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प्रेग्नेंसी के इन मिथकों पर न करें भरोसा, जानें मेडिकल सच

Neelam Saini 2026-08-26 22:52:34
प्रेग्नेंसी के इन मिथकों पर न करें भरोसा, जानें मेडिकल सच

प्रेग्नेंसी के इन मिथकों पर न करें भरोसा, जानें मेडिकल सच

प्रेग्नेंसी में अल्ट्रासाउंड से लेकर एक्सरसाइज तक, क्या है सच?

प्रेग्नेंसी में क्या करें, क्या न करें? मिथक और मेडिकल सच जानिए

📍 Location: नई दिल्ली
📰 Date: 26 अगस्त 2026
✍️ Neelam Saini

प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को परिवार, सोशल मीडिया और इंटरनेट से कई तरह की सलाह मिलती है। इनमें कुछ उपयोगी होती हैं, लेकिन कई धारणाओं का वैज्ञानिक आधार स्पष्ट नहीं होता। अल्ट्रासाउंड, दवाओं, एक्सरसाइज और बेड रेस्ट जैसे मुद्दों पर मेडिकल संस्थाओं की गाइडलाइंस व्यक्तिगत चिकित्सकीय स्थिति को प्राथमिकता देती हैं।

प्रेग्नेंसी में मिथक और मेडिकल सच

प्रेग्नेंसी महिला के जीवन का ऐसा दौर है, जब शरीर और दिनचर्या में कई बदलाव आते हैं। इसी दौरान होने वाली मां को खानपान, दवाओं, जांच, नींद और रोजमर्रा की गतिविधियों को लेकर परिवार और सोशल मीडिया से तरह-तरह की सलाह भी मिलने लगती है।समस्या तब शुरू होती है जब किसी रिश्तेदार का व्यक्तिगत अनुभव या सोशल मीडिया पर वायरल दावा मेडिकल सलाह की जगह लेने लगता है। विशेषज्ञ संस्थाओं की गाइडलाइंस का मूल संदेश यह है कि गर्भावस्था में सलाह महिला की व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति, गर्भावस्था की प्रकृति और चिकित्सकीय मूल्यांकन के आधार पर तय होनी चाहिए। 

अल्ट्रासाउंड को लेकर डर कितना सही?

प्रेग्नेंसी में अल्ट्रासाउंड को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि बार-बार जांच कराने से बच्चे को नुकसान हो सकता है या नहीं। यहां मेडिकल साइंस और एक्स-रे के बीच अंतर समझना जरूरी है।यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक अल्ट्रासाउंड इमेजिंग हाई-फ्रीक्वेंसी साउंड वेव्स का इस्तेमाल करती है और इसमें एक्स-रे की तरह आयनकारी विकिरण नहीं होता। गर्भावस्था में इसका इस्तेमाल भ्रूण और मां की स्थिति का चिकित्सकीय आकलन करने के लिए किया जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि अल्ट्रासाउंड को बिना जरूरत बार-बार कराया जाए। एफडीए के अनुसार प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी द्वारा चिकित्सकीय जरूरत के मुताबिक इसका इस्तेमाल करना उचित है, जबकि अनावश्यक और लंबे समय तक एक्सपोजर से बचने की सलाह दी जाती है। इसलिए ‘अल्ट्रासाउंड हमेशा नुकसानदायक है’ कहना सही नहीं है। वहीं, केवल तस्वीर या वीडियो लेने के लिए गैर-जरूरी अल्ट्रासाउंड कराने को मेडिकल जांच का विकल्प भी नहीं माना जाना चाहिए।

क्या प्रेग्नेंसी में हर दवा खतरनाक होती है?

यह भी एक आम धारणा है कि गर्भावस्था में कोई भी दवा बिल्कुल नहीं लेनी चाहिए। सच इससे ज्यादा जटिल है।
एनएचएस के मुताबिक प्रेग्नेंसी में कई दवाएं प्लेसेंटा के जरिए भ्रूण तक पहुंच सकती हैं, इसलिए दवा लेने से पहले डॉक्टर, मिडवाइफ या फार्मासिस्ट से यह जांचना जरूरी है कि वह उस स्थिति में उपयुक्त है या नहीं। साथ ही, पहले से चल रही डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा को अपने स्तर पर बंद करना भी उचित नहीं है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि दवा है या नहीं। अहम सवाल यह है कि कौन-सी दवा, कितनी मात्रा में, गर्भावस्था के किस चरण में और किस चिकित्सकीय वजह से ली जा रही है।कुछ दवाओं में गर्भावस्था के दौरान विशेष सावधानी जरूरी होती है। उदाहरण के लिए एफडीए ने गर्भावस्था के लगभग 20 सप्ताह या उसके बाद एनएसएआईडी दवाओं के इस्तेमाल को लेकर विशेष चेतावनी दी है, हालांकि कुछ चिकित्सकीय परिस्थितियों में डॉक्टर की निगरानी में अपवाद हो सकते हैं। 

क्या दवा अचानक बंद कर देना सही है?

