
Harish Rana euthanasia case Supreme Court verdict illustration – Shah Times
इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट की नई रहनुमाई
गरिमा, जिंदगी और कानून: हरीश राणा केस का बड़ा फैसला
पैसिव यूथेनेशिया पर अदालत की अहम तशरीह
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में एक अहम फैसला सुनाते हुए पैसिव यूथेनेशिया यानी लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट हटाने की इजाज़त दे दी है। अदालत ने साफ किया कि जब किसी मरीज के ठीक होने की उम्मीद खत्म हो जाए और वह पूरी तरह मशीनों पर निर्भर हो, तब गरिमापूर्ण मौत का हक़ भी संविधान के अनुच्छेद 21 के दायरे में आता है।
इस फैसले में अदालत ने एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया के फर्क को भी दोहराया और मेडिकल बोर्ड की भूमिका, परिवार की सहमति तथा संस्थागत प्रक्रिया को स्पष्ट दिशा-निर्देशों के साथ तय किया।
यह फैसला सिर्फ एक परिवार की पीड़ा का अंत नहीं, बल्कि भारतीय क़ानून और समाज में जीवन, मृत्यु और इंसानी गरिमा पर एक नई बहस की शुरुआत भी है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
एक इंसानी कहानी जिसने अदालत तक रास्ता बनाया
कानून की दुनिया में कुछ मुकदमे ऐसे होते हैं जो महज़ कानूनी बहस नहीं रहते, बल्कि समाज की नैतिकता, इंसानियत और संवैधानिक समझ को आईना दिखाते हैं। हरीश राणा का मामला भी ऐसा ही है।
करीब तेरह साल पहले एक हादसे ने एक नौजवान की जिंदगी बदल दी। पंजाब यूनिवर्सिटी का छात्र, जिसकी उम्र तब लगभग बीस साल थी, अचानक चौथी मंजिल से गिर पड़ा। गंभीर ब्रेन इंजरी ने उसे ऐसी हालत में पहुँचा दिया जिसे चिकित्सा की भाषा में परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट कहा जाता है।
इस स्थिति का मतलब है कि शरीर सांस ले रहा है, दिल धड़क रहा है, मगर चेतना लगभग खत्म हो चुकी होती है। हरीश राणा पिछले तेरह वर्षों से मशीनों और मेडिकल ट्रीटमेंट पर निर्भर थे।
यहीं से शुरू हुई एक लंबी कानूनी और इंसानी जद्दोजहद।
परिवार की पीड़ा और अदालत की दुविधा
हरीश के माता-पिता ने अदालत से गुज़ारिश की कि उनके बेटे को अब मशीनों पर जिंदा रखने का सिलसिला खत्म किया जाए। उनका कहना था कि डॉक्टरों ने साफ कहा है कि ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बची है।
यहां अदालत के सामने एक बेहद नाजुक सवाल था।
क्या जिंदगी को हर हाल में बढ़ाया जाना चाहिए, चाहे वह सिर्फ मशीनों के सहारे ही क्यों न हो?
या फिर ऐसी हालत में इंसान को गरिमा के साथ मौत चुनने का हक़ होना चाहिए?
यह सवाल सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि नैतिकता और समाज की सोच का भी है।
अदालत का फैसला: गरिमा को केंद्र में रखा गया
दो सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में कहा कि जीवन का अधिकार सिर्फ सांस लेने का अधिकार नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी है।
अगर किसी व्यक्ति की जिंदगी केवल मशीनों के सहारे खिंच रही हो और मेडिकल साइंस के अनुसार सुधार की कोई उम्मीद न हो, तो ऐसे हालात में जीवन को कृत्रिम तरीके से लंबा करना उसकी गरिमा के खिलाफ हो सकता है।
अदालत ने कहा कि पैसिव यूथेनेशिया ऐसे मामलों में एक वैध विकल्प हो सकता है, बशर्ते मेडिकल बोर्ड और संस्थागत प्रक्रिया इसकी पुष्टि करे।
एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया का फर्क
इस फैसले में अदालत ने एक अहम बात दोहराई।
एक्टिव यूथेनेशिया यानी किसी मरीज को इंजेक्शन या दवा देकर मौत देना भारत में अब भी गैरकानूनी है।
लेकिन पैसिव यूथेनेशिया, यानी लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाना या ट्रीटमेंट रोक देना, कुछ शर्तों के साथ अनुमति योग्य है।
दूसरे शब्दों में कहें तो कानून किसी को जानबूझकर मारने की अनुमति नहीं देता, लेकिन जब चिकित्सा पूरी तरह बेअसर हो जाए तो प्रकृति को अपना रास्ता लेने दिया जा सकता है।
मेडिकल बोर्ड की भूमिका क्यों अहम है
इस फैसले में अदालत ने मेडिकल बोर्ड की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बताया है।
कोई भी ऐसा फैसला केवल परिवार की इच्छा से नहीं लिया जा सकता।
इसके लिए दो स्तर के मेडिकल बोर्ड यह जांचते हैं कि मरीज की हालत वास्तव में अपरिवर्तनीय है या नहीं।
यह प्रक्रिया इसलिए जरूरी है ताकि किसी भी तरह के दुरुपयोग की संभावना खत्म हो सके।
2018 के फैसले से आगे की कड़ी
भारत में गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर बहस नई नहीं है।
कुछ वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि व्यक्ति को गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार भी संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आता है।
हालांकि उस फैसले में कई प्रक्रियात्मक सवाल खुले रह गए थे।
हरीश राणा मामले में अदालत ने उन्हीं सवालों को अधिक स्पष्टता के साथ संबोधित किया है।
क्या समाज इसके लिए तैयार है?
