पाकिस्तान के PM शहबाज शरीफ ने दिवाली पर हिंदू समुदाय को बधाई दी। उन्होंने अल्पसंख्यकों के अधिकार, धार्मिक आज़ादी और आपसी भाईचारे की बात कही।
📍 इस्लामाबाद, पाकिस्तान
🗓️ 8 नवंबर 2026
✍️ Mohd Naved
शहबाज शरीफ ने दिवाली पर क्या कहा?
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने 8 नवंबर 2026 को दिवाली के अवसर पर हिंदू समुदाय के लिए विशेष संदेश जारी किया। पाकिस्तान सरकार के प्रेस इन्फॉर्मेशन डिपार्टमेंट की आधिकारिक विज्ञप्ति के मुताबिक, उन्होंने दुनिया भर के हिंदुओं और विशेष रूप से पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू नागरिकों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दीं।
अपने संदेश में शरीफ ने दिवाली को नफरत, असहिष्णुता और निराशा के अंधेरे पर रोशनी की जीत का प्रतीक बताया।
उन्होंने कहा कि रोशनी का यह त्योहार इंसानी रिश्तों और सामाजिक जीवन में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने का संदेश देता है। उनके मुताबिक, बेहतर और समृद्ध भविष्य की उम्मीद दिवाली के सबसे अहम संदेशों में शामिल है।
यह संदेश पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी किया गया।
हिंदू समुदाय को बताया पाकिस्तान की राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा
शहबाज शरीफ ने अपने संदेश में पाकिस्तान के हिंदू समुदाय के योगदान की खुलकर तारीफ की।
उन्होंने कहा कि हिंदू समुदाय पाकिस्तान के राष्ट्रीय ताने-बाने का एक मूल्यवान और अभिन्न हिस्सा है। देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विकास में इस समुदाय का योगदान सराहनीय है।
प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को राष्ट्रीय संपत्ति बताते हुए कहा कि देश को अपनी इस विविधता पर गर्व है।
उन्होंने सभी नागरिकों के अधिकारों, सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए सरकार की प्रतिबद्धता भी दोहराई।
उनके बयान का केंद्रीय संदेश यह था कि किसी भी नागरिक के साथ उसके धर्म, आस्था, रंग या जातीय पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।
पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति पर क्यों उठते हैं सवाल?
शहबाज शरीफ का संदेश कूटनीतिक और सामाजिक दृष्टि से अहम है, लेकिन पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की वास्तविक स्थिति को लेकर लंबे समय से बहस जारी है।
यूरोपियन यूनियन एजेंसी फॉर एसाइलम (EUAA) की अक्टूबर 2026 की कंट्री गाइडेंस के मुताबिक, पाकिस्तान में लगभग 40 लाख हिंदू रहते हैं। इनकी बड़ी आबादी सिंध प्रांत में केंद्रित है।
रिपोर्ट में हिंदू समुदाय के सामने अपहरण, जबरन धर्मांतरण, बंधुआ मजदूरी, हिंसा, धार्मिक आरोपों और सामाजिक भेदभाव जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदू महिलाओं और लड़कियों के अपहरण, जबरन शादी और धर्मांतरण से जुड़े मामले भी सामने आते रहे हैं। धार्मिक स्थलों पर हमले, जमीन पर कब्जे और सामाजिक बहिष्कार की घटनाओं का भी ज़िक्र किया गया है।
यह आंकड़े और आकलन पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के सामने मौजूद चुनौतियों की गंभीरता को सामने रखते हैं। हालांकि, इन समस्याओं के लिए जिम्मेदारी तय करते समय प्रत्येक मामले के तथ्य और संबंधित संस्थाओं की भूमिका अलग-अलग देखना ज़रूरी है।
मानवाधिकार रिपोर्ट में भी दर्ज हैं अल्पसंख्यकों की चुनौतियां
ह्यूमन राइट्स वॉच की वर्ल्ड रिपोर्ट 2026 में पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं दर्ज की गई हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, ईशनिंदा कानूनों के इस्तेमाल ने धार्मिक अल्पसंख्यकों को मनमानी गिरफ्तारी और मुकदमों के जोखिम में रखा है। कथित ईशनिंदा के आरोपों पर भीड़ और vigilante समूहों के हमलों का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट ने अपराधियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की कमी पर सवाल उठाए हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार, एक संगठित ब्लैकमेल और वसूली नेटवर्क के जरिए कम से कम 450 लोगों पर कथित तौर पर झूठे ईशनिंदा आरोप लगाए गए थे।
इस रिपोर्ट का दायरा केवल हिंदू समुदाय तक सीमित नहीं है। इसमें ईसाइयों, अहमदियों और दूसरे धार्मिक समूहों से जुड़े मामलों का भी उल्लेख है।
इसलिए पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर चर्चा करते समय इन संस्थागत और सामाजिक चुनौतियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
दिवाली संदेश और पाकिस्तान की जमीनी हकीकत
शहबाज शरीफ के बयान और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति के बीच एक अहम सवाल खड़ा होता है। क्या सरकारी स्तर पर भाईचारे और धार्मिक स्वतंत्रता की घोषणा का असर आम नागरिकों की जिंदगी में भी दिखाई देता है?
