SYNOPSIS
बॉम्बे हाईकोर्ट ने दिशा सालियन की 2020 मौत की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया। अदालत ने एफआईआर दर्ज कर सभी पहलुओं की जांच, सालियन का बयान और रिकॉर्ड हस्तांतरित करने को कहा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पर्याप्त सामग्री मिलने तक किसी व्यक्ति को आरोपी नहीं माना जाएगा।
LOCATION | DATE | BYLINE
📍 मुंबई, महाराष्ट्र | 2 सितंबर 2026 | ✍️ Apurva Choudhary
दिशा सालियन केस में CBI जांच का आदेश
बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार, 2 सितंबर 2026 को दिशा सालियन की जून 2020 में हुई मौत की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी CBI को सौंपने का आदेश दिया। अदालत ने एजेंसी को FIR दर्ज करने, मामले की परिस्थितियों के सभी पहलुओं की जांच करने और दिशा के पिता सतीश सालियन का बयान दर्ज करने का निर्देश दिया है।
यह फैसला छह साल पुराने उस मामले में अहम कानूनी पेशरफ़्त है, जिसकी शुरुआती जांच मुंबई पुलिस ने की थी। हाईकोर्ट ने जांच में देरी और FIR दर्ज नहीं किए जाने को लेकर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि मामले की जांच लंबे समय तक जारी रही, लेकिन उससे कई सवालों के जवाब मिलने के बजाय नए सवाल खड़े हुए।
अदालत ने हालांकि एक महत्वपूर्ण कानूनी हद भी साफ कर दी है। CBI जांच का आदेश किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने या दिशा सालियन की मौत को हत्या घोषित करने का फैसला नहीं है; जांच में पर्याप्त सामग्री मिलने के बाद ही किसी व्यक्ति को आरोपी के तौर पर देखा जा सकेगा।
अदालत ने CBI को क्या निर्देश दिए
हाईकोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति सारंग कोतवाल और न्यायमूर्ति रंजीतसिंह भोंसले शामिल थे। अदालत ने CBI के मुंबई क्षेत्र के Joint Director को एक वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी नियुक्त करने को कहा, जो सतीश सालियन का बयान दर्ज करने के साथ FIR की कार्रवाई आगे बढ़ाए।
मुंबई पुलिस को मामले से संबंधित रिकॉर्ड और कागजात CBI को तत्काल सौंपने का भी निर्देश दिया गया है। अदालत ने यह व्यवस्था इसलिए की है ताकि नई जांच उपलब्ध रिकॉर्ड, दस्तावेज़ और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ सके।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर जांच में कोई संज्ञेय अपराध बनता है तो CBI को आगे कानूनी कार्रवाई करनी होगी। अगर जांच के बाद ऐसा मामला नहीं बनता, तो एजेंसी को संबंधित अदालत के सामने उचित summary report दाखिल करनी होगी। सतीश सालियन को उस रिपोर्ट को चुनौती देने की स्वतंत्रता भी दी गई है।
8 जून 2020 को क्या हुआ था
दिशा सालियन की मौत 8 जून 2020 को मुंबई के मालाड इलाके में एक ऊंची आवासीय इमारत से गिरने के बाद हुई थी। समकालीन पुलिस कार्रवाई में मामले को Accidental Death Report यानी ADR के तौर पर दर्ज किया गया था। बाद की पुलिस जांच में मौत को आत्महत्या बताया गया था।
दिशा सालियन ने मनोरंजन उद्योग में मैनेजर के तौर पर काम किया था और वह कुछ समय के लिए अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की भी मैनेजर रही थीं। 14 जून 2020 को सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद दोनों घटनाओं के बीच कथित संबंध को लेकर सार्वजनिक चर्चा और कई तरह के दावे सामने आए।
लेकिन दोनों घटनाओं के बीच किसी आपराधिक संबंध को अदालत ने अपने मौजूदा आदेश में स्थापित तथ्य के तौर पर घोषित नहीं किया है। इसलिए सोशल मीडिया या राजनीतिक बहस में किए गए दावों और अदालत द्वारा साक्ष्यों के आधार पर तय किए जाने वाले तथ्यों के बीच फर्क बनाए रखना जरूरी है।
परिवार ने क्यों मांगी नई जांच
दिशा के पिता सतीश सालियन ने पिछले साल बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था। उन्होंने अपनी बेटी की मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए नई जांच और FIR की मांग की थी। उनकी याचिका में गंभीर आपराधिक आरोप लगाए गए थे, जिनमें बलात्कार और हत्या का आरोप भी शामिल था।
याचिकाकर्ता की तरफ से मुंबई पुलिस की शुरुआती जांच में कथित कमियों और कुछ मेडिकल तथा जांच संबंधी पहलुओं पर भी सवाल उठाए गए। सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस से यह स्पष्टीकरण मांगा था कि परिवार की शिकायत के बावजूद FIR क्यों दर्ज नहीं की गई और कुछ रिकॉर्ड परिवार को उपलब्ध कराने में इतनी देरी क्यों हुई।
