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पंजाब और हरियाणा को हिमाचल को देनी होगी 11,973 मिलियन यूनिट बिजली

Harish Qureshi • 2026-11-07 15:24:52
पंजाब और हरियाणा को हिमाचल को देनी होगी 11,973 मिलियन यूनिट बिजली

सुप्रीम कोर्ट ने 60 साल पुराने भाखड़ा-ब्यास बिजली विवाद का निपटारा किया। पंजाब और हरियाणा अगले 20 वर्षों में हिमाचल को 11,973 मिलियन यूनिट बिजली देंगे।


नई दिल्ली | 6 नवंबर 2026

By Mohd Haris


60 साल की कानूनी लड़ाई पर लगा विराम

देश के 3 राज्यों के बीच बिजली के बंटवारे को लेकर दशकों से जारी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने पंजाब और हरियाणा को निर्देश दिया है कि वे हिमाचल प्रदेश को भाखड़ा-नांगल और ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े बकाया बिजली हिस्से के तौर पर कुल 11,973 मिलियन यूनिट बिजली उपलब्ध कराएं। यह आपूर्ति अगले 20 वर्षों के दौरान अक्टूबर से मार्च तक के कम बिजली उत्पादन वाले सीजन में की जाएगी। 6 नवंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय पीठ ने यह फैसला सुनाया। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से तैयार कैशलेस सेटलमेंट व्यवस्था को मंजूरी दी। इसका मतलब है कि राज्यों के बीच बकाया राशि का सीधा नकद भुगतान नहीं होगा, बल्कि बिजली की आपूर्ति के जरिए हिसाब बराबर किया जाएगा।


हिमाचल को हर साल कितनी बिजली मिलेगी?

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक, पूंजीगत लागत के समायोजन के बाद हिमाचल प्रदेश को कुल लगभग 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलनी है। इसकी आपूर्ति लगभग 598 मिलियन यूनिट प्रतिवर्ष के हिसाब से अगले 20 लीन सीजन में की जाएगी। यहां लीन सीजन का मतलब अक्टूबर से मार्च के बीच की अवधि है। अदालत ने इस व्यवस्था के जरिए बिजली आपूर्ति का ऐसा शेड्यूल तय किया है, जिससे पंजाब और हरियाणा पर एक साथ बड़ा आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा और हिमाचल को भी उसका बकाया हिस्सा मिलता रहेगा।

इस मामले में फैसले के मूल आदेश में 13,066 मिलियन यूनिट कुल ऊर्जा बकाया निर्धारित किया गया है। इसमें हिमाचल की परियोजना लागत संबंधी देनदारी को घटाने के बाद लगभग 11,973 मिलियन यूनिट शेष रहती है। इसी अंतर को समझना जरूरी है। 13,066 मिलियन यूनिट शुरुआती बकाया है, जबकि 11,973 मिलियन यूनिट समायोजन के बाद मिलने वाली बिजली है।


पंजाब और हरियाणा के बीच कैसे बंटेगी जिम्मेदारी?

अदालत ने दोनों राज्यों के बीच बिजली आपूर्ति का अनुपात भी निर्धारित किया है। भाखड़ा-नांगल परियोजना के लिए पंजाब और हरियाणा का अनुपात 58:42 रहेगा, जबकि ब्यास परियोजनाओं के लिए यह अनुपात 60:40 होगा। इसका मतलब है कि दोनों राज्यों को परियोजनाओं से जुड़े अपने निर्धारित हिस्से के मुताबिक हिमाचल को बिजली उपलब्ध करानी होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि हिमाचल प्रदेश को मिलने वाली बिजली के लिए उसे भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड यानी बीबीएमबी द्वारा निर्धारित संबंधित साल के शुल्क का भुगतान करना होगा। इस प्रकार फैसला केवल बकाया बिजली देने तक सीमित नहीं है। इसमें बिजली की आपूर्ति, परियोजना लागत और परिचालन शुल्क, तीनों पहलुओं को शामिल किया गया है।


₹420.77 करोड़ की देनदारी का क्या होगा?

