
ईरान की 90% यूरेनियम धमकी से मिडिल ईस्ट में नया तनाव
ट्रंप के दावों पर नई रिपोर्ट, ईरान पूरी तरह कमजोर नहीं
अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद भी ईरान की सैन्य क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. नई अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स के मुताबिक होर्मुज स्ट्रेट के आसपास ईरान की कई मिसाइल साइट्स अब भी एक्टिव हैं. दूसरी तरफ ईरानी संसद से 90% यूरेनियम संवर्धन की चेतावनी ने मिडिल ईस्ट में नई जियोपॉलिटिकल बेचैनी बढ़ा दी है. इससे ट्रंप प्रशासन के पुराने दावों और क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति पर नए सवाल खड़े हो रहे हैं ।
📍 तेहरान / वॉशिंगटन
📰 13 मई 2026
✍️ Asif Khan
ट्रंप के दावों के बीच ईरान की मिसाइल ताकत पर नए सवाल
मिडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े जियोपॉलिटिकल तनाव के दौर में दाखिल होता दिख रहा है. अमेरिका और इजरायल की तरफ से पिछले महीनों में किए गए बड़े सैन्य ऑपरेशंस के बाद यह दावा किया गया था कि ईरान की मिसाइल और डिफेंस क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचा है. लेकिन अब सामने आ रही नई अमेरिकी इंटेलिजेंस असेसमेंट्स एक अलग तस्वीर पेश कर रही हैं.
रिपोर्ट्स में कहा गया है कि होर्मुज स्ट्रेट के पास ईरान की करीब 30 मिसाइल साइट्स अब भी ऑपरेशनल स्थिति में हैं. यह इलाका दुनिया की सबसे अहम ऑयल सप्लाई रूट्स में गिना जाता है. ऐसे में इन मिसाइल बेस का एक्टिव रहना सिर्फ अमेरिका या इजरायल के लिए नहीं बल्कि पूरी ग्लोबल इकॉनमी के लिए चिंता का विषय बन सकता है.
इसी बीच ईरानी संसद के प्रवक्ता इब्राहिम रेजाई का बयान और ज्यादा तनाव बढ़ाने वाला माना जा रहा है. उन्होंने संकेत दिया कि अगर ईरान पर दोबारा हमला हुआ तो देश यूरेनियम संवर्धन का स्तर 90% तक ले जा सकता है. इंटरनेशनल न्यूक्लियर डिस्कोर्स में 90% संवर्धन को हथियार स्तर के बेहद करीब माना जाता है.
होर्मुज स्ट्रेट क्यों बना दुनिया की सबसे बड़ी चिंता
होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं है. यह पूरी दुनिया की एनर्जी सिक्योरिटी का अहम केंद्र माना जाता है. खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है. अगर यहां सैन्य तनाव बढ़ता है तो उसका असर तेल कीमतों, ग्लोबल ट्रेड और शेयर बाजारों तक दिखाई दे सकता है.
ईरान लंबे समय से इस इलाके को अपनी स्ट्रैटेजिक ताकत का हिस्सा मानता रहा है. ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने बीते वर्षों में यहां मिसाइल नेटवर्क, ड्रोन यूनिट्स और समुद्री निगरानी क्षमता को लगातार मजबूत किया है. अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का भी मानना रहा है कि होर्मुज क्षेत्र में ईरान की असली ताकत उसकी असममित युद्ध रणनीति में छिपी है.
नई रिपोर्ट्स इसी बात की तरफ इशारा करती हैं कि भारी एयरस्ट्राइक और सैन्य दबाव के बावजूद ईरान ने अपनी कई अहम मिसाइल सुविधाओं को सुरक्षित रखा.
क्या ट्रंप प्रशासन ने खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर बताया था
अमेरिका में यह मुद्दा अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बनता जा रहा है. डोनाल्ड ट्रंप और उनके सहयोगियों ने पहले दावा किया था कि ईरानी सैन्य नेटवर्क को निर्णायक नुकसान पहुंचा है. लेकिन नई इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स उस नैरेटिव को चुनौती देती दिखाई दे रही हैं.
हालांकि यह भी साफ नहीं है कि सभी मिसाइल साइट्स पूरी क्षमता के साथ काम कर रही हैं या सिर्फ बेसिक ऑपरेशनल स्थिति में हैं. कई डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि “ऑपरेशनल” शब्द का मतलब अलग-अलग हो सकता है. कुछ साइट्स में सीमित मिसाइल स्टॉक हो सकता है जबकि कुछ सिर्फ लॉन्च इंफ्रास्ट्रक्चर के तौर पर मौजूद हों.