किसी प्रधानमंत्री का त्योहार पर शुभकामना संदेश देना सकारात्मक सामाजिक संकेत है। लेकिन धार्मिक सद्भाव की असली कसौटी केवल सरकारी बयानों में नहीं, बल्कि कानून के निष्पक्ष अमल, नागरिकों की सुरक्षा और धार्मिक स्थलों की हिफाजत में होती है।
पाकिस्तान में हिंदू समुदाय की समस्याओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में जिन घटनाओं का उल्लेख हुआ है, वे सरकार के सामने जवाबदेही की चुनौती पेश करती हैं।
खास तौर पर महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा, जबरन धर्मांतरण के आरोपों की निष्पक्ष जांच, संपत्ति विवाद और धार्मिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है।
भारत-पाकिस्तान संबंधों के बीच संदेश का कूटनीतिक महत्व
भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं। आतंकवाद, सीमा सुरक्षा, कश्मीर और आपसी राजनीतिक बयानबाजी दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करते रहे हैं।
ऐसे माहौल में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का भारतीय उपमहाद्वीप के प्रमुख धार्मिक त्योहार दिवाली पर संदेश देना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रम है।
हालांकि, इस संदेश को भारत-पाकिस्तान संबंधों में किसी बड़े बदलाव का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। इसके लिए दोनों देशों की सरकारों के बीच वास्तविक संवाद, सुरक्षा संबंधी सहयोग और तनाव कम करने के ठोस कदमों को देखना होगा।
दिवाली की शुभकामनाएं अपने आप में द्विपक्षीय रिश्तों में सुधार का प्रमाण नहीं हैं। फिर भी, धार्मिक सद्भाव और इंसानी रिश्तों के बारे में दिया गया संदेश क्षेत्रीय माहौल में सकारात्मक संवाद की गुंजाइश बनाता है।
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भी दी बधाई
दिवाली के अवसर पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भी हिंदू समुदाय को शुभकामनाएं दीं।
रेडियो पाकिस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, जरदारी ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा को सभी नागरिकों की साझा जिम्मेदारी बताया।
उन्होंने पाकिस्तान के हिंदू समुदाय को राष्ट्रीय जीवन का अभिन्न हिस्सा बताते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, कारोबार, सार्वजनिक सेवा और कला-संस्कृति में उसके योगदान की सराहना की।
राष्ट्रपति ने कहा कि पाकिस्तान के सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलना चाहिए और हर व्यक्ति को अपनी आस्था के मुताबिक जीवन जीने की आज़ादी होनी चाहिए।
इस तरह दिवाली के मौके पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दोनों ने धार्मिक विविधता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर सार्वजनिक संदेश दिया।
क्या सरकारी संदेश से बदलेगी अल्पसंख्यकों की स्थिति?
पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार का आकलन केवल त्योहारों पर जारी होने वाले बयानों से नहीं किया जा सकता।
इसके लिए कुछ बुनियादी सवाल अहम हैं। क्या जबरन धर्मांतरण के आरोपों की निष्पक्ष जांच होती है? क्या धार्मिक अल्पसंख्यकों की लड़कियों को पर्याप्त सुरक्षा मिलती है? क्या धार्मिक स्थलों और संपत्तियों पर कब्जे की शिकायतों पर कार्रवाई होती है? क्या हिंसा करने वालों को कानून के मुताबिक सजा मिलती है?
इन सवालों के जवाब पाकिस्तान सरकार की वास्तविक नीतियों और प्रशासनिक कार्रवाई से मिलेंगे।
शहबाज शरीफ ने अपने संदेश में अधिकारों की सुरक्षा का भरोसा दिया है। अब इस प्रतिबद्धता की असली परीक्षा उसके क्रियान्वयन में होगी।
भाईचारे का संदेश और जवाबदेही की जरूरत
दिवाली का संदेश रोशनी, उम्मीद और आपसी सद्भाव से जुड़ा है। धार्मिक विविधता वाले किसी भी देश में सभी समुदायों को बराबर सम्मान और सुरक्षा मिलना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जरूरत है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का संदेश इस लिहाज से अहम है कि उन्होंने हिंदू समुदाय को देश की राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा स्वीकार किया और उसके योगदान को सराहा।
लेकिन इस बयान के साथ पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से जुड़े पुराने सवाल भी फिर चर्चा में आ गए हैं।
सरकारी घोषणाओं और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी कम करना ही धार्मिक सद्भाव की दिशा में वास्तविक प्रगति होगी। पाकिस्तान सरकार के सामने चुनौती यही है कि दिवाली पर दिया गया भाईचारे का संदेश पूरे साल नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा में भी दिखाई दे।