प्रमुख विवाद बना रहेगा।
ट्रंप-शी बातचीत का व्यापक संदर्भ
ट्रंप और शी की बैठक केवल ईरान तक सीमित नहीं थी। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ताइवान समेत कई रणनीतिक मुद्दों पर भी मतभेद हैं। एपी के अनुसार, दोनों देशों के बीच ईरान को लेकर भी दृष्टिकोण अलग हैं।
इसके बावजूद दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों में स्थिरता और संवाद बनाए रखने पर जोर दिया है। शी ने दोनों देशों के रिश्ते को रणनीतिक स्थिरता के आधार पर आगे बढ़ाने की बात कही।
चीन के लिए ईरान संकट का आर्थिक असर
ईरान युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ाया है। होर्मुज़ में व्यवधान से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है।
चीन दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है। इसलिए खाड़ी क्षेत्र से तेल की आपूर्ति में लंबे समय तक बाधा बीजिंग के लिए आर्थिक और रणनीतिक चुनौती बन सकती है। रॉयटर्स ने भी होर्मुज़ संकट को चीन के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा मुद्दे के रूप में रेखांकित किया है।
अमेरिका की चिंता, चीन की कूटनीति
वॉशिंगटन की प्राथमिकता ईरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव बनाए रखने के साथ चीन को तेहरान की मदद से दूर रखना है। वहीं बीजिंग सार्वजनिक तौर पर वार्ता और युद्धविराम की पैरवी कर रहा है। दोनों दृष्टिकोणों के बीच अंतर साफ दिखाई देता है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि चीन ईरान संकट को खत्म कराने के लिए कितनी सक्रिय मध्यस्थ भूमिका निभाएगा। सार्वजनिक रूप से चीन ने संवाद की अपील की है, लेकिन अमेरिका-ईरान विवाद की मुख्य शर्तों पर अंतिम फैसला दोनों पक्षों के बीच बातचीत से ही होगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच वॉशिंगटन में हुई बातचीत में ईरान युद्ध भी अहम मुद्दा रहा। दोनों नेताओं की मुलाकात ऐसे वक्त हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से सैन्य संघर्ष जारी है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में समुद्री आवाजाही पर संकट बना हुआ है।
चीनी राष्ट्रपति ने अमेरिका और ईरान से बातचीत और कूटनीति की राह पर लौटने की अपील की। चीन ने दोनों देशों के बीच पहले हुए समझौते के ढांचे को फिर सक्रिय करने की भी वकालत की है।
शी जिनपिंग ने बातचीत बहाल करने पर दिया जोर
चीन की सरकारी एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक, शी जिनपिंग ने ट्रंप से कहा कि अमेरिका और ईरान को जल्द से जल्द संवाद और वार्ता के रास्ते पर लौटना चाहिए। उन्होंने कहा कि चीन तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान को आगे बढ़ाने के लिए रचनात्मक भूमिका निभाता रहा है।
शी ने अमेरिका और ईरान से जून में बने इस्लामाबाद एमओयू की ओर लौटने की अपील भी की। उनके मुताबिक, दोनों देशों को परमाणु मुद्दे समेत दूसरे विवादित विषयों को शामिल करते हुए व्यापक समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
ट्रंप ने चीन को लेकर क्या कहा
अमेरिकी पक्ष ने बातचीत के दौरान ईरान को चीन की संभावित सहायता को लेकर अपनी चिंता स्पष्ट की। अमेरिका के चीन में राजदूत डेविड पर्ड्यू ने कहा कि ट्रंप ने शी को स्पष्ट किया कि ईरान को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मदद देना वॉशिंगटन के लिए स्वीकार्य नहीं है। इसमें खुफिया जानकारी, सैन्य उपकरण और अन्य पुर्जों से जुड़ी सहायता भी शामिल है।
अमेरिकी आरोपों के मुताबिक, चीन से ईरान को संभावित सैन्य और अन्य सहायता मिलने की चिंता वॉशिंगटन पहले भी उठा चुका है। हालांकि, इन आरोपों और चीनी भूमिका को लेकर बीजिंग की अपनी स्थिति अलग है। इसलिए इसे अमेरिकी पक्ष का दावा मानकर ही रिपोर्ट करना उचित है।
चीन का रुख क्या है
