
Uttar Pradesh Assembly during Budget Session debate, editorial perspective by Shah Times
सदन का शोर और लोकतंत्र की परीक्षा
विधानसभा में सत्ता, सवाल और सियासी संयम
यूपी विधानसभा के बजट सत्र में बहस, टकराव और भावनाओं का उफान दिखा। सवाल यह है कि शोर के बीच लोकतंत्र की आवाज़ कितनी सुनी गई।बजट सत्र का पांचवां दिन सत्ता और विपक्ष के तीखे संवाद का गवाह बना। स्पीकर की सख्ती, मुख्यमंत्री का पलटवार और विपक्ष के सवाल, सबने मिलकर लोकतांत्रिक मर्यादाओं की नई परीक्षा रख दी।
📍 Lucknow ✍️ Asif Khan
यूपी बजट सत्र में सत्ता की जवाबदेही बनाम विपक्ष का हंगामा
सदन की गरिमा और पहली दरार
विधानसभा का सदन सिर्फ इमारत नहीं होता, वह भरोसे की जगह होता है। जब वहां आवाज़ें ऊंची होती हैं, कुर्सियां छोड़ दी जाती हैं, और हेडफोन गुस्से में फेंके जाते हैं, तो सवाल उठता है कि यह गुस्सा किस बात का है। क्या यह सत्ता के आत्मविश्वास का प्रदर्शन है या व्यवस्था की थकान का संकेत। बजट सत्र का यह दिन हमें यही सोचने पर मजबूर करता है।
स्पीकर की सख्ती और उसका मतलब
स्पीकर सतीश महाना का अचानक कड़ा रुख लेना सिर्फ एक व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं था। यह उस कुर्सी की पीड़ा थी जो बार बार टोका टाकी से कमजोर की जा रही थी। सदन चलाना उनका काम है, यह कहना दरअसल यह याद दिलाना था कि लोकतंत्र नियमों से चलता है, शोर से नहीं। मगर यहां एक दूसरा पहलू भी है। जब अनुशासन सख्ती में बदल जाए, तो संवाद की जगह कम हो जाती है।
मुख्यमंत्री का जवाब और सियासी संदेश
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भाषण सत्ता का आत्मविश्वास दिखाता है। राज्यपाल के अभिभाषण पर उठे सवालों को उन्होंने सिर्फ आंकड़ों से नहीं, नैतिक आरोपों से भी जवाब दिया। विपक्ष के आचरण को परंपरा और संस्कार से जोड़ना एक बड़ा सियासी दांव है। इससे समर्थकों को संदेश जाता है कि सरकार मजबूत है, मगर आलोचकों को लगता है कि असली सवाल पीछे छूट गए।
विपक्ष के सवाल और उनकी धार
नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय के सवाल रोजगार, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था पर थे। यह वही मुद्दे हैं जो आम आदमी चाय की दुकान पर उठाता है। जब वह पूछते हैं कि यूपी में काम क्यों नहीं बढ़ा, तो यह सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, पूरी व्यवस्था से है। लेकिन जब भाषा तीखी हो जाती है, तो मुद्दा अपनी चमक खो देता है।
कानून व्यवस्था की बहस
सरकार का दावा है कि संगठित अपराध खत्म हुआ। कुछ विधायक इसकी तारीफ भी करते हैं। पर सवाल यह है कि क्या मुठभेड़ ही कानून व्यवस्था का पैमाना है। इतिहास बताता है कि डर से कुछ समय की शांति मिल सकती है, भरोसा नहीं। भरोसा तब बनता है जब पुलिस स्वतंत्र हो, जब स्थायी डीजीपी जैसे सवालों पर खुली बहस हो।
भ्रष्टाचार का पुराना भूत
लोकायुक्त, जांच रिपोर्ट और कार्रवाई न होना। यह कहानी नई नहीं है। जब विपक्ष कहता है कि रिपोर्टें धूल खा रही हैं, तो सत्ता को जवाब देना चाहिए। सिर्फ यह कहना काफी नहीं कि पहले भी ऐसा होता था। जनता आज का हिसाब मांगती है। अगर तहसील से सचिवालय तक शिकायतें एक जैसी हैं, तो समस्या गहरी है।
रोजगार और आंकड़ों का खेल
भर्तियों के आंकड़े पेश किए गए। हजारों पद, प्रतिशत और वर्गों का हिसाब। आंकड़े जरूरी हैं, पर इंसान उनसे बड़ा होता है। सवाल यह है कि क्या ये नौकरियां टिकाऊ हैं। क्या युवा को सिर्फ नियुक्ति पत्र मिला या भविष्य की सुरक्षा भी। जब कोई चेन्नई जाकर काम करता है और यूपी में अवसर की कमी की बात करता है, तो यह सिर्फ प्रवास नहीं, नीति की चुनौती है।
सामाजिक न्याय की उलझन
आरक्षण पर बहस फिर सामने आई। निषाद समाज, दलित मुद्दे और पहचान की राजनीति। यहां हर दल अपने अपने तरीके से सामाजिक न्याय का दावा करता है। मगर सच यह है कि जब तक शिक्षा और स्वास्थ्य मजबूत नहीं होंगे, आरक्षण बहस का अखाड़ा बना रहेगा। सामाजिक सम्मान कानून से नहीं, व्यवहार से आता है।
सत्ता और विपक्ष की भाषा
सदन में शायरी सुनाई गई, तालियां बजीं। यह क्षण दिखाता है कि राजनीति सिर्फ टकराव नहीं, संवाद भी हो सकती है। लेकिन ऐसे पल दुर्लभ हो गए हैं। आज भाषा अक्सर चोट करने के लिए चुनी जाती है, समझाने के लिए नहीं। यह बदलाव चिंता पैदा करता है।
जनता कहां खड़ी है
इस पूरे शोर में आम आदमी कहां है। वह सड़क, स्कूल, अस्पताल और नौकरी देख रहा है। जल जीवन मिशन से टूटी सड़कों का मुद्दा जब उठता है, तो यह विकास की जमीनी तस्वीर दिखाता है। बजट भाषण बड़े सपने दिखाते हैं, मगर रोजमर्रा की परेशानी ही सरकार की असली परीक्षा होती है।
लोकतंत्र का सब्र
लोकतंत्र शोर सह सकता है, पर लगातार नहीं। उसे सब्र चाहिए, सुनने की ताकत चाहिए। स्पीकर की नाराजगी, मुख्यमंत्री की सख्ती और विपक्ष की आक्रामकता, सब मिलकर एक सवाल छोड़ जाते हैं। क्या हम बहस से भाग रहे हैं। अगर हर सवाल को हंगामा मान लिया जाए, तो जवाबदेही कैसे बचेगी।
आखरी में एक सीधा सवाल
इस बजट सत्र ने हमें आईना दिखाया है। इसमें सत्ता का आत्मविश्वास भी है और विपक्ष की बेचैनी भी। मगर आईने में जनता का चेहरा धुंधला दिख रहा है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब सदन में आवाजें टकराने के बाद भी एक दूसरे को सुनें। शोर से ज्यादा जरूरी है सब्र, और जीत से ज्यादा जरूरी है भरोसा।




