1. रात में बार-बार खुलती है आंख? इसे नजरअंदाज न करें
2. नींद टूटने की आदत शरीर को कैसे कर सकती है प्रभावित?
3. हर रात टूटती है नींद तो जानें इसके पीछे की वजह
रात में बार-बार नींद टूटना कभी-कभार सामान्य हो सकता है, लेकिन लगातार ऐसा होने पर नींद की गुणवत्ता और दिनभर की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। तनाव, अनिद्रा, स्लीप एपनिया, कैफीन, शराब, अनियमित दिनचर्या और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं वजह हो सकती हैं। लंबे समय तक परेशानी में चिकित्सकीय सलाह जरूरी है।
Location: नई दिल्ली, भारत
Date: 26 अगस्त 2026
By Neelam saini
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रात में बार-बार नींद टूटना शरीर पर डाल सकता है असर, जानें क्या करें
रात में एक-दो बार आंख खुल जाना हमेशा किसी बीमारी का संकेत नहीं होता। लेकिन यदि बार-बार नींद टूटना नियमित समस्या बन जाए, दोबारा सोने में काफी समय लगे और सुबह उठने के बाद भी शरीर तरोताजा महसूस न हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के मुताबिक बार-बार रात में जागना अनिद्रा के प्रमुख लक्षणों में शामिल है। नींद की कमी या खराब गुणवत्ता वाली नींद का असर सिर्फ अगले दिन की थकान तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक नींद की कमी एकाग्रता, याददाश्त, निर्णय लेने की क्षमता और भावनात्मक संतुलन को प्रभावित कर सकती है। लगातार नींद की समस्या कुछ दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिमों से भी जुड़ी पाई गई है।
क्या हुआ?
नींद के दौरान शरीर और मस्तिष्क कई जरूरी प्रक्रियाओं से गुजरते हैं। यदि नींद बार-बार टूटती रहे, तो व्यक्ति को बिस्तर पर पर्याप्त समय बिताने के बावजूद पर्याप्त आराम महसूस नहीं हो सकता। नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार अनिद्रा में व्यक्ति को सोने में परेशानी होने के साथ-साथ रात में बार-बार जागने या सुबह बहुत जल्दी उठ जाने की समस्या हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप दिन में नींद, थकान, चिड़चिड़ापन और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कोई व्यक्ति कितने घंटे बिस्तर पर रहा। नींद कितनी लगातार और गुणवत्तापूर्ण रही, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
पूरा संदर्भ क्या है?
बार-बार नींद टूटने की कई वजहें हो सकती हैं। तनाव, चिंता, काम का दबाव, अनियमित सोने-जागने का समय, रात में मोबाइल या तेज रोशनी का इस्तेमाल, कैफीन और निकोटीन जैसी चीजें नींद को प्रभावित कर सकती हैं। नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार रात में शोर या रोशनी, बहुत गर्म या ठंडा वातावरण और दिनचर्या में बदलाव भी नींद की समस्या बढ़ा सकते हैं। कुछ मामलों में बार-बार जागना किसी दूसरी स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया में नींद के दौरान सांस बार-बार रुकती और फिर शुरू होती है। इससे व्यक्ति रात में कई बार जाग सकता है, हालांकि कई बार उसे खुद इन जागने की घटनाओं का पता भी नहीं चलता।
पृष्ठभूमि और घटनाक्रम
नींद और जागने का चक्र शरीर की आंतरिक जैविक घड़ी से नियंत्रित होता है। प्रकाश इस चक्र का महत्वपूर्ण संकेत है। रात में तेज कृत्रिम रोशनी और इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन का इस्तेमाल शरीर के नींद संबंधी संकेतों को प्रभावित कर सकता है। उम्र बढ़ने के साथ भी नींद का पैटर्न बदल सकता है। कुछ लोगों में रात की नींद हल्की हो जाती है और बीच-बीच में जागने की संभावना बढ़ सकती है। लेकिन लगातार होने वाली समस्या को केवल उम्र का सामान्य हिस्सा मानना उचित नहीं है, खासकर जब इसका असर दिन की गतिविधियों पर पड़ रहा हो।महिलाओं में हार्मोनल बदलाव भी नींद को प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर मेनोपॉज और पेरिमेनोपॉज के दौरान रात में पसीना, पेशाब की जरूरत और अन्य लक्षण नींद में व्यवधान पैदा कर सकते हैं।
प्रमुख पक्षकारों का रुख