सोशल मीडिया पर अक्सर ‘प्रेग्नेंसी पता चलते ही सारी दवाएं बंद कर दें’ जैसी सलाह दिखाई दे सकती है। यह भी सुरक्षित सार्वभौमिक नियम नहीं है। एनएचएस स्पष्ट रूप से सलाह देता है कि गर्भावस्था का पता चलने पर नियमित रूप से ली जा रही दवा के बारे में डॉक्टर से जल्द बात करें और डॉक्टर की सलाह के बिना प्रिस्क्राइब की गई दवा बंद न करें। कुछ स्थितियों में दवा रोकने से मां और भ्रूण दोनों के लिए समस्या पैदा हो सकती है। यही वजह है कि ‘दवा लेना’ और ‘दवा बंद करना’, दोनों फैसले मेडिकल गाइडेंस के साथ होने चाहिए।

क्या बाईं करवट सोना अनिवार्य है?

गर्भावस्था में सोने की स्थिति को लेकर भी कई तरह की बातें कही जाती हैं। खासकर यह धारणा आम है कि महिला को हर समय सिर्फ बाईं करवट ही सोना चाहिए।अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियंस एंड गायनेकोलॉजिस्ट्स के अनुसार जैसे-जैसे पेट बढ़ता है, खासकर दूसरी और तीसरी तिमाही में पीठ के बल लंबे समय तक लेटना कुछ महिलाओं के लिए समस्या पैदा कर सकता है, क्योंकि गर्भाशय का वजन एक बड़ी रक्तवाहिका पर दबाव डाल सकता है। करवट लेकर सोना इस दौरान बेहतर विकल्प हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि महिला कुछ मिनट के लिए भी किसी दूसरी स्थिति में नहीं आ सकती। आराम और व्यक्तिगत चिकित्सकीय परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। यदि डॉक्टर ने किसी खास वजह से विशेष स्थिति की सलाह दी है, तो उस सलाह को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

क्या आटा गूंदने से नॉर्मल डिलीवरी होती है?

‘आटा गूंदने से नॉर्मल डिलीवरी होती है’ जैसी बातें घरेलू मान्यताओं में सुनने को मिल सकती हैं। लेकिन किसी एक घरेलू काम को सामान्य प्रसव की गारंटी बताने के लिए पर्याप्त मेडिकल आधार नहीं है।डिलीवरी का तरीका कई कारकों पर निर्भर कर सकता है। गर्भस्थ शिशु की स्थिति, मां और भ्रूण की स्वास्थ्य स्थिति, गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताएं और प्रसव के समय की चिकित्सकीय परिस्थिति इसमें भूमिका निभा सकती हैं।इसलिए आटा गूंदना या किसी खास घरेलू गतिविधि को ‘नॉर्मल डिलीवरी का उपाय’ बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। रोजमर्रा का काम करना और प्रसव के तरीके की गारंटी—दो अलग बातें हैं।

क्या प्रेग्नेंसी में ज्यादा से ज्यादा आराम करना चाहिए?

प्रेग्नेंसी का मतलब हर समय बिस्तर पर पड़े रहना नहीं है। सामान्य और बिना जटिलता वाली गर्भावस्था में शारीरिक गतिविधि कई महिलाओं के लिए सुरक्षित और लाभकारी हो सकती है।अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्स्टेट्रिशियंस एंड गायनेकोलॉजिस्ट्स के अनुसार स्वस्थ और सामान्य गर्भावस्था में नियमित शारीरिक गतिविधि शुरू करना या जारी रखना सुरक्षित माना जाता है। संस्था सामान्य परिस्थितियों में हर सप्ताह कम से कम 150 मिनट की मध्यम-तीव्रता वाली एरोबिक गतिविधि की सलाह देती है। तेज चाल से चलना, तैराकी, स्टेशनरी साइकिलिंग और संशोधित योग जैसी गतिविधियां सामान्य गर्भावस्था में विकल्प हो सकती हैं। लेकिन एक्सरसाइज की शुरुआत या रूटीन में बदलाव से पहले अपनी ऑब्स्टेट्रिशियन-गायनेकोलॉजिस्ट से सलाह लेना जरूरी है, खासकर यदि कोई मेडिकल या ऑब्स्टेट्रिक जटिलता मौजूद हो। 

क्या बेड रेस्ट हर गर्भवती महिला के लिए जरूरी है?

