जी20 बैठक में सैम ऑल्टमैन ने कहा कि एआई को अपनाना देशों के लिए नॉन-नेगोशिएबल होगा। उन्होंने एआई की तुलना बिजली जैसी बुनियादी तकनीक से की और आर्थिक विकास पर जोर दिया।
चैपल हिल, नॉर्थ कैरोलाइना, अमेरिका | 3 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब सिर्फ टेक्नोलॉजी कंपनियों का विषय नहीं रह गया है। यह आर्थिक नीति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का मुद्दा बन चुका है।
इसी बहस के बीच ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने जी20 देशों से एआई को अपनाने की अपील की है।
2 सितंबर को अमेरिका के नॉर्थ कैरोलाइना के चैपल हिल में आयोजित जी20 इनोवेशन मिनिस्टीरियल में ऑल्टमैन ने कहा कि देशों के लिए एआई को अपनाना अब टाला नहीं जा सकता। रिपोर्ट अल जज़ीरा के मुताबिक उन्होंने इसकी तुलना उस दौर से की जब देशों के लिए बिजली अपनाना औद्योगिक विकास की बुनियादी जरूरत बन गया था।
ऑल्टमैन का तर्क सीधा था।
देश एआई को किस तरह रेगुलेट करेंगे, इस पर अलग-अलग नीतियां बना सकते हैं। वे अपना डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर सकते हैं या दूसरे देशों से कंप्यूटिंग क्षमता किराए पर ले सकते हैं।
लेकिन उनके मुताबिक एआई का इस्तेमाल करने से पीछे हटना आर्थिक रूप से नुकसानदेह होगा।
जी20 बैठक में उन्होंने कहा कि एआई से मिलने वाला आर्थिक विकास और लोगों को होने वाला फायदा इतना बड़ा हो सकता है कि इसे नजरअंदाज
करना उचित नहीं होगा।
यानी ऑल्टमैन का संदेश यह था कि बहस अब “एआई अपनाएं या नहीं” से आगे बढ़कर “एआई को किस तरह अपनाएं” पर होनी चाहिए।
ऑल्टमैन ने एआई की तुलना बिजली से करते हुए एक ऐतिहासिक समानता पेश की।
बिजली ने उद्योग, संचार, परिवहन, स्वास्थ्य और घरेलू जीवन को बदल दिया। ऑल्टमैन का अनुमान है कि एआई भी आने वाले वर्षों में अर्थव्यवस्था
और रोजमर्रा के कामकाज के लिए इसी तरह बुनियादी तकनीक बन सकता है।
लेकिन यह तुलना अभी भविष्यवाणी है।
एआई का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसे बिजली जैसी सार्वभौमिक उपयोगिता मानना अभी एक नीतिगत और कारोबारी दृष्टिकोण है, स्थापित
तथ्य नहीं।
चैपल हिल में हुई बैठक सिर्फ एआई के फायदे गिनाने तक सीमित नहीं रही।
वहां एआई रेगुलेशन, साइबर सुरक्षा, रोजगार, डेटा सेंटर और बिजली की बढ़ती जरूरतों पर चर्चा हुई।
अमेरिकी प्रशासन ने अपेक्षाकृत हल्के रेगुलेटरी दृष्टिकोण का समर्थन किया। अमेरिका चाहता है कि एआई के विकास पर ऐसे नए नियमों का बोझ न
पड़े जो टेक्नोलॉजी के विस्तार को धीमा कर दें।
यूरोप का रुख इसके मुकाबले ज्यादा रेगुलेटरी है।
यूरोपीय संघ एआई के लिए व्यापक कानूनी ढांचा विकसित कर चुका है और उसके अलग-अलग प्रावधान चरणबद्ध तरीके से लागू हो रहे हैं।
यानी जी20 के भीतर भी एआई को लेकर एक जैसी सोच नहीं है।
ऑल्टमैन का “बिजली जैसी जरूरत” वाला बयान केवल सॉफ्टवेयर की बात नहीं है।
एआई मॉडल चलाने के लिए बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए। इसके लिए विशाल डेटा सेंटर, चिप्स, कूलिंग सिस्टम और बिजली की
जरूरत होती है।
यही कारण है कि जी20 बैठक में एआई और ऊर्जा को अलग-अलग मुद्दे नहीं माना गया।
Nvidia के सीईओ जेनसन हुआंग ने भी देशों से एआई इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का आह्वान किया। उन्होंने एआई को सड़कों, बिजली और इंटरनेट जैसे
बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर के संदर्भ में देखने की बात कही।