स्वास्थ्य विशेषज्ञ संस्थाएं नींद की समस्या को केवल जीवनशैली की छोटी परेशानी मानने के बजाय उसके संभावित कारण की पहचान पर जोर देती हैं। यदि व्यक्ति को लगातार सोने या नींद बनाए रखने में कठिनाई हो रही है और इसका असर दिनभर की गतिविधियों पर पड़ रहा है, तो चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी हो सकता है। क्रॉनिक इंसोम्निया के मामलों में अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन ने कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी फॉर इंसोम्निया यानी सीबीटी-आई को प्रथम-पंक्ति उपचार के तौर पर मजबूत सिफारिश दी है। इसमें नींद से जुड़े व्यवहार, विचार और आदतों को व्यवस्थित तरीके से बदलने पर काम किया जाता है।
उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?
उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्य बताते हैं कि पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। नींद की कमी से थकान, एकाग्रता में कमी, निर्णय लेने में परेशानी और प्रतिक्रिया समय धीमा होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार जो लोग पर्याप्त नींद नहीं लेते या जिनकी नींद बार-बार बाधित होती है, उनमें हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मोटापे और स्ट्रोक जैसे स्वास्थ्य जोखिम अधिक हो सकते हैं। हालांकि ऐसे संबंधों को किसी एक व्यक्ति में बीमारी का निश्चित कारण नहीं माना जा सकता।
लंबे समय तक अनिद्रा रहने पर उच्च रक्तचाप, कोरोनरी हृदय रोग और मधुमेह जैसी स्थितियों के जोखिम से भी संबंध पाया गया है।
2026 में प्रकाशित अमेरिकी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार 2024 में अमेरिका के 30.5 प्रतिशत वयस्क औसतन सात घंटे से कम सो रहे थे। रिपोर्ट यह भी बताती है कि नींद की गुणवत्ता में समस्या और पर्याप्त नींद न मिलना स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण चिंता है।
संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं?
बार-बार नींद टूटने का सबसे तत्काल असर अगले दिन दिखाई दे सकता है। व्यक्ति को सुस्ती, थकान, चिड़चिड़ापन और काम पर ध्यान लगाने में कठिनाई हो सकती है। नींद की कमी प्रतिक्रिया समय और निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकती है, जिससे ड्राइविंग जैसी गतिविधियों में सुरक्षा जोखिम बढ़ सकता है।
यदि यह समस्या लंबे समय तक बनी रहे, तो खराब नींद मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर व्यापक असर डाल सकती है। नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार क्रॉनिक इंसोम्निया हृदय, प्रतिरक्षा प्रणाली और मेटाबॉलिज्म से जुड़े स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। हालांकि यहां एक अहम अंतर समझना जरूरी है। हर रात एक-दो बार जाग जाना अपने आप में बीमारी नहीं है। चिंता तब ज्यादा होती है जब जागना लगातार हो, दोबारा सोना मुश्किल हो और इससे दिनभर की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगे।
राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव
नींद की समस्या का सीधा राजनीतिक प्रभाव सीमित है, लेकिन यह सार्वजनिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण विषय है। नींद की कमी से उत्पादकता, सड़क सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है।नींद संबंधी विकारों की समय पर पहचान और उपचार को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं तथा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ बेहतर तरीके से जोड़ना सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के स्तर पर उपयोगी हो सकता है।
आर्थिक और सामाजिक असर
लगातार खराब नींद का असर कार्यस्थल पर भी दिखाई दे सकता है। नींद की कमी से ध्यान, प्रतिक्रिया और निर्णय क्षमता प्रभावित होने के कारण काम में गलतियों का जोखिम बढ़ सकता है। नेशनल हार्ट, लंग एंड ब्लड इंस्टीट्यूट के अनुसार नींद की कमी काम, पढ़ाई, ड्राइविंग और सामाजिक गतिविधियों में प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है। घर में भी इसका असर पड़ सकता है। लगातार थकान और चिड़चिड़ापन व्यक्ति के व्यवहार तथा पारिवारिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि लंबे समय तक चल रही नींद की समस्या को केवल “रूटीन खराब होने” की समस्या मानकर टालना उचित नहीं है।
किन लोगों को विशेष सतर्क रहना चाहिए?
