नई दिल्ली में ब्रिक्स चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के दौरान केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत का तेजी से विकसित होता नवाचार इकोसिस्टम ब्रिक्स देशों के साथ अंतरिक्ष, जैवप्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीप टेक जैसे क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसर पैदा कर रहा है। यह पहल केवल वैज्ञानिक साझेदारी नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक और तकनीकी सहयोग के विस्तार की दिशा में भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
📍 स्थान: नई दिल्ली
📰 तारीख: 29 जून 2026
✍️ Byline: Apurva Chowdhury
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ब्रिक्स सहयोग के नए दौर की दस्तक
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में विज्ञान, टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप इकोसिस्टम में उल्लेखनीय विस्तार किया है। इसी पृष्ठभूमि में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह का यह बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि भारत अब ब्रिक्स देशों के साथ अंतरिक्ष, जैवप्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीप टेक जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसर देख रहा है।
नई दिल्ली में ब्रिक्स चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक के दौरान उन्होंने उद्योग संगठनों को ज्ञान, नवाचार और साझेदारी आधारित वैश्विक सहयोग को मजबूत करने का आह्वान किया। उनका कहना था कि ब्रिक्स सीसीआई भारतीय स्टार्टअप और सदस्य देशों के इनोवेशन नेटवर्क के बीच प्रभावी पुल बन सकता है।
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भारत का बदलता इनोवेशन नैरेटिव
भारत अब केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं बल्कि नवाचार आधारित समाधान विकसित करने वाला प्रमुख देश बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप इकोसिस्टम और रिसर्च निवेश ने देश की वैश्विक क्रेडिबिलिटी को मजबूत किया है।
स्पेस सेक्टर के निजीकरण, बायोटेक रिसर्च, एआई एप्लिकेशन और डीप टेक स्टार्टअप्स में बढ़ती भागीदारी ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की नई संभावनाएं पैदा की हैं। यही वजह है कि भारत अब विज्ञान आधारित डिप्लोमेसी को अपनी विदेश नीति के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में भी आगे बढ़ा रहा है।
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ब्रिक्स मंच क्यों महत्वपूर्ण है
ब्रिक्स केवल आर्थिक समूह नहीं रहा बल्कि यह विज्ञान, टेक्नोलॉजी, हेल्थ, एजुकेशन और डिजिटल इकोनॉमी जैसे क्षेत्रों में सहयोग का विस्तृत प्लेटफॉर्म बन चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सदस्य देशों के बीच रिसर्च, डेटा, स्टार्टअप और इंडस्ट्री सहयोग मजबूत होता है तो इससे नई तकनीकों के विकास की गति बढ़ सकती है। इससे विकासशील देशों को पश्चिमी तकनीकी निर्भरता कम करने का अवसर भी मिल सकता है।
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अंतरिक्ष और जैवप्रौद्योगिकी की बढ़ती अहमियत
स्पेस टेक्नोलॉजी अब केवल सैटेलाइट लॉन्च तक सीमित नहीं है। कृषि, मौसम, डिजास्टर मैनेजमेंट, संचार और राष्ट्रीय सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में इसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।
इसी प्रकार जैवप्रौद्योगिकी हेल्थकेयर, वैक्सीन, कृषि और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाओं का द्वार खोल रही है। भारत इन दोनों क्षेत्रों में अपनी क्षमता का विस्तार कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से इस प्रक्रिया को गति मिलने की संभावना है।
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कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीप टेक पर विशेष ध्यान
एआई और डीप टेक भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था के प्रमुख इंजन माने जा रहे हैं। भारत में तेजी से बढ़ते स्टार्टअप इकोसिस्टम ने इन क्षेत्रों में उल्लेखनीय निवेश आकर्षित किया है।
ब्रिक्स देशों के साथ साझा रिसर्च, प्रतिभा विनिमय और तकनीकी साझेदारी से नई तकनीकों का विकास तेज हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि एआई सहयोग के साथ डेटा प्राइवेसी, साइबर सिक्योरिटी और नियामकीय मानकों पर स्पष्ट सहमति आवश्यक होगी।
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उद्योग संगठनों की भूमिका
डॉ. जितेंद्र सिंह ने उद्योग संगठनों को केवल व्यापारिक मंच नहीं बल्कि ज्ञान साझेदारी के माध्यम के रूप में देखने की आवश्यकता बताई।
ब्रिक्स सीसीआई स्टार्टअप, महिला उद्यमिता, रिसर्च सहयोग, व्यापार सुगमता और एआई आधारित परियोजनाओं को जोड़ने का कार्य कर सकता है। यदि उद्योग, सरकार और शैक्षणिक संस्थान एक साथ काम करें तो नवाचार का दायरा और व्यापक हो सकता है।
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क्या चुनौतियाँ भी मौजूद हैं
वैश्विक सहयोग जितना अवसर लेकर आता है, उतनी ही चुनौतियाँ भी सामने रखता है।
ब्रिक्स देशों की नीतियों, निवेश नियमों, बौद्धिक संपदा अधिकारों और डेटा गवर्नेंस में अंतर मौजूद है। तकनीकी सहयोग को प्रभावी बनाने के लिए इन क्षेत्रों में स्पष्ट नीति ढांचे की आवश्यकता होगी।
इसके अतिरिक्त भू-राजनीतिक परिस्थितियां भी वैज्ञानिक सहयोग को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए केवल राजनीतिक घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि संस्थागत व्यवस्था और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता भी जरूरी होगी।
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दूसरा दृष्टिकोण
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि विज्ञान और तकनीक में सहयोग तभी प्रभावी होगा जब सदस्य देशों के बीच वास्तविक परियोजनाएं, संयुक्त निवेश और रिसर्च फंडिंग बढ़े।
सिर्फ बैठकों और घोषणाओं से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। इसलिए आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि घोषित सहयोग कितनी ठोस परियोजनाओं में परिवर्तित होता है।
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भारत के लिए संभावित असर
यदि प्रस्तावित सहयोग व्यावहारिक रूप लेता है तो भारतीय स्टार्टअप्स को नए बाजार, शोध संस्थानों को वैश्विक साझेदार और वैज्ञानिकों को अंतरराष्ट्रीय सहयोग का बेहतर अवसर मिल सकता है।
इससे तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी बल मिलेगा और वैश्विक इनोवेशन नेटवर्क में भारत की भूमिका और मजबूत हो सकती है।
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भविष्य की दिशा
ब्रिक्स सहयोग आने वाले वर्षों में केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। विज्ञान, स्वास्थ्य, एआई, क्वांटम टेक्नोलॉजी, स्पेस और बायोटेक जैसे क्षेत्रों में साझेदारी वैश्विक विकास की नई दिशा तय कर सकती है।
भारत यदि अपने रिसर्च निवेश, नीति सुधार और स्टार्टअप समर्थन को इसी गति से आगे बढ़ाता है तो वह इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
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निष्कर्ष
ब्रिक्स सहयोग पर डॉ. जितेंद्र सिंह का बयान केवल एक कूटनीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि भारत के बदलते वैज्ञानिक और तकनीकी आत्मविश्वास का संकेत भी है। हालांकि वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि घोषणाएं किस हद तक ठोस परियोजनाओं, संस्थागत साझेदारी और साझा अनुसंधान में बदलती हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि विज्ञान आधारित डिप्लोमेसी और इनोवेशन साझेदारी आने वाले दशक में भारत की वैश्विक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रही है।