टेस्ला के एलन मस्क ने भी एआई के लिए बिजली उत्पादन बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया और ऊर्जा की संभावित कमी को निकट भविष्य की चुनौती बताया।
ऑल्टमैन का जवाब जरूरी नहीं है।
उनके मुताबिक देशों के पास अलग-अलग विकल्प हो सकते हैं।
कोई देश अपना डेटा सेंटर और कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर सकता है। दूसरा देश किसी अन्य देश की कंप्यूटिंग क्षमता का इस्तेमाल कर सकता
है।
यह अंतर विकासशील देशों के लिए महत्वपूर्ण है।
हर देश के पास विशाल डेटा सेंटर बनाने के लिए पूंजी, बिजली, चिप सप्लाई और तकनीकी विशेषज्ञता नहीं होगी।
इसलिए एआई की वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नई तरह की डिजिटल निर्भरता भी पैदा हो सकती है।
ऑल्टमैन ने एआई को आर्थिक विकास का बड़ा इंजन बताया।
उनका तर्क है कि एआई उत्पादकता बढ़ा सकता है, कंपनियों की कार्यक्षमता सुधार सकता है और सार्वजनिक सेवाओं में नए तरीके ला सकता है।
जी20 बैठक में भी एआई को आर्थिक प्रतिस्पर्धा और विकास के नजरिए से देखा गया।
लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है।
एआई से वास्तविक आर्थिक फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां और सरकारें इसे किस काम में इस्तेमाल करती हैं, श्रमिकों को किस तरह
प्रशिक्षित किया जाता है और उत्पादकता से मिलने वाला लाभ किस तरह वितरित होता है।
सिर्फ एआई अपनाने से हर अर्थव्यवस्था अपने आप तेजी से बढ़ेगी, ऐसा कोई प्रमाणित नियम नहीं है।
एआई की बढ़ती क्षमता के साथ रोजगार का सवाल भी जुड़ा है।
जी20 बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि एआई कुछ कामों को ऑटोमेट कर सकता है, लेकिन साथ ही नई भूमिकाएं और नई स्किल्स की मांग पैदा
कर सकता है।
जेनसन हुआंग ने तर्क दिया कि एआई काम को खत्म करने के बजाय कई कार्यों को बदल सकता है और नए रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है।
दूसरी तरफ, ऑटोमेशन से कुछ मौजूदा नौकरियों और कार्यों पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है।
इसलिए एआई नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा केवल मशीनों में निवेश नहीं, बल्कि मानव संसाधन में निवेश भी है।
एआई को लेकर ऑल्टमैन का संदेश सिर्फ उत्साह का नहीं था।
जी20 बैठक में उन्होंने यह भी कहा कि चिंता करना जरूरी है क्योंकि चिंता संभावित समस्याओं का पहले से अनुमान लगाने में मदद करती है।
यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है क्योंकि एआई कंपनियों पर सुरक्षा, दुरुपयोग, साइबर जोखिम, गलत सूचना और नियंत्रण जैसे मुद्दों को लेकर लगातार दबाव
बढ़ रहा है।
हालांकि ऑल्टमैन का मुख्य संदेश यह रहा कि सुरक्षा की चिंता एआई के विकास और इस्तेमाल को पूरी तरह रोकने का आधार नहीं बननी चाहिए।
जी20 बैठक में एआई गवर्नेंस पर अमेरिका और यूरोप के दृष्टिकोण का अंतर भी साफ दिखाई दिया।
अमेरिकी पक्ष ने हल्के और टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल रेगुलेशन पर जोर दिया।
दूसरी ओर यूरोपीय संघ अपने एआई एक्ट के जरिए अधिक व्यापक नियामक ढांचा लागू कर रहा है।
यह अंतर भविष्य में वैश्विक एआई बाजार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
अगर अलग-अलग क्षेत्रों में नियम बहुत अलग होते हैं, तो टेक कंपनियों को कई तरह के अनुपालन ढांचे के साथ काम करना पड़ेगा।
एआई की वैश्विक दौड़ सिर्फ अमेरिका और यूरोप तक सीमित नहीं है।