इस विवाद में हिमाचल प्रदेश की तरफ से बिजली के बकाया हिस्से की मांग की जा रही थी, लेकिन पंजाब और हरियाणा का तर्क था कि परियोजनाओं के निर्माण और कर्ज की अदायगी में उनकी ओर से खर्च किया गया पैसा भी हिसाब में शामिल होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश की परियोजनाओं में 7.19 प्रतिशत पूंजीगत लागत की देनदारी का आकलन ₹420.77 करोड़ किया है। इसमें पंजाब के हिस्से की देनदारी ₹249.23 करोड़ और हरियाणा की देनदारी ₹171.55 करोड़ निर्धारित की गई है।

अदालत ने इस देनदारी को बिजली के बकाया हिस्से में समायोजित करने का निर्देश दिया। इसके लिए बिजली की कीमत ₹3.85 प्रति यूनिट निर्धारित की गई। इस गणना से लगभग 1,093 मिलियन यूनिट बिजली का समायोजन होगा। इसके बाद हिमाचल प्रदेश को मिलने वाला शेष बिजली बकाया लगभग 11,973 मिलियन यूनिट रह जाता है।


1944 से शुरू हुई थी विवाद की कहानी

भाखड़ा-ब्यास विवाद की जड़ें आजादी से पहले तक जाती हैं। वर्ष 1944 में सतलुज नदी पर भाखड़ा-नांगल जलविद्युत योजना का प्रस्ताव सामने आया था। इसके बाद ब्यास नदी पर देहर और पोंग बांध जैसी परियोजनाएं विकसित की गईं। इन परियोजनाओं के निर्माण के लिए हिमाचल प्रदेश के क्षेत्रों में जमीन और प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल हुआ। हिमाचल का पक्ष रहा कि जब इन परियोजनाओं से बिजली का उत्पादन हो रहा है और उसके क्षेत्र ने इसके लिए संसाधन उपलब्ध कराए हैं, तो उसे भी बिजली में निर्धारित हिस्सा मिलना चाहिए।

1 नवंबर 1966 को पंजाब पुनर्गठन अधिनियम लागू हुआ। इसके बाद अविभाजित पंजाब से पंजाब और हरियाणा अलग राज्य बने। चंडीगढ़ केंद्रशासित प्रदेश बना और हिमाचल प्रदेश के क्षेत्रीय स्वरूप में भी बदलाव हुआ। पंजाब पुनर्गठन अधिनियम की धारा 78 में भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाओं से जुड़े अधिकारों तथा देनदारियों के बंटवारे का प्रावधान किया गया था। लेकिन राज्यों के बीच हिस्सेदारी को लेकर सहमति नहीं बन सकी। यही असहमति आगे चलकर लंबे कानूनी विवाद में बदल गई।


1996 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था मामला

हिमाचल प्रदेश ने वर्ष 1996 में संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट में मूल वाद दायर किया था। इस प्रावधान के तहत केंद्र और राज्यों अथवा राज्यों के बीच विवादों पर सुप्रीम कोर्ट को मूल अधिकारिता प्राप्त है। 27 सितंबर 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला दिया था। अदालत ने हिमाचल को अविभाजित पंजाब की बिजली में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी का हकदार माना। यह हिस्सा भाखड़ा-नांगल परियोजना के लिए 1 नवंबर 1966 से और ब्यास परियोजना के लिए संबंधित इकाइयों में उत्पादन शुरू होने की तारीखों से प्रभावी माना गया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने बिजली आवंटन में बदलाव किया, लेकिन पिछले वर्षों के बकाया की गणना और भुगतान के तरीके को लेकर विवाद जारी रहा। इस कारण 2011 का फैसला पूरी तरह लागू नहीं हो सका।


13,066 मिलियन यूनिट का हिसाब कैसे बना?