यहां एक बड़ा सवाल उठता है।
क्या भारतीय समाज इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील विषय को समझने और स्वीकार करने के लिए तैयार है?
कई लोग मानते हैं कि जिंदगी ईश्वर की देन है और उसे खत्म करने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए।
दूसरी तरफ एक विचारधारा यह कहती है कि जब जीवन केवल पीड़ा और निर्भरता में बदल जाए तो गरिमा का सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
अस्पतालों की वास्तविकता
अगर हम अस्पतालों की वास्तविकता देखें तो ऐसे कई मामले होते हैं जहां मरीज वर्षों तक मशीनों पर जिंदा रहता है।
परिवार भावनात्मक और आर्थिक दोनों स्तर पर टूट जाता है।
कई बार डॉक्टर भी जानते हैं कि रिकवरी की कोई संभावना नहीं है, मगर कानूनी अस्पष्टता के कारण ट्रीटमेंट जारी रखना पड़ता है।
यह फैसला शायद ऐसी दुविधाओं को कम करने की दिशा में एक कदम हो सकता है।
क्या इससे दुरुपयोग का खतरा बढ़ेगा?
इस बहस का एक दूसरा पहलू भी है।
कुछ विशेषज्ञों को डर है कि अगर प्रक्रिया स्पष्ट न हो तो कहीं परिवार या संस्थाएं आर्थिक कारणों से मरीज का इलाज जल्दी बंद करने का दबाव न बनाने लगें।
इसी वजह से अदालत ने कई स्तर की जांच और मेडिकल बोर्ड की सहमति को अनिवार्य बनाया है।
यह संतुलन जरूरी है, ताकि इंसानी गरिमा भी सुरक्षित रहे और कानून का दुरुपयोग भी न हो।
अदालत की भाषा में मानवीय संवेदना
फैसले के दौरान अदालत ने हरीश राणा के परिवार की तारीफ भी की।
तेरह साल तक किसी मरीज की देखभाल करना आसान नहीं होता।
यह केवल चिकित्सा का मामला नहीं, बल्कि भावनात्मक समर्पण का भी सवाल है।
अदालत ने माना कि परिवार ने जिस धैर्य और समर्पण से यह जिम्मेदारी निभाई, वह अपने आप में मिसाल है।
एक गहरी दार्शनिक बहस
यह मामला आखिरकार हमें एक बुनियादी सवाल के सामने खड़ा करता है।
जिंदगी का अर्थ क्या है?
क्या केवल सांस लेना ही जीवन है, या चेतना, स्वतंत्रता और गरिमा भी उतनी ही जरूरी हैं?
कानून इन सवालों का अंतिम उत्तर नहीं दे सकता, लेकिन वह समाज को सोचने का एक ढांचा जरूर देता है।
आगे का रास्ता
हरीश राणा का मामला शायद आने वाले वर्षों में चिकित्सा नीति, अस्पताल प्रोटोकॉल और कानूनी ढांचे को प्रभावित करेगा।
मुमकिन है कि भविष्य में लिविंग विल, मेडिकल निर्देश और एंड-ऑफ-लाइफ केयर जैसे मुद्दों पर ज्यादा स्पष्ट नीतियां बनें।
क्योंकि आखिरकार आधुनिक चिकित्सा ने जीवन को लंबा करने की क्षमता तो बढ़ा दी है, मगर उसने यह कठिन सवाल भी खड़ा कर दिया है कि जीवन कब तक और किस रूप में बढ़ाया जाना चाहिए।
हरीश राणा का मामला केवल एक अदालत का फैसला नहीं है।
यह एक समाज की आत्मचिंतन की घड़ी है।
जहां कानून, नैतिकता और इंसानी संवेदना तीनों एक साथ खड़े दिखाई देते हैं।
सवाल यह नहीं कि मौत कब आती है।
सवाल यह है कि जीवन और मृत्यु दोनों में इंसान की गरिमा कैसे सुरक्षित रखी जाए।