चीन पहले ही एआई के लिए अपने नियामक ढांचे और तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े स्तर पर काम कर रहा है।
जी20 बैठक में चीन ने भी साझा रुख का समर्थन किया, जिसमें नवाचार और एआई के लिए ऐसी नीतियों पर जोर दिया गया जो वास्तविक और विशिष्ट
जोखिमों को संबोधित करें।
इसका मतलब है कि एआई अब वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है।
ऑल्टमैन की अपील का सबसे बड़ा असर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।
अगर एआई वास्तव में बिजली या इंटरनेट जैसी बुनियादी तकनीक बनता है, तो जिन देशों के पास पर्याप्त कंप्यूटिंग, ऊर्जा और डिजिटल स्किल्स नहीं
होंगी, वे पीछे छूट सकते हैं।
लेकिन हर देश के लिए अरबों डॉलर के डेटा सेंटर बनाना व्यावहारिक नहीं होगा।
इसलिए क्लाउड कंप्यूटिंग, साझा इंफ्रास्ट्रक्चर, स्थानीय भाषा के एआई मॉडल, ओपन सोर्स सिस्टम और सरकारी डिजिटल सेवाओं में एआई का
इस्तेमाल महत्वपूर्ण विकल्प बन सकते हैं।
भारत के लिए यह बहस खास महत्व रखती है।
देश के पास बड़ा डिजिटल यूजर बेस, आईटी सेक्टर और तेजी से बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम है। लेकिन बड़े एआई मॉडल विकसित और संचालित
करने के लिए कंप्यूटिंग तथा ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े निवेश की जरूरत होगी।
भारत के सामने चुनौती यह होगी कि वह सिर्फ एआई का उपभोक्ता न बने, बल्कि एआई मॉडल, चिप्स, डेटा सेंटर, रिसर्च और स्किल्स के क्षेत्र में अपनी क्षमता भी विकसित करे।
साथ ही भारतीय भाषाओं में एआई की पहुंच बढ़ाना भी महत्वपूर्ण होगा, ताकि तकनीक का लाभ सिर्फ अंग्रेजी बोलने वाली डिजिटल आबादी तक सीमित न रहे।
इस सवाल का अंतिम जवाब अभी भविष्य के पास है।
एआई तेजी से स्वास्थ्य, शिक्षा, कारोबार, कोडिंग, रिसर्च और प्रशासन में इस्तेमाल हो रहा है। इसकी क्षमता लगातार बढ़ रही है।
लेकिन बिजली जैसी सार्वभौमिक बुनियादी उपयोगिता बनने के लिए एआई को कई और कसौटियां पार करनी होंगी।
इसे भरोसेमंद, किफायती, सुरक्षित और व्यापक रूप से उपलब्ध होना होगा।
और सबसे महत्वपूर्ण, समाज को यह तय करना होगा कि किन क्षेत्रों में एआई का इस्तेमाल स्वीकार्य है और किन क्षेत्रों में मानव निर्णय को प्राथमिकता
मिलनी चाहिए।
सैम ऑल्टमैन का जी20 संदेश साफ था: एआई को नजरअंदाज करना अब आर्थिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है।
उन्होंने एआई की तुलना बिजली से करके यह संकेत दिया कि आने वाले वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिर्फ एक डिजिटल टूल नहीं, बल्कि
अर्थव्यवस्था के बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बन सकता है।
लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।
एआई के लिए डेटा सेंटर चाहिए। डेटा सेंटर के लिए बिजली चाहिए। बिजली के साथ चिप्स, नेटवर्क, पानी, जमीन और प्रशिक्षित मानव संसाधन की
जरूरत होती है।
और इन सबके साथ रेगुलेशन तथा सुरक्षा का सवाल भी जुड़ा है।
इसलिए आने वाले दौर की असली प्रतिस्पर्धा सिर्फ यह नहीं होगी कि कौन सबसे शक्तिशाली एआई मॉडल बनाता है।
असली मुकाबला यह होगा कि कौन देश एआई को अपनी अर्थव्यवस्था में सुरक्षित, सस्ता, भरोसेमंद और व्यापक रूप से उपयोगी बना पाता है।
ऑल्टमैन की “बिजली जैसी जरूरत” वाली तुलना इसी संभावित बदलाव की ओर इशारा करती है। लेकिन इसे भविष्यवाणी समझना चाहिए, अंतिम तथ्य नहीं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।