हालांकि इन आरोपों को जांच के निष्कर्ष के रूप में पेश नहीं किया जा सकता। सतीश सालियन की याचिका में लगाए गए आरोप अब CBI जांच के दायरे में आएंगे और उनका सत्यापन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होना है।
हाईकोर्ट ने पुलिस जांच पर क्या कहा
2 सितंबर के फैसले में हाईकोर्ट ने करीब छह साल तक चली पुलिस जांच पर सवाल उठाए। PTI के मुताबिक, अदालत ने कहा कि इतनी लंबी अवधि तक जांच चलना उचित नहीं है और उपलब्ध पुलिस जांच कई सवालों का जवाब देने के बजाय और सवाल पैदा करती है। इसी संदर्भ में अदालत ने CBI जांच को आवश्यक माना।
यह टिप्पणी अपने आप में हत्या या किसी साजिश का न्यायिक निष्कर्ष नहीं है। अदालत ने जांच की गुणवत्ता और उसकी अवधि को लेकर चिंता जताते हुए नई एजेंसी से व्यापक जांच कराने का रास्ता चुना है। यही अंतर इस आदेश को समझने में सबसे अहम है।
अदालत ने जांच के दौरान किसी व्यक्ति को सिर्फ आरोप या नाम सामने आने के आधार पर आरोपी मानने से भी साफ तौर पर मना किया है। CBI को पहले सामग्री जुटानी होगी और फिर यह तय करना होगा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है या नहीं।
राजनीतिक आरोपों का पहलू
इस मामले ने पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र की सियासत में भी जगह बनाई है। सतीश सालियन की याचिका में शिवसेना (UBT) नेता आदित्य ठाकरे के खिलाफ FIR की मांग भी की गई थी। याचिका में अन्य लोगों के खिलाफ भी गंभीर आरोपों का उल्लेख किया गया, लेकिन ये आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं हैं।
आदित्य ठाकरे ने इन आरोपों को खारिज किया है। उनके पक्ष ने अदालत में मामले को राजनीतिक रूप से प्रेरित और उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने वाला बताया तथा यह दलील रखी कि किसी व्यक्ति को बिना ठोस सामग्री के आपराधिक मामले से जोड़ना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट का मौजूदा आदेश इस विवाद में किसी राजनीतिक पक्ष की पुष्टि नहीं करता। इसके बजाय अदालत ने जांच एजेंसी को तथ्य और साक्ष्य के आधार पर आगे बढ़ने की जिम्मेदारी दी है। इसलिए CBI जांच का अगला चरण ही यह स्पष्ट कर सकता है कि लगाए गए आरोपों में कोई आपराधिक आधार निकलता है या नहीं।
सुशांत सिंह राजपूत से कथित लिंक कितना स्थापित है
दिशा सालियन और सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बीच सिर्फ छह दिन का अंतर होने के कारण दोनों घटनाओं को लेकर लंबे समय से सार्वजनिक जिज्ञासा बनी रही है। सुशांत की मौत 14 जून 2020 को हुई थी, जबकि दिशा की मौत 8 जून को हुई थी।
लेकिन तारीखों का यह संयोग अपने आप में दोनों मौतों के बीच आपराधिक संबंध साबित नहीं करता। CBI को दिशा सालियन की मौत की परिस्थितियों की जांच करनी है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह तय करना होगा कि किसी अपराध का मामला बनता है या नहीं।
सुशांत सिंह राजपूत की मौत से संबंधित अलग CBI जांच भी हुई थी। मौजूदा दिशा सालियन मामले की जांच को उसी आधार पर किसी निष्कर्ष तक पहुंचा हुआ मानना उचित नहीं होगा। दोनों मामलों के बीच संबंध का सवाल तभी तथ्यात्मक रूप से मजबूत होगा जब जांच में स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य सामने आएं।
अब CBI के सामने क्या चुनौती होगी
नई जांच के सामने सबसे बड़ी चुनौती छह साल पुराने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों को व्यवस्थित तरीके से फिर से परखना होगी। CBI को पुलिस रिकॉर्ड, मेडिकल दस्तावेज़, घटनास्थल से जुड़े साक्ष्य, उपलब्ध तकनीकी सामग्री और संबंधित लोगों के बयानों का परीक्षण करना होगा।
इतने लंबे अंतराल के बाद साक्ष्यों की स्थिति भी जांच के लिए अहम होगी। डिजिटल रिकॉर्ड, CCTV या अन्य तकनीकी सामग्री की उपलब्धता और उसकी प्रामाणिकता अलग-अलग तरीके से सत्यापित करनी पड़ सकती है। अदालत ने इसी वजह से जांच को व्यापक रखने का निर्देश दिया है।
साथ ही, CBI के लिए निष्पक्षता बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। मामला पहले से राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहा है, इसलिए आरोपों, मीडिया नैरेटिव और सोशल मीडिया दावों के बजाय जांच में प्रमाणित सामग्री को प्राथमिक आधार बनाना जरूरी होगा।
क्या CBI जांच से हत्या साबित हो गई?
