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मौसम बदलते ही सांस लेने में परेशानी क्यों बढ़ती है?

Neelam Saini 2026-08-26 17:48:30
मौसम बदलते ही सांस लेने में परेशानी क्यों बढ़ती है?
1. मौसम बदलते ही क्यों फूलने लगता है दम?

2. सांस की तकलीफ को न समझें मौसम का मामूली असर

3. इन लोगों को मौसम बदलने पर रहना चाहिए सतर्क

मौसम में अचानक बदलाव से ठंडी या गर्म हवा, अधिक नमी, परागकण, फफूंद, प्रदूषण और संक्रमण जैसे कारक सांस की परेशानी बढ़ा सकते हैं। अस्थमा और सीओपीडी वाले लोग अधिक संवेदनशील होते हैं। लगातार खांसी, घरघराहट, सीने में जकड़न या सांस फूलने पर चिकित्सकीय सलाह जरूरी है, खासकर गंभीर लक्षणों में।

Location: नई दिल्ली, भारत
Date: 26 अगस्त 2026
By: Neelam saini


मौसम बदलते ही सांस लेने में परेशानी क्यों बढ़ती है? किन लोगों को रहना चाहिए सतर्क

मौसम में बदलाव के साथ कुछ लोगों को सांस लेने में परेशानी, खांसी, सीने में जकड़न या घरघराहट की शिकायत बढ़ती महसूस होती है। इसका असर खास तौर पर अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी सीओपीडी जैसी श्वसन बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर पड़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक मौसम में बदलाव, वायु प्रदूषण, एलर्जी और श्वसन संक्रमण अस्थमा के लक्षणों को ट्रिगर कर सकते हैं। मौसम बदलना अपने आप में हर व्यक्ति के लिए सांस की बीमारी का कारण नहीं है। लेकिन तापमान, नमी, हवा की गुणवत्ता, परागकण और संक्रमण जैसे पर्यावरणीय कारकों में बदलाव संवेदनशील लोगों के वायुमार्ग को प्रभावित कर सकता है। इसलिए बार-बार होने वाली सांस की तकलीफ को केवल मौसम का सामान्य असर मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है।

क्या हुआ?

मौसम में बदलाव के दौरान वातावरण की कई स्थितियां एक साथ बदल सकती हैं। कभी तापमान अचानक गिरता है, कभी गर्मी और उमस बढ़ती है और कभी बारिश के बाद वातावरण में नमी तथा फफूंद का जोखिम बढ़ सकता है।अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र के अनुसार ठंडी और शुष्क हवा, अधिक नमी, गरज-चमक वाले मौसम, वायु प्रदूषण, फफूंद और कुछ संक्रमण अस्थमा के संभावित ट्रिगर हो सकते हैं। सीओपीडी से पीड़ित लोगों में भी अचानक मौसम परिवर्तन, अत्यधिक गर्म या ठंडा तापमान, तेज हवा और अधिक नमी लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। अमेरिकन लंग एसोसिएशन के मुताबिक श्वसन संक्रमण सीओपीडी के लक्षणों के बढ़ने और फ्लेयर-अप के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। 

पूरा संदर्भ क्या है?

सांस लेने की प्रक्रिया में हवा वायुमार्ग के जरिए फेफड़ों तक पहुंचती है। अस्थमा में इन वायुमार्गों में सूजन और संकुचन की समस्या हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इसके प्रमुख लक्षणों में सांस लेने में कठिनाई, सीने में जकड़न, खांसी और घरघराहट शामिल हैं। कुछ लोगों में ठंड, संक्रमण या मौसम में बदलाव के दौरान ये लक्षण अधिक गंभीर हो सकते हैं। 
दूसरी ओर, सीओपीडी एक दीर्घकालिक फेफड़ों की बीमारी है, जिसमें हवा का प्रवाह बाधित होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इसके सामान्य लक्षणों में सांस लेने में कठिनाई, लगातार खांसी, बलगम और थकान शामिल हैं। बीमारी बढ़ने पर रोजमर्रा के काम करते समय भी सांस फूलने की समस्या बढ़ सकती है। इसलिए मौसम बदलने के दौरान सांस की परेशानी बढ़ना केवल तापमान का मामला नहीं है। मौसम से जुड़े कई पर्यावरणीय और संक्रमण संबंधी कारक मिलकर संवेदनशील फेफड़ों पर असर डाल सकते हैं।

पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

ठंडी हवा कुछ लोगों के लिए सांस की समस्या बढ़ा सकती है। अमेरिकन लंग एसोसिएशन के अनुसार ठंडी और शुष्क हवा वायुमार्ग में जलन पैदा कर सकती है, जिसके कारण खांसी, घरघराहट और सांस फूलने जैसी शिकायत हो सकती है। दूसरी तरफ गर्म और नम हवा भी कुछ अस्थमा मरीजों में वायुमार्ग के संकुचन को बढ़ा सकती है। बारिश और नमी का एक दूसरा पहलू भी है। घरों में सीलन और फफूंद बढ़ने पर संवेदनशील लोगों में श्वसन संबंधी परेशानी बढ़ सकती है। सीडीसी के मुताबिक अस्थमा, एलर्जी या दूसरी फेफड़ों की बीमारियों वाले लोग फफूंद के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। 
वायु प्रदूषण भी महत्वपूर्ण कारक है। प्रदूषित हवा में मौजूद कण और अन्य प्रदूषक फेफड़ों पर दबाव डाल सकते हैं तथा अस्थमा के दौरे और चिकित्सकीय सहायता की जरूरत बढ़ा सकते हैं। 

प्रमुख पक्षकारों का रुख

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि अस्थमा के लक्षण कई पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी कारकों से प्रभावित हो सकते हैं। इनमें तंबाकू का धुआं, वायु प्रदूषण, एलर्जी, श्वसन संक्रमण और मौसम में बदलाव शामिल हैं। सीडीसी भी अस्थमा मरीजों को अपने व्यक्तिगत ट्रिगर पहचानने और उनसे बचने की सलाह देता है। संस्थान के मुताबिक धुआं, धूल, फफूंद, वायु प्रदूषण, परागकण, संक्रमण और कुछ मौसम संबंधी स्थितियां अस्थमा के लक्षणों को बढ़ा सकती हैं। सीओपीडी के मामले में अमेरिकन लंग एसोसिएशन ने अचानक मौसम परिवर्तन, अत्यधिक तापमान, तेज हवा, अधिक नमी, परागकण और प्रदूषण को संभावित ट्रिगर के तौर पर सूचीबद्ध किया है। 

उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?

उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी यह नहीं कहती कि मौसम बदलते ही हर व्यक्ति को सांस की परेशानी होगी। असर व्यक्ति की बीमारी, संवेदनशीलता और आसपास के पर्यावरण पर निर्भर करता है।अस्थमा वाले व्यक्ति में ठंडी हवा या अधिक नमी वायुमार्ग को प्रभावित कर सकती है। वहीं बारिश के बाद घर के भीतर बढ़ी सीलन और फफूंद भी कुछ लोगों के लिए समस्या बन सकती है। सीडीसी के अनुसार घर में नमी को नियंत्रित रखना और पानी के रिसाव को जल्द ठीक करना फफूंद के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। सीओपीडी में भी मौसम संबंधी बदलाव लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। हालांकि सांस फूलने की हर घटना को मौसम के कारण हुई समस्या मानना उचित नहीं है, क्योंकि संक्रमण, प्रदूषण और बीमारी का बढ़ना भी इसके पीछे हो सकता है। 

संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं?

मौसम से जुड़े ट्रिगर के संपर्क में आने पर संवेदनशील व्यक्ति में खांसी, घरघराहट, सीने में जकड़न और सांस लेने में परेशानी बढ़ सकती है। अस्थमा में ये लक्षण कभी-कभी अचानक गंभीर भी हो सकते हैं। सीओपीडी के मरीजों में लक्षणों का अचानक बढ़ना फ्लेयर-अप का संकेत हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक ऐसे फ्लेयर-अप कुछ दिनों तक रह सकते हैं और अतिरिक्त उपचार की जरूरत पड़ सकती है। सबसे अधिक सतर्कता उन लोगों को रखनी चाहिए जिन्हें पहले से अस्थमा, सीओपीडी या दूसरी पुरानी फेफड़ों की बीमारी है। इसके अलावा एलर्जी वाले लोगों में भी परागकण, धूल और फफूंद जैसे कारक परेशानी बढ़ा सकते हैं।

राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव

इस विषय का सीधा राजनीतिक पहलू सीमित है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के स्तर पर वायु गुणवत्ता, प्रदूषण नियंत्रण और श्वसन रोगों की निगरानी महत्वपूर्ण है।वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना केवल अस्थमा या सीओपीडी मरीजों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। सीडीसी के अनुसार प्रदूषण फेफड़ों की कार्यक्षमता और श्वसन स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। शहरी इलाकों में प्रदूषण, यातायात से निकलने वाला धुआं और खराब इनडोर एयर क्वालिटी ऐसे कारक हैं जिन पर सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति के तहत लगातार ध्यान देने की जरूरत है।