केंद्र सरकार की ओर से अदालत में पेश गणना के अनुसार, हिमाचल प्रदेश का 1 नवंबर 1966 से अक्टूबर 2011 तक का कुल बिजली बकाया 13,066 मिलियन यूनिट आंका गया था।

इसमें भाखड़ा-नांगल परियोजना से 8,523 मिलियन यूनिट, ब्यास यूनिट-1 से 3,145 मिलियन यूनिट और ब्यास यूनिट-2 से 1,398 मिलियन यूनिट शामिल थे। हालांकि, इस गणना पर पंजाब और हरियाणा ने आपत्तियां उठाई थीं। पंजाब ने हिमाचल को पहले से दी जा रही प्रतिदिन 1.2 लाख यूनिट बिजली का हवाला देते हुए बकाया की गणना पर सवाल उठाया था। हरियाणा ने भी पूंजीगत लागत और परियोजनाओं से संबंधित वित्तीय देनदारियों पर अपना पक्ष रखा। केंद्र सरकार ने संबंधित आंकड़ों और कर्ज भुगतान के रिकॉर्ड के आधार पर समझौते का प्रस्ताव तैयार किया। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने बिजली के रूप में बकाया चुकाने और पूंजीगत लागत के समायोजन वाली व्यवस्था को मंजूरी दी।


अदालत की सख्त टिप्पणी का क्या है मतलब?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर चिंता जताई कि 2011 में हिमाचल के पक्ष में डिक्री जारी होने के बावजूद लंबे समय तक उसका प्रभावी लाभ राज्य को नहीं मिला।

अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक आदेश को लागू करने की जिम्मेदारी संबंधित पक्षों की है। किसी फैसले के पालन में अनिच्छा या देरी के कारण उसके वास्तविक उद्देश्य को निष्फल नहीं होने दिया जा सकता। यह टिप्पणी अंतरराज्यीय विवादों में न्यायिक आदेशों के अनुपालन को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देती है। अदालत का रुख स्पष्ट है कि राज्यों के बीच वित्तीय या प्रशासनिक मतभेद होने के बावजूद न्यायिक फैसलों को लागू करना आवश्यक है।


हिमाचल प्रदेश को क्या फायदा होगा?

इस फैसले का सबसे प्रत्यक्ष फायदा हिमाचल प्रदेश को मिलने वाली अतिरिक्त बिजली के रूप में सामने आएगा। राज्य को अगले 20 वर्षों तक अक्टूबर से मार्च के बीच निर्धारित बिजली उपलब्ध होगी। इससे सर्दियों में बिजली की उपलब्धता को लेकर राज्य की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है। हिमाचल इस बिजली का इस्तेमाल अपनी घरेलू और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए कर सकेगा। उपलब्धता और नियामकीय प्रावधानों के अधीन अतिरिक्त बिजली के व्यावसायिक इस्तेमाल से राजस्व का रास्ता भी खुल सकता है।

दूसरी ओर पंजाब और हरियाणा को तत्काल नकद भुगतान नहीं करना पड़ेगा। उन्हें तय शेड्यूल के अनुसार बिजली उपलब्ध करानी होगी। इस तरह अदालत ने तीनों राज्यों के हितों और वित्तीय जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।


क्या अब विवाद पूरी तरह खत्म हो गया?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बिजली बंटवारे और पुराने बकाये की अदायगी से जुड़ा मुख्य कानूनी विवाद सुलझ गया है। हालांकि, असली कसौटी अब आदेश के प्रभावी क्रियान्वयन की होगी। भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड को बिजली आपूर्ति की निगरानी, संबंधित शुल्क और निर्धारित शेड्यूल के अनुपालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के बीच अब यह देखना होगा कि निर्धारित बिजली समय पर उपलब्ध होती है या नहीं। 20 वर्षों की लंबी अवधि में उत्पादन, मांग और परियोजनाओं के परिचालन से जुड़े पहलू भी इस व्यवस्था के लिए अहम रहेंगे।

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Harish Qureshi

Harish Qureshi

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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