यूके के Army Foundation College में छात्राओं द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न आरोपों ने सैन्य सिस्टम की सुरक्षा और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए। यह मामला व्यापक संस्थागत सुधार और पारदर्शिता की जरूरत को उजागर करता है
📍 Location: United Kingdom
📰 Date: August 6, 2026
✍️ By Mohd Haris
ब्रिटेन के Army Foundation College में पढ़ने वाली युवा छात्राओं द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न, रेप और वॉयूरिज्म के आरोपों ने एक बड़े संस्थागत संकट को सामने ला दिया है। यह कॉलेज 16 से 18 साल के किशोर भर्ती सैनिकों के प्रशिक्षण के लिए जाना जाता है।
इन आरोपों के सामने आने के बाद सैन्य प्रशिक्षण सिस्टम की सुरक्षा, निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठे हैं। मामला अब सिर्फ एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पूरे डिफेंस स्ट्रक्चर की क्रेडिबिलिटी से जुड़ गया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, छात्राओं ने अलग-अलग मामलों में यौन उत्पीड़न और अनुचित व्यवहार की शिकायतें दर्ज कराई हैं। इन मामलों में कुछ आरोप इतने गंभीर हैं कि उन्हें सिविल पुलिस तक रेफर किया गया।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, Army Foundation College से जुड़े सैकड़ों यौन दुराचार मामलों की रिकॉर्डिंग पिछले कुछ वर्षों में हुई है। 2018 से 2024 के बीच 150 से अधिक यौन दुराचार के आरोप दर्ज किए गए
हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि इन आंकड़ों में सभी आरोप शामिल हैं, जिनकी जांच अलग-अलग स्तर पर हुई है और सभी मामलों में दोष सिद्ध नहीं हुआ।
Army Foundation College ब्रिटेन के सैन्य ढांचे का एक अहम हिस्सा है, जहां किशोरों को प्रारंभिक सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है।
यहां मौजूद शक्ति-संबंध और अनुशासनात्मक संरचना अक्सर असंतुलित मानी जाती है, जहां प्रशिक्षकों और प्रशिक्षुओं के बीच स्पष्ट हाइरार्की होती है।
सरकारी नीति के अनुसार, प्रशिक्षकों और प्रशिक्षुओं के बीच किसी भी प्रकार का यौन संबंध सख्त रूप से प्रतिबंधित है और इसे “पावर एब्यूज” माना जाता है
पिछले कुछ वर्षों में इस संस्थान से जुड़े मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।
सरकारी जवाबों के अनुसार, 2018 से 2025 के बीच 170 से अधिक यौन आरोप रिकॉर्ड हुए। इनमें स्टाफ और जूनियर सैनिक दोनों शामिल हैं
इसके अलावा, सैन्य सर्वे रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं के बीच यौन व्यवहार और उत्पीड़न के अनुभव काफी अधिक हैं। करीब 67 प्रतिशत महिला कर्मियों ने किसी न किसी रूप में यौन व्यवहार का सामना करने की बात कही
यह मामला सिर्फ एक संस्थान तक सीमित नहीं है। यह पूरे सैन्य तंत्र में मौजूद सांस्कृतिक और संरचनात्मक समस्याओं को उजागर करता है।
किशोर आयु के भर्ती सैनिकों की सुरक्षा एक संवेदनशील मुद्दा है। ऐसे में किसी भी प्रकार की चूक गंभीर कानूनी और नैतिक सवाल खड़े करती है।
ब्रिटिश सरकार और डिफेंस मंत्रालय का कहना है कि “ज़ीरो टॉलरेंस पॉलिसी” लागू है और हर शिकायत को गंभीरता से लिया जाता है।
सरकार ने यह भी कहा कि रिपोर्टिंग सिस्टम को मजबूत किया गया है और स्वतंत्र शिकायत तंत्र स्थापित किए गए हैं
दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि आंकड़े खुद इस बात का संकेत हैं कि सिस्टम में गहरी समस्या है। उनका तर्क है कि शिकायतों की संख्या बढ़ना सिर्फ रिपोर्टिंग सुधार का संकेत नहीं, बल्कि वास्तविक घटनाओं की गंभीरता भी दिखाता है।
सरकारी डेटा में यह भी स्वीकार किया गया है कि सभी मामलों को एक समान श्रेणी में रखा गया है और इनमें से कई मामलों का अंतिम निष्कर्ष अलग-अलग रहा है।
डेटा की गुणवत्ता और रिपोर्टिंग सिस्टम में भी सीमाएं हैं, जिससे वास्तविक स्थिति का पूरा आकलन करना मुश्किल होता है
जमीनी स्तर पर यह मामला उन युवा भर्ती सैनिकों के मानसिक और शारीरिक सुरक्षा से जुड़ा है, जो एक अनुशासित और नियंत्रित माहौल में रहते हैं।
कुछ पूर्व मामलों में यह भी सामने आया कि लगातार उत्पीड़न ने गंभीर मानसिक प्रभाव डाला, यहां तक कि आत्महत्या जैसे मामलों से भी इसे जोड़ा गया
यह विवाद ब्रिटेन की संसद और पॉलिसी मेकिंग पर भी असर डाल सकता है।
सुरक्षा मानकों, भर्ती उम्र और प्रशिक्षण मॉडल पर नए सिरे से समीक्षा की मांग उठ रही है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मामला सैन्य संस्थानों में जेंडर सेफ्टी और ह्यूमन राइट्स के बड़े मुद्दे से जुड़ता है।
दुनिया भर में सैन्य संगठनों पर दबाव है कि वे अपने आंतरिक सिस्टम को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाएं।
ब्रिटिश डिफेंस मंत्रालय ने सुधारों और नई मॉनिटरिंग स्ट्रैटेजी की बात कही है।
साथ ही, स्वतंत्र जांच और पॉलिसी रिव्यू की संभावना भी बढ़ रही है।
यूके आर्मी कॉलेज विवाद यह दिखाता है कि सख्त अनुशासन वाले संस्थानों में भी जवाबदेही और पारदर्शिता की जरूरत कितनी अहम है।
यह मामला केवल आरोपों का नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार की अनिवार्यता का संकेत है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।