7 अक्टूबर हमले से पहले यूएई राष्ट्रपति द्वारा नेतन्याहू को कथित चेतावनी देने की रिपोर्ट सामने आई है। बेनेट ने इसे सही बताया, जबकि नेतन्याहू कार्यालय ने बातचीत और चेतावनी से इनकार किया।
📍 तेल अवीव
🗓️ 8 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui
7 अक्टूबर हमले से पहले चेतावनी का दावा
इजरायल में 7 अक्टूबर 2023 के हमले को लेकर खुफिया चेतावनियों और राजनीतिक जवाबदेही पर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इजरायली मीडिया की एक नई खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद ने हमले से करीब 10 दिन पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को हमास की बड़ी कार्रवाई के बारे में आगाह किया था।
रिपोर्ट के मुताबिक दोनों नेताओं के बीच फोन पर करीब 45 मिनट बातचीत हुई थी। इसमें कथित तौर पर यूएई राष्ट्रपति ने हमास के तत्कालीन नेता याह्या सिनवार की योजना को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। नेतन्याहू की ओर से कथित जवाब में कहा गया कि इजरायल के आकलन के मुताबिक हमास का ध्यान वेस्ट बैंक पर था और इजरायल किसी भी स्थिति के लिए तैयार था।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू यह है कि नेतन्याहू कार्यालय ने इस दावे को खारिज कर दिया है। कार्यालय ने कहा है कि प्रधानमंत्री ने उस अवधि में यूएई के राष्ट्रपति से बातचीत नहीं की और उन्हें ऐसी कोई चेतावनी नहीं मिली। इसलिए कथित फोन कॉल और चेतावनी को फिलहाल निर्विवाद तथ्य के तौर पर पेश करना उचित नहीं होगा।
बेनेट ने रिपोर्ट को बताया सही
इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक रूप से सही बताया है। बेनेट के मुताबिक नेतन्याहू को 7 अक्टूबर के हमले से पहले हमास और सिनवार की योजना के संबंध में चेतावनी मिली थी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस जानकारी की सच्चाई का व्यक्तिगत तौर पर भरोसा है।
बेनेट ने आरोप लगाया कि चेतावनियों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्होंने नेतन्याहू की राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा कि 7 अक्टूबर से पहले उपलब्ध चेतावनियों के बावजूद इजरायल की तैयारी उस स्तर पर नहीं हुई, जिसकी जरूरत थी।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण संपादकीय अंतर समझना जरूरी है। बेनेट का बयान एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी का आरोप है। उन्होंने रिपोर्ट को सही बताया, लेकिन सार्वजनिक रूप से यह विस्तार नहीं दिया कि उनके पास इसकी पुष्टि का आधार क्या है। इसलिए उनके बयान को स्वतंत्र प्रमाण के बराबर नहीं माना जा सकता।
कथित चेतावनी का स्रोत क्या था
खोजी रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर 2023 में हमास की ओर से एक फिलिस्तीनी मध्यस्थ के माध्यम से संकेत मिले थे। इस मध्यस्थ के हमास और इजरायली सुरक्षा प्रतिष्ठान दोनों से संपर्क बताए गए हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सिनवार ने कथित तौर पर एक बड़े अभियान की तैयारी का संकेत दिया था। बाद में यही सूचना यूएई के नेतृत्व तक पहुंची और वहां से इजरायली नेतृत्व को चेतावनी दिए जाने का दावा किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार 15 सितंबर के आसपास यह सूचना इजरायली आंतरिक सुरक्षा तंत्र तक पहुंची। तत्कालीन शिन बेट प्रमुख रोनेन बार ने कथित तौर पर प्रधानमंत्री को सिनवार से जुड़ी चेतावनी के बारे में जानकारी दी। इसके बाद वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारियों की बैठक हुई।