कई परिवारों में यह मान लिया जाता है कि ज्यादा आराम करने से प्रेग्नेंसी ज्यादा सुरक्षित रहेगी। लेकिन मेडिकल गाइडलाइंस इसे हर महिला के लिए सामान्य नियम नहीं मानतीं।एसीओजी के मुताबिक नियमित रूप से एक्टिविटी प्रतिबंधित करना प्रीटर्म बर्थ को रोकने के लिए उपचार के तौर पर नहीं दिया जाना चाहिए। संस्था यह भी बताती है कि रूटीन बेड रेस्ट से कुछ नुकसान हो सकते हैं, जिसमें ब्लड क्लॉट का जोखिम शामिल है। इसका मतलब यह नहीं कि आराम की जरूरत नहीं होती। थकान, नींद और शरीर की जरूरत के अनुसार आराम जरूरी है, लेकिन ‘जितना ज्यादा बेड रेस्ट, उतनी सुरक्षित प्रेग्नेंसी’ वाला फॉर्मूला मेडिकल साइंस से समर्थित नहीं है।

क्या एक्सरसाइज से गर्भपात या समय से पहले डिलीवरी होती है?

यह एक ऐसा डर है जिसकी वजह से कई महिलाएं गर्भावस्था में शारीरिक गतिविधि पूरी तरह बंद कर देती हैं। लेकिन सामान्य, बिना जटिलता वाली गर्भावस्था के लिए एसीओजी का रुख अलग है।एसीओजी के अनुसार सामान्य गर्भावस्था में नियमित शारीरिक गतिविधि से मिसकैरेज, कम जन्म वजन या प्रीटर्म डिलीवरी का जोखिम बढ़ने का प्रमाण नहीं मिला है। हालांकि, गतिविधि का प्रकार और उसकी तीव्रता महिला की स्थिति के अनुसार तय की जानी चाहिए। वहीं, ऐसी गतिविधियों से बचना चाहिए जिनमें गिरने या पेट पर चोट लगने का जोखिम अधिक हो। हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी या किसी चिकित्सकीय जटिलता में व्यक्तिगत मेडिकल सलाह सबसे महत्वपूर्ण है। 

क्या हर गर्भावस्था में एक जैसी सलाह लागू होती है?

प्रेग्नेंसी के बारे में सबसे जरूरी बात यही है कि हर महिला का अनुभव अलग हो सकता है। उम्र, पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याएं, गर्भावस्था की स्थिति, भ्रूण का विकास और अन्य क्लिनिकल फैक्टर डॉक्टर की सलाह को प्रभावित कर सकते हैं।इसीलिए किसी रिश्तेदार, दोस्त या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर का अनुभव दूसरे व्यक्ति के लिए मेडिकल प्रिस्क्रिप्शन नहीं बन सकता। एसीओजी भी एक्सरसाइज जैसे मामलों में व्यक्तिगत क्लिनिकल मूल्यांकन और ऑब्स्टेट्रिक केयर प्रोवाइडर की सलाह पर जोर देता है। 
यह बात दवाओं पर भी लागू होती है। एनएचएस गर्भावस्था का पता चलने पर नियमित दवाओं के बारे में डॉक्टर से जल्द चर्चा करने की सलाह देता है। 

सोशल मीडिया के दौर में मिथकों का खतरा

पहले प्रेग्नेंसी से जुड़ी मान्यताएं मुख्य रूप से परिवार और समाज के जरिए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती थीं। अब सोशल मीडिया ने इन दावों की पहुंच कई गुना बढ़ा दी है।किसी वायरल रील या पोस्ट में किसी महिला का व्यक्तिगत अनुभव दिख सकता है, लेकिन व्यक्तिगत अनुभव मेडिकल प्रमाण नहीं होता। समस्या तब गंभीर हो सकती है जब वायरल सलाह के कारण कोई महिला जरूरी जांच छोड़ दे, डॉक्टर की लिखी दवा बंद कर दे या ऐसी गतिविधि शुरू कर दे जो उसकी स्थिति के लिए उपयुक्त न हो।इसलिए प्रेग्नेंसी से जुड़ी किसी भी सलाह का स्रोत देखना जरूरी है। सरकारी स्वास्थ्य संस्थान, मेडिकल कॉलेज, मान्यता प्राप्त मेडिकल संगठन और योग्य चिकित्सक सोशल मीडिया पोस्ट की तुलना में ज्यादा विश्वसनीय स्रोत होते हैं।

किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?

