जर्मनी के क्षेत्रीय चुनाव में बर्लिन में डाई लिंके सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि मेक्लेनबुर्ग-वोर्पोमेर्न में एएफडी ने सबसे अधिक वोट हासिल किए।
जर्मनी के 20 सितंबर के क्षेत्रीय चुनावों ने देश की सियासत में एक साथ दो अलग रुझान सामने रखे। राजधानी बर्लिन में वामपंथी डाई लिंके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि उत्तर-पूर्वी राज्य मेक्लेनबुर्ग-वोर्पोमेर्न में दक्षिणपंथी एएफडी ने सबसे अधिक वोट हासिल किए।
इन नतीजों में चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ की सीडीयू को भी बड़ा झटका लगा। मेक्लेनबुर्ग-वोर्पोमेर्न में पार्टी करीब 4.9 प्रतिशत वोट तक सिमट गई, जो युद्ध के बाद किसी राज्य चुनाव में उसका सबसे कमजोर प्रदर्शन बताया गया है।
बर्लिन के राज्य चुनाव में डाई लिंके ने करीब 25.3 प्रतिशत वोट हासिल कर पहला स्थान बनाया। सीडीयू करीब 19.1 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रही। एएफडी को करीब 16.3 प्रतिशत वोट मिले।
डाई लिंके की प्रमुख उम्मीदवार एलिफ एराल्प ने चुनाव अभियान में राजधानी के आवास संकट और बढ़ते किरायों को प्रमुख मुद्दा बनाया था। पार्टी ने निजी आवास कंपनियों के बड़े हिस्से को सार्वजनिक नियंत्रण में लाने की नीति का समर्थन किया है।
हालांकि सबसे अधिक वोट हासिल करना सरकार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। बर्लिन में बहुमत के लिए दूसरे दलों के साथ गठबंधन की जरूरत होगी। इसलिए चुनावी जीत के बाद अगला अहम चरण गठबंधन वार्ता है।
मेक्लेनबुर्ग-वोर्पोमेर्न में एएफडी ने करीब 38.3 प्रतिशत वोट हासिल किए और पहले स्थान पर रही। एसपीडी को लगभग 35.4 प्रतिशत वोट मिले। सीडीयू करीब 4.9 प्रतिशत पर रह गई और राज्य विधानसभा में प्रवेश के लिए जरूरी 5 प्रतिशत सीमा से नीचे चली गई।
एएफडी के लिए यह नतीजा इसलिए अहम है क्योंकि पार्टी ने पूर्वी जर्मनी के कई इलाकों में अपनी चुनावी पकड़ मजबूत की है। इससे पहले सितंबर में सैक्सोनी-अनहाल्ट में भी एएफडी ने करीब 44 प्रतिशत वोट हासिल किए थे।
फिर भी सबसे अधिक वोट मिलना अपने आप में सरकार बनाने की गारंटी नहीं है। प्रमुख पार्टियों ने एएफडी के साथ गठबंधन से दूरी बनाए रखने की नीति कायम रखी है। डॉयचे वेले के मुताबिक, दोनों राज्यों में एएफडी के लिए सरकार बनाने का रास्ता फिलहाल सीमित है।
इन चुनावों का सीधा असर फ्रेडरिक मर्ज़ के नेतृत्व पर राजनीतिक दबाव के रूप में सामने आया है। सीडीयू को दोनों राज्यों में अपेक्षा के मुताबिक समर्थन नहीं मिला।
मेक्लेनबुर्ग-वोर्पोमेर्न में पार्टी का प्रदर्शन खास तौर पर कमजोर रहा। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 4.9 प्रतिशत वोट के साथ सीडीयू राज्य विधानसभा में प्रतिनिधित्व के लिए जरूरी सीमा से नीचे चली गई।
मर्ज़ ने चुनावी नतीजों को गंभीर झटका माना, लेकिन पद छोड़ने की संभावना से इनकार किया और सरकार के आर्थिक सुधार कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की बात कही।
इन दोनों चुनावों को एक ही राजनीतिक दिशा का संकेत मानना आसान नहीं होगा। बर्लिन में आवास, किराया और सामाजिक नीतियां प्रमुख चुनावी मुद्दों में रहीं। रॉयटर्स के अनुसार, शहर में किराये की कीमतें 2014 के बाद लगभग दोगुनी हुई हैं और 2040 तक करीब 211,000 अतिरिक्त घरों की जरूरत का अनुमान है।
इसके उलट मेक्लेनबुर्ग-वोर्पोमेर्न में एएफडी ने आर्थिक असंतोष, प्रवासन और क्षेत्रीय मुद्दों को अपने अभियान का हिस्सा बनाया। चुनावी नतीजे बताते हैं कि मतदाताओं की प्राथमिकताएं राज्य और क्षेत्र के हिसाब से अलग हैं।