उस बैठक को लेकर सामने आए विवरण में कहा गया है कि सुरक्षा अधिकारियों ने गाजा और वेस्ट बैंक की स्थिति पर चिंता जताई थी। यह भी सुझाव दिया गया था कि यहूदी त्योहारों से पहले सुरक्षा तैयारियों को मजबूत किया जाए या सैन्य स्तर पर कोई निर्णायक कदम लिया जाए। रिपोर्ट के अनुसार बैठक के बाद कोई बड़ा निर्णय नहीं लिया गया।
मिस्र से भी चेतावनी मिलने का दावा
इस मामले में केवल यूएई की कथित चेतावनी का उल्लेख नहीं है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि मिस्र के खुफिया प्रमुख अब्बास कामेल ने नेतन्याहू को हमास की ओर से एक असामान्य और बड़े अभियान की संभावना के बारे में आगाह किया था।
इस दावे के अनुसार इजरायली नेतृत्व को अलग-अलग माध्यमों से संभावित खतरे के संकेत मिल रहे थे। फिर भी 7 अक्टूबर को हमास ने इजरायल पर व्यापक हमला किया, जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए और बंधक बनाए गए।
यही वजह है कि इजरायल में 7 अक्टूबर की सुरक्षा विफलता को लेकर खुफिया एजेंसियों, सैन्य नेतृत्व और राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही पर लंबे समय से बहस चल रही है।
नेतन्याहू कार्यालय का क्या कहना है
नेतन्याहू कार्यालय ने रिपोर्ट के सबसे महत्वपूर्ण दावे को सीधे खारिज किया है। कार्यालय के मुताबिक प्रधानमंत्री ने संबंधित अवधि में यूएई के राष्ट्रपति से बातचीत नहीं की थी और न ही उन्हें मोहम्मद बिन जायद की ओर से हमास के हमले की कोई चेतावनी मिली थी।
इस खंडन के कारण मामला केवल राजनीतिक आरोप तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दो विपरीत दावों के बीच सत्यापन का सवाल बन जाता है।
एक तरफ खोजी रिपोर्ट है, जिसमें कई सूत्रों, दस्तावेजों और आंतरिक संचार के आधार पर घटनाक्रम पुनर्निर्मित किए जाने का दावा किया गया है। दूसरी तरफ इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय है, जो कथित बातचीत और चेतावनी दोनों से इनकार कर रहा है।
यही कारण है कि इस समय यह कहना जल्दबाजी होगी कि नेतन्याहू को निश्चित रूप से यूएई राष्ट्रपति ने फोन किया था और उन्होंने जानबूझकर चेतावनी को नजरअंदाज किया।
7 अक्टूबर की विफलता पर पुरानी बहस फिर सामने
7 अक्टूबर 2023 का हमला इजरायल की आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था की सबसे गंभीर विफलताओं में गिना जाता है। हमास के हमले ने इजरायल की सीमा सुरक्षा, खुफिया आकलन और सैन्य तैयारी पर बड़े सवाल खड़े किए थे।
बाद के वर्षों में यह सवाल लगातार उठता रहा कि इजरायली सुरक्षा एजेंसियों को हमास की तैयारियों के बारे में किस स्तर तक जानकारी थी और उपलब्ध संकेतों का मूल्यांकन किस तरह किया गया।
नई रिपोर्ट इस बहस को एक अलग आयाम देती है। यदि कथित यूएई चेतावनी और मिस्र से जुड़ी चेतावनी की स्वतंत्र पुष्टि होती है, तो जांच का दायरा केवल खुफिया एजेंसियों की विफलता तक सीमित नहीं रहेगा। राजनीतिक नेतृत्व के निर्णय और उपलब्ध जानकारी पर उसकी प्रतिक्रिया भी जांच के केंद्र में आ सकती है।
लेकिन अगर नेतन्याहू कार्यालय का खंडन सही साबित होता है, तो यूएई से हुई कथित सीधी बातचीत का दावा गंभीर रूप से कमजोर पड़ जाएगा।
सियासी असर कितना बड़ा हो सकता है
