सौगवार शिया समुदाय के दोस्तों को मोहर्रम की मुबारकबाद देने से बचे 

अज्ञानता के कारण कुछ लोग आशूरा या मोहर्रम के इतिहास की सही जानकारी नहीं होने के कारण सौगवार शिया समुदाय के अपने दोस्तों और जानकारी को मोहर्रम की मुबारकबाद देते हैं

~ Zia Abbas Zaidi 

सहारनपुर, ( Shah Times ) । आशूरा या यूं कहे कि मोहर्रम इंसानियत का महीना माना जाता है। क्योंकि कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन ने इंसानियत को बचाया था। 

अज्ञानता के कारण कुछ लोग आशूरा या मोहर्रम के इतिहास की सही जानकारी नहीं होने के कारण सौगवार शिया समुदाय के अपने दोस्तों और जानकारी को मोहर्रम की मुबारकबाद देते हैं जो पूरी तरह से गलत हैं बकरीद के 20 दिनों बाद मुहर्रम मनाया जाता है।

इस्लामी धर्म के मुताबिक मोहर्रम की पहली तारीख से नए साल का आगाज होता है। इस्लाम धर्म की मान्यता के मुताबिक हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ आशूरा मुहर्रम माहा के 10 वें दिन कर्बला के मैदान में शहीद हो गए थे।

उनकी शहादत और कुर्बानी के तौर पर इस दिन को याद किया जाता है। कर्बला की लड़ाई में हजरत इमाम हुसैन ने इंसानियत को बचाया था इसलिए मोहर्रम को इंसानियत का महीना माना जाता है।

 हजरत इमाम हुसैन की शहादत और कुर्बानी की याद में मुहर्रम मनाया जाता है इमाम हुसैन की याद में ताजिया और जुलूस निकाले जाते हैं। कहा जाता है कि इराक में यजीद नाम का एक बादशाह था जो इंसानियत का दुश्मन और अल्लाह पर यजीद का विश्वास नहीं था। 

आशूरा या मोहर्रम बकरीद के 20 दिनों के बाद मनाया जाता है।मोहर्रम के इस इतिहास को जानने के बाद कोई भी व्यक्ति अपने करीबी सौगवार शिया समुदाय के दोस्तों वह करीबी जानकारो को मोहर्रम की मुबारकबाद नहीं देनी चाहिए।

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