रूस से तेल खरीदना पड़ेगा महंगा? अमेरिका में भारत समेत कई देशों पर नए टैरिफ का प्रावधान
Harish Qureshi
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2026-09-17 11:10:52
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंध विधेयक को मंजूरी दी है। इसमें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की राष्ट्रपति को शक्ति देने का प्रावधान है। भारत भी संभावित दायरे में है।
वॉशिंगटन | 17 सितंबर 2026
By Mohd Haris
अमेरिका में रूस पर दबाव बढ़ाने वाला विधेयक पास
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस और ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंधों से जुड़े विधेयक को 262-159 मतों से पारित कर दिया है। विधेयक में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले कुछ देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। भारत और चीन जैसे बड़े रूसी ऊर्जा खरीदार इस प्रावधान के संभावित दायरे में हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिनिधि सभा से विधेयक पारित होने का अर्थ भारत पर तत्काल 100% टैरिफ लगना नहीं है। अब विधेयक राष्ट्रपति ट्रंप के पास जाएगा। टैरिफ लागू करने का वास्तविक फैसला आगे प्रशासनिक कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
262-159 मतों से मिली मंजूरी
विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में 262 मतों के मुकाबले 159 मतों से मंजूरी मिली। मतदान में 203 रिपब्लिकन, 58 डेमोक्रेट और 1 स्वतंत्र सदस्य ने समर्थन किया, जबकि 7 रिपब्लिकन और 152 डेमोक्रेट सदस्यों ने विरोध किया।
यह विधेयक पहले अमेरिकी सीनेट से भी पारित हो चुका है। सीनेट में इसे 86-11 मतों से मंजूरी मिली थी। प्रतिनिधि सभा की मंजूरी के बाद अब अगला अहम चरण राष्ट्रपति की स्वीकृति है।
भारत क्यों आया दायरे में
विधेयक का मुख्य मकसद रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उसकी ऊर्जा तथा अन्य आर्थिक गतिविधियों से होने वाली आमदनी को सीमित करना है। इसके तहत उन देशों पर अतिरिक्त टैरिफ का प्रावधान है जो रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदते हैं या प्रतिबंधों से बचने में रूस की मदद करने वाले प्रमुख कारोबारी केंद्रों में शामिल हैं।
भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। इसी वजह से भारतीय आयात इस अमेरिकी विधायी पहल के संभावित असर के केंद्र में है। हालांकि विधेयक भारत पर स्वतः 100% शुल्क नहीं लगाता, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकतम 100% तक टैरिफ लगाने की शक्ति देने का रास्ता तैयार करता है।
विधेयक में क्या-क्या है
प्रस्तावित कानून रूस के नेतृत्व, अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और ऊर्जा क्षेत्र पर प्रतिबंधों को मजबूत करने के साथ उन जहाजों के नेटवर्क को निशाना बनाता है जिन्हें रूस के तेल कारोबार में प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तथाकथित शैडो फ्लीट के रूप में चिन्हित किया जाता है।
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की वेज़ एंड मीन्स समिति के अनुसार, विधेयक रूस से जुड़े सामान पर 500% तक शुल्क और रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले कुछ देशों के सामान पर 100% तक शुल्क की व्यवस्था करता है। इसके अलावा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले प्रमुख देशों के खिलाफ भी इसी तरह के टैरिफ प्रावधान रखे गए हैं।
विधेयक में ईरान से संबंधित प्रतिबंधों को भी आगे बढ़ाने का प्रावधान शामिल है।
भारत की प्रतिक्रिया
भारत ने अमेरिकी विधेयक पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्रमुख प्राथमिकता बताया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए स्रोतों में विविधता बनाए रखेगा और बदलते वैश्विक बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखेगा।
भारतीय पक्ष ने यह भी कहा है कि सरकार व्यापार और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगी। नई दिल्ली ने अमेरिकी पक्ष के साथ इस मुद्दे पर बातचीत और संभावित द्विपक्षीय तथा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर असर को लेकर अपना पक्ष पहले ही रखा है।
भारत के लिए संभावित आर्थिक असर