इस खुलासे का असर इजरायल की घरेलू राजनीति पर भी पड़ सकता है। नफ्ताली बेनेट ने नेतन्याहू पर सीधे राजनीतिक और व्यक्तिगत जिम्मेदारी का आरोप लगाया है। दूसरे विपक्षी नेताओं ने भी पहले से मौजूद चेतावनियों के संदर्भ में सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
यह मुद्दा खास तौर पर इसलिए संवेदनशील है क्योंकि 7 अक्टूबर की सुरक्षा विफलता की जवाबदेही इजरायल की राजनीति में लंबे समय से विवाद का विषय रही है।
किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए आधिकारिक जांच, फोन रिकॉर्ड, सुरक्षा दस्तावेज और संबंधित अधिकारियों के प्रत्यक्ष बयान महत्वपूर्ण होंगे। केवल राजनीतिक बयानों के आधार पर किसी व्यक्ति की आपराधिक या व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करना पत्रकारिता के लिहाज से उचित नहीं होगा।
क्षेत्रीय कूटनीति के लिए भी अहम मामला
यूएई और इजरायल के बीच राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद दोनों देशों के बीच सुरक्षा और रणनीतिक संपर्क बढ़ा था। ऐसे में यदि यूएई नेतृत्व ने वास्तव में हमास की गतिविधियों को लेकर इजरायल को चेतावनी दी थी, तो यह घटना दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग की गंभीरता को भी रेखांकित करेगी।
दूसरी ओर, अगर ऐसी चेतावनी का दावा गलत साबित होता है, तो यह सवाल उठेगा कि युद्धकालीन राजनीतिक माहौल में अपुष्ट सूचनाएं किस तरह सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर सकती हैं।
मामले में आगे क्या देखना होगा
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कथित फोन बातचीत की स्वतंत्र पुष्टि होती है या नहीं। इसके लिए आधिकारिक रिकॉर्ड, राजनयिक संपर्कों के दस्तावेज, सुरक्षा अधिकारियों के बयान और स्वतंत्र जांच के निष्कर्ष अहम होंगे।
दूसरा सवाल यह है कि सितंबर 2023 में इजरायली सुरक्षा प्रतिष्ठान तक हमास की संभावित कार्रवाई से संबंधित कितनी चेतावनियां पहुंची थीं और उन पर क्या कार्रवाई की गई।
तीसरा सवाल राजनीतिक जवाबदेही से जुड़ा है। यदि जांच में यह स्थापित होता है कि शीर्ष नेतृत्व को विश्वसनीय और विशिष्ट चेतावनी मिली थी तथा उसके बावजूद पर्याप्त सुरक्षा कदम नहीं उठाए गए, तो 7 अक्टूबर की विफलता की जिम्मेदारी को लेकर बहस और तीखी हो सकती है।
फिलहाल तथ्य और आरोप अलग रखना जरूरी
मौजूदा जानकारी में एक खोजी रिपोर्ट, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट का समर्थन और नेतन्याहू कार्यालय का स्पष्ट खंडन मौजूद है। इसलिए इस समय सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यही है कि यूएई राष्ट्रपति द्वारा कथित चेतावनी का दावा गंभीर है, लेकिन इसकी सार्वजनिक और स्वतंत्र पुष्टि अभी निर्णायक रूप से सामने नहीं आई है।
7 अक्टूबर की घटना से जुड़े किसी भी नए खुलासे का मूल्यांकन इसी कसौटी पर होना चाहिए कि उसके पीछे प्राथमिक दस्तावेज क्या हैं, संबंधित पक्ष क्या कहते हैं और स्वतंत्र जांच किस नतीजे तक पहुंचती है।
जनता के लिए अहम मुद्दा केवल यह जानना नहीं है कि चेतावनी दी गई थी या नहीं। असली सवाल यह है कि इजरायल के सुरक्षा तंत्र को हमास की तैयारी के बारे में क्या पता था, राजनीतिक नेतृत्व को कब जानकारी मिली और उपलब्ध जानकारी के बाद कौन से फैसले लिए गए।
यही तथ्यात्मक पड़ताल 7 अक्टूबर की सुरक्षा विफलता की वास्तविक तस्वीर सामने लाने में सबसे महत्वपूर्ण होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।