ऑस्ट्रेलिया की 'माई फ़ीड, माई वे' पहल के तहत सोशल मीडिया यूज़र्स को अपनी पसंद की फ़ीड चुनने का अधिकार देने की तैयारी है। प्रस्तावित व्यवस्था में एल्गोरिदम आधारित सुझावों के बजाय केवल फ़ॉलो किए गए अकाउंट्स की पोस्ट देखने का विकल्प मिलेगा।
ऑस्ट्रेलिया | 15 अक्टूबर 2026
By Mohd Haris
सोशल मीडिया पर आप क्या देखते हैं, इसका फ़ैसला कौन करता है? आप खुद या वे टेक्नोलॉजी कंपनियां जिनके एल्गोरिदम आपकी स्क्रीन पर हर अगली पोस्ट, वीडियो और सुझाव तय करते हैं? ऑस्ट्रेलिया में इसी सवाल को लेकर एक अहम नीतिगत पहल सामने आई है। सरकार सोशल मीडिया यूज़र्स को अपनी डिजिटल फ़ीड पर अधिक नियंत्रण देने की तैयारी कर रही है। ऑस्ट्रेलिया सरकार की प्रस्तावित 'माई फ़ीड, माई वे' पहल के तहत लोगों को एल्गोरिदम आधारित रिकमेंडेशन और केवल फ़ॉलो किए गए अकाउंट्स की सामग्री के बीच चुनाव करने का अधिकार देने की योजना है। इसका मक़सद सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर यूज़र की पसंद को अधिक अहमियत देना और डिजिटल सेवाओं की जवाबदेही बढ़ाना है। सरकार ने 15 अक्टूबर 2026 को इस प्रस्ताव से संबंधित नियमों पर सार्वजनिक राय मांगी है। हालांकि, यह व्यवस्था अभी लागू क़ानून नहीं बनी है।
क्या है ऑस्ट्रेलिया की 'माई फ़ीड, माई वे' पहल?
इस पहल का बुनियादी उद्देश्य सोशल मीडिया पर सामग्री दिखाने के मौजूदा तरीक़े में यूज़र्स की भूमिका बढ़ाना है।
फ़िलहाल कई सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म यूज़र की गतिविधियों, पसंद, देखे गए वीडियो, प्रतिक्रियाओं और दूसरी जानकारियों के आधार पर सामग्री सुझाते हैं। इन रिकमेंडेशन सिस्टम का मक़सद लोगों के सामने उनकी संभावित दिलचस्पी वाली पोस्ट और वीडियो लाना होता है।
ऑस्ट्रेलिया सरकार चाहती है कि लोगों के पास इस व्यवस्था का विकल्प मौजूद रहे।
प्रस्ताव के तहत यूज़र अपनी डिफ़ॉल्ट फ़ीड के लिए एल्गोरिदम आधारित सुझावों या फ़ॉलोइंग-ओनली व्यवस्था में से किसी एक को चुन सकेगा।
फ़ॉलोइंग-ओनली फ़ीड में प्राथमिकता उन अकाउंट्स की सामग्री को मिलेगी जिन्हें यूज़र ने खुद फ़ॉलो किया है। इससे प्लेटफ़ॉर्म द्वारा सुझाई जाने वाली अनचाही सामग्री पर निर्भरता घट सकती है।
हालांकि, इस विकल्प का अर्थ सोशल मीडिया के सभी एल्गोरिदम या तकनीकी प्रक्रियाओं को पूरी तरह बंद करना नहीं है।
सोशल मीडिया कंपनियों के सामने क्या बदल सकता है?
प्रस्तावित नियमों को मंज़ूरी मिलने पर संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म को यूज़र्स के सामने फ़ीड चुनने का स्पष्ट विकल्प उपलब्ध कराना होगा।
इससे कंपनियों के लिए यूज़र की पसंद को तकनीकी व्यवस्था का हिस्सा बनाना ज़रूरी हो जाएगा।
मौजूदा डिजिटल इकोसिस्टम में एल्गोरिदम की भूमिका केवल सामग्री दिखाने तक सीमित नहीं है। ये सिस्टम लोगों को नए क्रिएटर्स, विज्ञापन, मनोरंजन, समाचार और दूसरी डिजिटल सामग्री तक पहुंचाने में भी भूमिका निभाते हैं।
ऐसे में फ़ीड पर अधिक नियंत्रण मिलने से लोगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल का अनुभव बदल सकता है।
फिर भी यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि प्रस्ताव लागू होने के बाद सभी प्लेटफ़ॉर्म पर एक जैसी व्यवस्था दिखाई देगी। अंतिम नियमों और उनके तकनीकी अमल से ही इसकी वास्तविक तस्वीर स्पष्ट होगी।
एल्गोरिदम को लेकर लोगों की राय क्यों बंटी हुई है?