अगर भविष्य में अमेरिका भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लागू करता है, तो सबसे बड़ा असर भारत से अमेरिका जाने वाले उन सामानों पर पड़ सकता है जिन पर अमेरिकी आयात शुल्क बढ़ाया जाएगा। इससे भारतीय निर्यातकों की लागत और अमेरिकी बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
दूसरी तरफ, रूस से मिलने वाले कच्चे तेल की कीमत, आपूर्ति और वैश्विक ऊर्जा बाजार भी इस विवाद से प्रभावित हो सकते हैं। भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आयात लागत इस पूरे मामले के अहम आर्थिक पहलू हैं।
हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि राष्ट्रपति ट्रंप विधेयक पर क्या फैसला लेते हैं, टैरिफ का दायरा क्या तय होता है और किन वस्तुओं तथा देशों को अंतिम कार्रवाई में शामिल किया जाता है।
अमेरिका की रणनीति क्या है
वॉशिंगटन की मौजूदा रणनीति रूस की ऊर्जा आमदनी पर दबाव बढ़ाने और उन देशों को आर्थिक रूप से प्रभावित करने की है जो रूसी तेल तथा गैस की खरीद जारी रखते हैं। अमेरिकी सांसदों के अनुसार, इससे रूस की यूक्रेन युद्ध से जुड़ी आर्थिक क्षमता पर दबाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
विधेयक के आलोचकों ने राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार देने पर आपत्ति जताई है। अमेरिकी डेमोक्रेट सांसदों के एक हिस्से ने तर्क दिया कि इससे राष्ट्रपति की व्यापार नीति से जुड़ी शक्तियां काफी बढ़ सकती हैं और अमेरिकी उपभोक्ताओं तथा सहयोगी देशों पर भी आर्थिक असर पड़ सकता है।
भारत-अमेरिका संबंधों के लिए नई चुनौती
यह घटनाक्रम भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों के लिए भी महत्वपूर्ण है। रूस से भारत की ऊर्जा खरीद पहले से ही वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच चर्चा का विषय रही है।
नई दिल्ली का तर्क ऊर्जा सुरक्षा और विविधीकृत आपूर्ति से जुड़ा है। अमेरिकी विधेयक का रुख रूस की ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की दिशा में है। दोनों दृष्टिकोणों के बीच अंतर आगे व्यापार और कूटनीतिक वार्ता को प्रभावित कर सकता है।
अभी भारत पर 100% टैरिफ नहीं लगा
इस मामले में सबसे जरूरी तथ्य यही है कि अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने अभी भारत पर 100% टैरिफ लागू नहीं किया है।
प्रतिनिधि सभा ने ऐसा विधेयक पारित किया है जिसमें राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। अब विधेयक राष्ट्रपति के पास जाएगा और आगे की कार्रवाई वहां तय होगी।
इसलिए मौजूदा स्थिति को भारत पर तत्काल 100% अमेरिकी शुल्क लागू होने के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
आगे क्या होगा
अब निगाह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के फैसले पर है। यदि विधेयक कानून बनता है, तो उसके बाद अमेरिकी प्रशासन यह तय करेगा कि किन देशों और किन परिस्थितियों में अतिरिक्त टैरिफ लागू किए जाएं।
भारत के लिए आगे की स्थिति रूस से ऊर्जा आयात, अमेरिकी व्यापार नीति और वैश्विक कच्चे तेल बाजार में होने वाले बदलावों से जुड़ी रहेगी।
नई दिल्ली ने संकेत दिया है कि वह ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक हितों को ध्यान में रखते हुए स्थिति पर नजर रखेगी। आने वाले दिनों में अमेरिकी प्रशासन की कार्रवाई और भारत-अमेरिका कूटनीतिक बातचीत इस विवाद की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे।
निष्कर्ष
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा का यह फैसला रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की वॉशिंगटन की कोशिश का अहम हिस्सा है। भारत के लिए इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि विधेयक में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की राष्ट्रपति को शक्ति देने का प्रावधान है।
फिलहाल भारत पर ऐसा कोई 100% टैरिफ लागू नहीं हुआ है। अगला निर्णायक चरण राष्ट्रपति की मंजूरी और उसके बाद अमेरिकी प्रशासन की वास्तविक टैरिफ नीति होगी। इसी से स्पष्ट होगा कि मौजूदा विधायी कदम भारत-अमेरिका व्यापार और भारत की रूसी ऊर्जा खरीद पर कितना वास्तविक असर डालता है।
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Harish Qureshi
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।