जिन लोगों को हर रात कई बार नींद टूटती है और दिन में अत्यधिक नींद या थकान रहती है, उन्हें चिकित्सकीय सलाह पर विचार करना चाहिए। खास तौर पर यदि साथ में तेज खर्राटे, नींद में सांस रुकना, हांफना या घुटन जैसा महसूस होना हो तो स्लीप एपनिया की जांच की जरूरत हो सकती है। इसी तरह लंबे समय से तनाव, चिंता, दर्द, बार-बार पेशाब आने या अन्य स्वास्थ्य समस्या के कारण नींद प्रभावित हो रही हो तो मूल कारण का उपचार जरूरी है।
कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?
सबसे पहले यह पता लगाना जरूरी है कि व्यक्ति की नींद क्यों टूट रही है। क्या वह अचानक जाग रहा है? क्या सांस लेने में परेशानी हो रही है? क्या पेशाब के लिए उठना पड़ता है? क्या तनाव या चिंता के कारण आंख खुलती है? या फिर सोने-जागने की दिनचर्या ही अनियमित है?इन सवालों का जवाब समस्या की सही दिशा तय करने में मदद कर सकता है। चिकित्सक जरूरत पड़ने पर स्लीप डायरी, शारीरिक जांच या स्लीप स्टडी जैसी प्रक्रिया की सलाह दे सकते हैं।
आगे क्या होगा?
यदि नींद कभी-कभार टूटती है, तो नियमित दिनचर्या और बेहतर स्लीप हाइजीन से मदद मिल सकती है। रोज लगभग एक ही समय पर सोने और जागने की कोशिश करें, दिन में नियमित शारीरिक गतिविधि रखें और सोने से पहले कैफीन, निकोटीन तथा शराब से बचें।
रात में मोबाइल और अन्य तेज रोशनी वाले उपकरणों का इस्तेमाल कम करना भी उपयोगी हो सकता है। सोने का कमरा शांत, अंधेरा और आरामदायक तापमान वाला रखना नींद के वातावरण को बेहतर बना सकता है। यदि समस्या लगातार बनी रहती है, तो खुद से नींद की गोलियां या अन्य दवाएं शुरू करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। क्रॉनिक इंसोम्निया में सीबीटी-आई को प्रथम-पंक्ति उपचार माना जाता है।
संपादकीय निष्कर्ष
रात में बार-बार नींद टूटना हमेशा बीमारी का संकेत नहीं होता, लेकिन यदि यह लगातार हो रहा है और सुबह उठने के बाद थकान, दिन में नींद, चिड़चिड़ापन या एकाग्रता में कमी महसूस होती है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके पीछे अनिद्रा, तनाव, खराब नींद की आदतें या स्लीप एपनिया जैसी स्थितियां हो सकती हैं। बेहतर नींद के लिए नियमित सोने-जागने का समय, उचित नींद का माहौल, कैफीन और निकोटीन से दूरी तथा रात में स्क्रीन का सीमित इस्तेमाल मददगार हो सकता है। वहीं लगातार समस्या या सांस रुकने जैसे संकेतों में चिकित्सकीय जांच जरूरी है। क्रॉनिक इंसोम्निया की स्थिति में विशेषज्ञ की निगरानी में सीबीटी-आई प्रभावी प्रथम-पंक्ति विकल्प है।