नहीं। यह सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु है। हाईकोर्ट ने केवल जांच CBI को सौंपने और FIR दर्ज करने का आदेश दिया है; अदालत ने यह फैसला नहीं दिया कि दिशा सालियन की हत्या हुई थी या किसी विशेष व्यक्ति ने उनकी मौत में भूमिका निभाई थी।
FIR आपराधिक जांच की शुरुआत होती है, अंतिम निष्कर्ष नहीं। जांच के दौरान यदि पर्याप्त सामग्री मिलती है तो आरोप तय करने और आगे की कानूनी कार्रवाई का सवाल उठ सकता है; यदि पर्याप्त आधार नहीं मिलता, तो CBI को summary report दाखिल करने का विकल्प भी अदालत ने स्पष्ट रखा है।
इसलिए मौजूदा स्थिति में “हत्या साबित”, “साजिश साबित” या किसी व्यक्ति को “आरोपी” कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। सही स्थिति यह है कि अब इन दावों की जांच केंद्रीय एजेंसी करेगी।
आगे की राह क्या है
अब CBI को हाईकोर्ट के निर्देश के मुताबिक वरिष्ठ अधिकारी के नेतृत्व में जांच शुरू करनी है। सबसे पहले संबंधित रिकॉर्ड हासिल करना, शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करना और FIR की प्रक्रिया पूरी करना जांच के शुरुआती चरण होंगे। इसके बाद एजेंसी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करेगी।
जांच का परिणाम अभी खुला हुआ है। एक संभावना यह है कि CBI को किसी संज्ञेय अपराध के पर्याप्त संकेत मिलें और जांच आगे बढ़े; दूसरी संभावना यह है कि उपलब्ध सामग्री किसी आपराधिक मामले को साबित करने के लिए पर्याप्त न हो और एजेंसी summary report दाखिल करे। दोनों स्थितियों का फैसला जांच के बाद ही हो सकता है।
इस मामले का महत्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि यह दिशा सालियन की मौत से जुड़ा है, बल्कि इसलिए भी है कि अदालत ने छह साल पुरानी जांच में उठे सवालों के बाद नई जांच व्यवस्था बनाई है। अब सार्वजनिक बहस से ज्यादा महत्व उस साक्ष्य का होगा जिसे CBI स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सके।
दिशा सालियन केस में स्थापित तथ्य यह है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2 सितंबर 2026 को CBI को जांच सौंपते हुए FIR दर्ज करने और मामले के सभी पहलुओं की पड़ताल करने का आदेश दिया है। मुंबई पुलिस को रिकॉर्ड CBI को सौंपने और एजेंसी को वरिष्ठ अधिकारी के जरिए जांच आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।
वहीं, हत्या, बलात्कार, साजिश या किसी व्यक्ति की भूमिका से जुड़े आरोप अभी जांच का विषय हैं, न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं। हाईकोर्ट की स्पष्ट हिदायत है कि पर्याप्त सामग्री मिलने तक किसी को आरोपी नहीं माना जाए।
अब इस मामले में सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि CBI पुराने रिकॉर्ड और नए सिरे से जुटाई जाने वाली सामग्री के आधार पर क्या निष्कर्ष निकालती है। छह साल बाद शुरू हुई यह जांच तभी विश्वसनीय जवाब दे सकेगी, जब उसका आधार आरोप या राजनीतिक नैरेटिव नहीं, बल्कि सत्यापित और अदालत में टिक सकने वाला साक्ष्य होगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।