आर्थिक और सामाजिक असर

सांस संबंधी बीमारी बढ़ने पर इसका असर व्यक्ति की दैनिक गतिविधियों और कामकाजी क्षमता पर पड़ सकता है। सीओपीडी के संबंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बीमारी के कारण घरेलू और कार्यस्थल उत्पादकता पर आर्थिक असर की ओर भी संकेत किया है। 
बार-बार होने वाली सांस की परेशानी से चिकित्सकीय परामर्श, दवाओं और अस्पताल जाने की जरूरत बढ़ सकती है। इसलिए शुरुआती लक्षणों की पहचान और निर्धारित उपचार का पालन सामाजिक तथा आर्थिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है।घर के भीतर की हवा भी उतनी ही अहम है। धूम्रपान, धूल, तेज खुशबू वाले उत्पाद, सफाई के कुछ रसायन और फफूंद संवेदनशील लोगों के लिए परेशानी बढ़ा सकते हैं। 

अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रभाव

श्वसन रोगों का बोझ वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सीओपीडी दुनिया में मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है और 2023 में इससे लगभग 34 लाख मौतें हुईं। संगठन के मुताबिक तंबाकू धूम्रपान और घरेलू वायु प्रदूषण इसके प्रमुख जोखिम कारकों में हैं। मौसम में बदलाव और चरम मौसम की स्थितियां भी श्वसन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। सीडीसी द्वारा संकलित शोध में तापमान की चरम स्थितियों, गरज-तूफान, बाढ़ और वायु प्रदूषण जैसी परिस्थितियों तथा अस्थमा के लक्षणों में बढ़ोतरी के बीच संबंध की रिपोर्ट की गई है। 

कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?

हर व्यक्ति में मौसम का असर एक जैसा क्यों नहीं होता, इसका जवाब केवल तापमान से नहीं दिया जा सकता। आनुवंशिक संवेदनशीलता, पहले से मौजूद बीमारी, एलर्जी, प्रदूषण, संक्रमण और व्यक्तिगत ट्रिगर भी भूमिका निभाते हैं।इसी तरह सांस फूलने की समस्या को केवल मौसम से जोड़ना जोखिम भरा हो सकता है। सांस की तकलीफ हृदय या फेफड़ों की दूसरी बीमारियों का संकेत भी हो सकती है। इसलिए लगातार या बार-बार होने वाले लक्षणों का चिकित्सकीय मूल्यांकन जरूरी है।

आगे क्या होगा?

मौसम में बदलाव के दौरान सांस की बीमारी वाले लोगों के लिए व्यक्तिगत ट्रिगर की पहचान सबसे उपयोगी रणनीतियों में से एक है। बाहर निकलने से पहले मौसम और वायु गुणवत्ता की स्थिति पर ध्यान देना, धुएं और प्रदूषण से बचना तथा चिकित्सक द्वारा निर्धारित दवाओं का सही इस्तेमाल करना मददगार हो सकता है। सीओपीडी या अस्थमा वाले लोगों को अपनी दवाएं या इनहेलर डॉक्टर की सलाह के बिना बंद या बदलने नहीं चाहिए। सीडीसी भी अस्थमा मरीजों को अपने उपचार प्लान का पालन जारी रखने की सलाह देता है। यदि सांस लेने में गंभीर परेशानी हो, व्यक्ति सामान्य रूप से बोल न पा रहा हो, सीने में लगातार दर्द या दबाव हो, होंठ या चेहरा नीला पड़ रहा हो अथवा स्थिति तेजी से बिगड़ रही हो, तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है।

संपादकीय निष्कर्ष

मौसम बदलने के साथ सांस की परेशानी बढ़ने के पीछे एक ही वजह नहीं होती। ठंडी या गर्म हवा, नमी, फफूंद, परागकण, प्रदूषण और श्वसन संक्रमण जैसे कई कारक संवेदनशील लोगों के लक्षणों को बढ़ा सकते हैं। अस्थमा और सीओपीडी से जूझ रहे लोगों को मौसम में बदलाव के दौरान विशेष सावधानी रखनी चाहिए। सांस फूलना, लगातार खांसी, घरघराहट या सीने में जकड़न को बार-बार होने पर सामान्य मानने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना अधिक सुरक्षित है। मौसम को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, लेकिन ट्रिगर की पहचान, प्रदूषण से बचाव और निर्धारित उपचार का पालन करके जोखिम को कम किया जा सकता है।

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Neelam Saini

Neelam Saini

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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