सोशल मीडिया एल्गोरिदम के पक्ष और विपक्ष में अलग-अलग तर्क मौजूद हैं।
समर्थकों का कहना है कि रिकमेंडेशन सिस्टम लोगों को उनकी दिलचस्पी के नए विषयों, क्रिएटर्स और उपयोगी जानकारी से परिचित कराते हैं। इससे यूज़र को हर विषय या अकाउंट खुद तलाशने की ज़रूरत कम होती है। दूसरी ओर, आलोचकों की चिंता है कि एल्गोरिदम आधारित फ़ीड में प्लेटफ़ॉर्म की प्राथमिकताएं यूज़र की पसंद पर हावी हो सकती हैं। विशेष रूप से तब, जब कोई सिस्टम लोगों की पिछली गतिविधियों के आधार पर बार-बार मिलती-जुलती सामग्री सामने रखता है।
सितंबर 2026 के एक यूगव सर्वेक्षण में 48% उत्तरदाताओं ने एल्गोरिदम आधारित सुझाव बंद करने को प्राथमिकता दी, जबकि 31% ने इन्हें जारी रखने की इच्छा जताई। इसी सर्वेक्षण में जेन ज़ेड के 54% उत्तरदाताओं ने एल्गोरिदम आधारित सुझावों को जारी रखने का विकल्प पसंद किया।
ये आंकड़े संकेत देते हैं कि डिजिटल फ़ीड को लेकर सभी आयु वर्गों की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं।
ऑस्ट्रेलिया सरकार का क्या कहना है?
प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ और संचार मंत्री अनिका वेल्स ने सितंबर 2026 में इस पहल का एलान किया था।
सरकार का रुख़ है कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर यूज़र्स को अपनी पसंद के मुताबिक़ फ़ीड चुनने और बाद में उसे बदलने का अवसर मिलना चाहिए।
यह पहल ऑस्ट्रेलिया के प्रस्तावित डिजिटल ड्यूटी ऑफ़ केयर क़ानूनी ढांचे से भी जुड़ी है।
इस व्यापक नीति का उद्देश्य डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराने वाली कंपनियों की ऑनलाइन सुरक्षा संबंधी ज़िम्मेदारियों को स्पष्ट करना है।
सरकार का मानना है कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के संचालन में यूज़र्स के हितों और सुरक्षा को अधिक महत्व मिलना चाहिए।
हालांकि, प्रस्तावित व्यवस्था के सभी पहलुओं पर अंतिम क़ानूनी सहमति अभी बाक़ी है।
डिजिटल सुरक्षा और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर भी सवाल
ऑस्ट्रेलिया की इस पहल ने डिजिटल सुरक्षा के साथ अभिव्यक्ति की आज़ादी और सरकारी नियमन के बीच संतुलन पर भी बहस पैदा की है।
एक पक्ष का तर्क है कि सोशल मीडिया कंपनियों को अपनी तकनीकी व्यवस्थाओं के प्रति अधिक जवाबदेह होना चाहिए।
दूसरी तरफ़ आलोचकों को आशंका है कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सरकारी नियमन बढ़ने से सामग्री के संचालन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े नए विवाद पैदा हो सकते हैं। अमेरिका की ओर से भी प्रस्तावित डिजिटल नियमन के संभावित सेंसरशिप संबंधी प्रभावों पर चिंता सामने आई है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना ज़रूरी है। यूज़र को अपनी फ़ीड चुनने का अधिकार देना और सरकार द्वारा किसी सामग्री को प्रतिबंधित करना अलग-अलग नीतिगत मुद्दे हैं। इन दोनों विषयों को एक ही प्रक्रिया मानना प्रस्ताव की वास्तविक प्रकृति को ग़लत तरीक़े से पेश करेगा।
डिजिटल विज्ञापन और कंटेंट क्रिएटर्स पर क्या असर पड़ सकता है?