बीजिंग ने सार्वजनिक रूप से युद्ध के समाधान के लिए बातचीत और तनाव कम करने पर जोर दिया है। शी ने कहा कि चीन सभी देशों की संप्रभुता और सुरक्षा का सम्मान करने के पक्ष में है और संबंधित पक्षों से शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में आगे बढ़ने की अपील करता रहा है।
चीन के लिए ईरान संकट का आर्थिक पहलू भी महत्वपूर्ण है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान का असर चीन समेत एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। रॉयटर्स के अनुसार, क्षेत्रीय संघर्ष ने दुनिया के महत्वपूर्ण तेल और शिपिंग मार्गों पर दबाव बढ़ाया है।
होर्मुज़ संकट क्यों महत्वपूर्ण है
ट्रंप और शी की बातचीत ऐसे समय हुई जब ईरान ने अमेरिका के सामने सात दिन का एक प्रस्ताव रखा है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के अनुसार, जरूरी शर्तें स्वीकार होने पर सात दिनों के भीतर होर्मुज़ जलडमरूमध्य में सामान्य समुद्री आवाजाही बहाल करने का प्रस्ताव है।
ईरानी प्रस्ताव में अमेरिकी नाकेबंदी हटाने, जमे हुए ईरानी फंड जारी करने और तेल प्रतिबंधों में राहत जैसी मांगें शामिल हैं। इसके बदले तेहरान होर्मुज़ को खोलने और व्यापक वार्ता शुरू करने की बात कर रहा है।
अमेरिका ने अभी तक इस प्रस्ताव को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, मध्यस्थों के जरिए बातचीत जारी है।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर मतभेद
ईरान युद्ध के साथ सबसे जटिल मुद्दा उसका परमाणु कार्यक्रम है। तेहरान ने संकेत दिया है कि वह अपने परमाणु अधिकारों पर रियायत देने के लिए तैयार नहीं है।
रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा कि अमेरिका के प्रस्ताव को स्वीकार करने की स्थिति में भी ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम से संबंधित अधिकारों पर समझौता नहीं करेगा। इसमें यूरेनियम संवर्धन और देश में मौजूद अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
अमेरिका की सार्वजनिक स्थिति इसके विपरीत है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकने की प्रतिबद्धता दोहराई है। इसलिए परमाणु कार्यक्रम आगे की किसी भी वार्ता में प्रमुख विवाद बना रहेगा।
ट्रंप-शी बातचीत का व्यापक संदर्भ
ट्रंप और शी की बैठक केवल ईरान तक सीमित नहीं थी। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ताइवान समेत कई रणनीतिक मुद्दों पर भी मतभेद हैं। एपी के अनुसार, दोनों देशों के बीच ईरान को लेकर भी दृष्टिकोण अलग हैं।
इसके बावजूद दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों में स्थिरता और संवाद बनाए रखने पर जोर दिया है। शी ने दोनों देशों के रिश्ते को रणनीतिक स्थिरता के आधार पर आगे बढ़ाने की बात कही।
चीन के लिए ईरान संकट का आर्थिक असर
ईरान युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दबाव बढ़ाया है। होर्मुज़ में व्यवधान से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है।
चीन दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है। इसलिए खाड़ी क्षेत्र से तेल की आपूर्ति में लंबे समय तक बाधा बीजिंग के लिए आर्थिक और रणनीतिक चुनौती बन सकती है। रॉयटर्स ने भी होर्मुज़ संकट को चीन के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा मुद्दे के रूप में रेखांकित किया है।
अमेरिका की चिंता, चीन की कूटनीति
वॉशिंगटन की प्राथमिकता ईरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव बनाए रखने के साथ चीन को तेहरान की मदद से दूर रखना है। वहीं बीजिंग सार्वजनिक तौर पर वार्ता और युद्धविराम की पैरवी कर रहा है। दोनों दृष्टिकोणों के बीच अंतर साफ दिखाई देता है।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि चीन ईरान संकट को खत्म कराने के लिए कितनी सक्रिय मध्यस्थ भूमिका निभाएगा। सार्वजनिक रूप से चीन ने संवाद की अपील की है, लेकिन अमेरिका-ईरान विवाद की मुख्य शर्तों पर अंतिम फैसला दोनों पक्षों के बीच बातचीत से ही होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।