एएफडी की लगातार चुनावी सफलता जर्मनी की पार्टी व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दे रही है। पार्टी ने पूर्वी जर्मनी के राज्यों में अपना आधार मजबूत किया है और राष्ट्रीय राजनीति में भी उसका प्रभाव बढ़ा है।
मेक्लेनबुर्ग-वोर्पोमेर्न में उसकी बढ़त पिछले प्रदर्शन की तुलना में बड़ा विस्तार है। रिपोर्ट रॉयटर्स के अनुसार, पार्टी ने वहां अपने पिछले वोट हिस्से को दोगुने से अधिक किया।
लेकिन चुनावी समर्थन और सत्ता हासिल करने के बीच अभी भी अंतर है। गठबंधन के लिए अन्य प्रमुख दलों की असहमति एएफडी के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक बाधाओं में से एक बनी हुई है।
बर्लिन में डाई लिंके का प्रदर्शन भी जर्मनी की राजनीति के दूसरे ध्रुव की सक्रियता दिखाता है। पार्टी ने आवास और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अपना अभियान केंद्रित किया।
एलिफ एराल्प के नेतृत्व में पार्टी ने राजधानी में सीडीयू को पीछे छोड़ दिया। रिपोर्ट के अनुसार, डाई लिंके ने करीब 25.3 प्रतिशत वोट हासिल किए।
अब चुनौती यह है कि पार्टी अपने चुनावी प्रदर्शन को शासन की ठोस नीति में कैसे बदलती है। इसके लिए उसे संभावित गठबंधन सहयोगियों के साथ सहमति बनानी होगी।
बर्लिन में किसी एक दल को सरकार बनाने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं मिला है। इसलिए एसपीडी और ग्रीन पार्टी के साथ संभावित बातचीत महत्वपूर्ण होगी। रॉयटर्स ने गठबंधन वार्ता की संभावना का उल्लेख किया है।
मेक्लेनबुर्ग-वोर्पोमेर्न में भी एएफडी के पहले स्थान पर आने के बावजूद सरकार बनाने का सवाल जटिल है। अन्य दलों की एएफडी से दूरी के कारण वैकल्पिक गठबंधन समीकरण सामने आ सकते हैं।
इन क्षेत्रीय चुनावों का असर केवल राज्य स्तर तक सीमित नहीं रहेगा। सीडीयू के कमजोर प्रदर्शन से मर्ज़ सरकार पर आर्थिक सुधार, सामाजिक नीति और पार्टी की रणनीति को लेकर दबाव बढ़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, जर्मनी में आर्थिक सुस्ती, जीवन-यापन की लागत और ऊर्जा से जुड़े सवाल मतदाताओं के रुझान को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों में रहे हैं।
हालांकि इन क्षेत्रीय नतीजों को सीधे राष्ट्रीय चुनाव के परिणाम के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा। राज्य चुनावों में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों की लोकप्रियता और क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अब दोनों राज्यों में सरकार गठन की प्रक्रिया पर निगाह रहेगी। बर्लिन में डाई लिंके को अपनी बढ़त को बहुमत वाले गठबंधन में बदलने के लिए सहयोगियों की जरूरत होगी।
मेक्लेनबुर्ग-वोर्पोमेर्न में एएफडी के सामने सबसे बड़ा सवाल सत्ता तक पहुंच का है। अधिकतम वोट हासिल करने के बावजूद अन्य दलों की दूरी उसके लिए गठबंधन का रास्ता कठिन बनाती है।
राष्ट्रीय स्तर पर मर्ज़ के लिए यह परिणाम पार्टी संगठन और सरकार की नीतियों को लेकर नई बहस को जन्म दे सकते हैं। वहीं एएफडी और डाई लिंके दोनों के मजबूत प्रदर्शन से जर्मनी की पारंपरिक केंद्र-आधारित पार्टी राजनीति पर दबाव बढ़ता दिख रहा है।
बर्लिन और मेक्लेनबुर्ग-वोर्पोमेर्न के चुनावों को साथ देखने पर एक तथ्य स्पष्ट है। जर्मनी के राजनीतिक परिदृश्य में अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों को मजबूत समर्थन मिल रहा है, जबकि सीडीयू जैसी पारंपरिक प्रमुख पार्टी को दोनों राज्यों में नुकसान हुआ है।
लेकिन इन नतीजों का अंतिम राजनीतिक असर आने वाले गठबंधन फैसलों और सरकारों के कामकाज पर निर्भर करेगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 20 सितंबर के चुनावों ने जर्मनी की घरेलू सियासत में बहस के नए केंद्र तय कर दिए हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।