मिथकों से बचने के साथ-साथ गर्भावस्था में शरीर के संकेतों को समझना भी जरूरी है। असामान्य रक्तस्राव, तेज या लगातार दर्द, सांस लेने में परेशानी अथवा भ्रूण की सामान्य गतिविधियों में स्पष्ट बदलाव जैसे लक्षणों में समय पर मेडिकल मदद लेना महत्वपूर्ण हो सकता है।
एनएचएस गर्भावस्था के दौरान रक्तस्राव और बच्चे की सामान्य मूवमेंट में बदलाव जैसी स्थितियों में तत्काल अपनी मिडवाइफ या मैटरनिटी टीम से संपर्क करने की सलाह देता है। यहां भी इंटरनेट पर खुद बीमारी का कारण तलाशने के बजाय प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी से संपर्क करना ज्यादा सुरक्षित विकल्प है।

मिथक और मेडिकल सलाह में फर्क समझें

प्रेग्नेंसी से जुड़े सभी पारंपरिक अनुभवों को गलत कहना भी सही दृष्टिकोण नहीं है। कई परिवारों की सलाह आराम, संतुलित भोजन और भावनात्मक सहयोग जैसे सकारात्मक पहलुओं पर आधारित हो सकती है।लेकिन किसी परंपरा को मेडिकल तथ्य मानने से पहले उसके वैज्ञानिक प्रमाण को देखना जरूरी है। मेडिकल साइंस में सलाह व्यक्ति की क्लिनिकल स्थिति, उपलब्ध प्रमाण और संभावित फायदे-नुकसान के आकलन के आधार पर तय होती है। यही वजह है कि ‘मेरे साथ ऐसा हुआ था’ और ‘मेडिकल रिसर्च क्या कहती है’—इन दोनों को एक ही स्तर पर नहीं रखा जा सकता।

निष्कर्ष: प्रेग्नेंसी में सलाह नहीं, सही जानकारी जरूरी

प्रेग्नेंसी के मिथक कई बार चिंता बढ़ा सकते हैं, जबकि सही मेडिकल जानकारी महिला को ज्यादा आत्मविश्वास के साथ अपनी गर्भावस्था संभालने में मदद करती है। अल्ट्रासाउंड को लेकर डर, हर दवा को खतरनाक मानना, केवल एक करवट सोने को अनिवार्य समझना या बेड रेस्ट को हर समस्या का समाधान मानना—इन सभी मामलों में व्यक्तिगत मेडिकल स्थिति महत्वपूर्ण है। 

सबसे अहम बात यह है कि सामान्य गर्भावस्था और जटिल गर्भावस्था को एक जैसा नहीं समझा जा सकता। इसलिए सोशल मीडिया, घरेलू नुस्खे या रिश्तेदारों की सलाह को अंतिम मेडिकल गाइड मानने के बजाय योग्य स्त्रीरोग विशेषज्ञ से व्यक्तिगत सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित रास्ता है।

प्रेग्नेंसी में हर सवाल का जवाब ‘क्या मेरी पड़ोसी ने ऐसा किया था?’ से नहीं, बल्कि ‘मेरी स्वास्थ्य स्थिति के लिए मेडिकल गाइडलाइन क्या कहती है?’ से तलाशना चाहिए। यही जागरूकता मां और बच्चे, दोनों की बेहतर देखभाल की बुनियाद बन सकती है।

महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सूचना: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है और व्यक्तिगत चिकित्सा सलाह का विकल्प नहीं है। गर्भावस्था में दवा, जांच, व्यायाम, डाइट या किसी उपचार में बदलाव करने से पहले अपने स्त्रीरोग विशेषज्ञ या अन्य योग्य स्वास्थ्यकर्मी से सलाह लें।


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Neelam Saini

Neelam Saini

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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