सोशल मीडिया का कारोबारी मॉडल बड़े पैमाने पर यूज़र एंगेजमेंट, विज्ञापन और सामग्री की पहुंच से जुड़ा है।
एल्गोरिदम आधारित रिकमेंडेशन नए क्रिएटर्स और कारोबारों को उन लोगों तक पहुंचने में मदद करते हैं जो उन्हें पहले से फ़ॉलो नहीं करते।
अगर अधिक यूज़र फ़ॉलोइंग-ओनली फ़ीड अपनाते हैं, तो कुछ क्रिएटर्स की ऑर्गेनिक रीच और नए दर्शकों तक पहुंचने के तरीक़े प्रभावित हो सकते हैं।
दूसरी तरफ़, पहले से जुड़े दर्शकों और क्रिएटर्स के बीच सीधा संबंध अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, यह संभावित कारोबारी असर है, कोई प्रमाणित नतीजा नहीं। वास्तविक बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने लोग नया विकल्प अपनाते हैं और प्लेटफ़ॉर्म इसे किस तरह लागू करते हैं।
क्या भारत समेत दूसरे देशों के लिए भी अहम है यह पहल?
ऑस्ट्रेलिया का प्रस्ताव वैश्विक डिजिटल गवर्नेंस की बहस के लिए भी महत्वपूर्ण है।
भारत सहित कई देशों में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म सूचना, सार्वजनिक संवाद, मनोरंजन और कारोबार का बड़ा माध्यम बन चुके हैं।
ऐसे में एल्गोरिदम की पारदर्शिता, डेटा प्राइवेसी और यूज़र की पसंद से जुड़े सवाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रासंगिक हैं।
ऑस्ट्रेलिया का अनुभव भविष्य में इन विषयों पर होने वाली नीतिगत चर्चाओं के लिए एक उदाहरण बन सकता है।
लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि दूसरे देश भी इसी तरह के नियम लागू करने जा रहे हैं। हर देश की क़ानूनी व्यवस्था और डिजिटल नीति अलग है।
5 नवंबर तक मांगी गई सार्वजनिक राय
ऑस्ट्रेलिया सरकार ने प्रस्तावित नियमों पर सार्वजनिक सुझाव देने की अंतिम समयसीमा 5 नवंबर 2026 तय की है।
सुझावों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सरकार को प्राप्त प्रतिक्रियाओं पर विचार करना होगा।
इसके बाद अंतिम क़ानूनी और नियामकीय व्यवस्था स्पष्ट होगी।
अभी यह तय नहीं है कि यूज़र्स को यह विकल्प किस तारीख़ से उपलब्ध होगा या अलग-अलग प्लेटफ़ॉर्म इसे किस तकनीकी स्वरूप में पेश करेंगे।
इसलिए फ़िलहाल इसे प्रस्तावित सुधार के तौर पर देखना चाहिए, न कि लागू हो चुके डिजिटल अधिकार के रूप में।
सोशल मीडिया पर नियंत्रण का अधिकार किसके पास होना चाहिए?
ऑस्ट्रेलिया की पहल डिजिटल दुनिया में एक बुनियादी सवाल उठाती है। किसी व्यक्ति की सोशल मीडिया फ़ीड का नियंत्रण किस हद तक उसके अपने हाथ में होना चाहिए? एल्गोरिदम आधारित व्यवस्था का एक फ़ायदा यह है कि यूज़र अपनी मौजूदा फ़ॉलोइंग से बाहर की जानकारी तक भी पहुंचता है। इससे नए विचारों, कलाकारों, कारोबारों और विषयों की पहचान आसान होती है। लेकिन इसी व्यवस्था में प्लेटफ़ॉर्म यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि किस सामग्री को कितनी प्राथमिकता मिलेगी।
फ़ॉलोइंग-ओनली विकल्प यूज़र की स्पष्ट पसंद को अधिक महत्व दे सकता है।
इससे लोगों को अपने डिजिटल अनुभव को व्यवस्थित करने का अतिरिक्त अधिकार मिलेगा। हालांकि, फ़ीड का विकल्प उपलब्ध होने से ग़लत सूचना, ऑनलाइन उत्पीड़न या प्राइवेसी से जुड़ी समस्याएं अपने आप समाप्त नहीं होंगी।
इस नीति की वास्तविक सफलता 3 बातों पर निर्भर करेगी। पहला, फ़ीड बदलने का विकल्प कितना आसान होगा। दूसरा, क्या यूज़र की चुनी गई सेटिंग बनी रहेगी। तीसरा, कंपनियां इस व्यवस्था के बारे में कितनी पारदर्शिता रखेंगी।
ऑस्ट्रेलिया का यह प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें सोशल मीडिया कंपनियों की तकनीकी प्राथमिकताओं के साथ यूज़र की स्वतंत्र पसंद को भी नियामकीय चर्चा के केंद्र में रखा गया है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।