इसके बावजूद इतना स्पष्ट है कि ईरान की सैन्य संरचना पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई है. यही तथ्य अमेरिकी दावों की विश्वसनीयता पर नए सवाल पैदा कर रहा है.
ईरान की 90% यूरेनियम चेतावनी कितनी गंभीर
ईरानी संसद के प्रवक्ता इब्राहिम रेजाई का बयान ऐसे समय आया है जब पहले ही क्षेत्र में सैन्य तनाव बना हुआ है. उन्होंने कहा कि अगर देश पर फिर हमला हुआ तो ईरान यूरेनियम संवर्धन का स्तर 90% तक ले जा सकता है.
यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि 90% संवर्धन को हथियार ग्रेड क्षमता के बेहद करीब माना जाता है. हालांकि किसी देश के पास 90% संवर्धित यूरेनियम होने का मतलब यह नहीं होता कि उसके पास तुरंत परमाणु हथियार तैयार हो जाता है. हथियार निर्माण के लिए डिलीवरी सिस्टम, मिनिएचराइजेशन और अन्य तकनीकी प्रक्रियाएं भी जरूरी होती हैं.
लेकिन वेस्टर्न देशों के लिए यह संकेत काफी गंभीर माना जाता है. इससे यह आशंका बढ़ती है कि अगर कूटनीतिक बातचीत टूटती है तो क्षेत्र परमाणु तनाव के नए चरण में जा सकता है.
इजरायल की रणनीति पर भी उठ रहे सवाल
इजरायल लंबे समय से ईरान के मिसाइल और न्यूक्लियर प्रोग्राम को अपने लिए सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा मानता आया है. इसी वजह से उसने कई बार सीरिया, इराक और अन्य क्षेत्रों में ईरानी समर्थित नेटवर्क पर हमले किए.
लेकिन अगर इतनी बड़ी सैन्य कार्रवाई के बाद भी ईरान की कई मिसाइल साइट्स एक्टिव हैं तो इससे इजरायली रणनीति की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ सकते हैं.
कुछ डिफेंस विश्लेषकों का मानना है कि ईरान ने वर्षों में अपने मिसाइल नेटवर्क को पहाड़ी इलाकों, भूमिगत सुरंगों और मोबाइल लॉन्च सिस्टम्स के जरिए इस तरह विकसित किया कि उसे पूरी तरह खत्म करना बेहद मुश्किल हो गया.
यानी यह संघर्ष सिर्फ एयरस्ट्राइक का नहीं बल्कि लॉन्ग टर्म स्ट्रैटेजिक एंड्योरेंस का बन चुका है.
मिडिल ईस्ट की राजनीति किस दिशा में जा रही है
ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच यह तनाव केवल सैन्य मामला नहीं है. इसके पीछे ऊर्जा राजनीति, क्षेत्रीय प्रभुत्व और वैश्विक शक्ति संतुलन भी जुड़ा हुआ है.
चीन और रूस जैसे देश पहले ही मिडिल ईस्ट में अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में अगर ईरान पर दबाव और बढ़ता है तो वह इन देशों के साथ अपनी साझेदारी और मजबूत कर सकता है.
दूसरी तरफ खाड़ी देशों की स्थिति भी जटिल बनी हुई है. कई अरब देश ईरान के प्रभाव से चिंतित रहते हैं लेकिन वे खुला युद्ध भी नहीं चाहते क्योंकि उसका सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान उन्हीं को झेलना पड़ सकता है.
क्या फिर शुरू हो सकती है परमाणु बातचीत
डिप्लोमैटिक सर्कल में अब यह चर्चा भी तेज हो रही है कि क्या बढ़ते तनाव के बीच फिर से न्यूक्लियर डील जैसी बातचीत शुरू हो सकती है. पिछली ईरान न्यूक्लियर डील से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद दोनों पक्षों के बीच भरोसे का संकट गहरा गया था.
अब अगर ईरान 90% संवर्धन की दिशा में बढ़ता है तो पश्चिमी देशों पर नए प्रतिबंध लगाने का दबाव बढ़ सकता है. वहीं अगर अमेरिका या इजरायल फिर सैन्य कार्रवाई करते हैं तो पूरा क्षेत्र बड़े संघर्ष की तरफ जा सकता है.
कई इंटरनेशनल ऑब्जर्वर्स मानते हैं कि अभी दोनों पक्ष एक-दूसरे पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं. लेकिन लगातार बढ़ती बयानबाजी किसी भी समय नियंत्रण से बाहर जा सकती है.
तेल बाजार और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर
होर्मुज स्ट्रेट का मुद्दा सिर्फ सैन्य नहीं बल्कि आर्थिक संकट का संकेत भी बन सकता है. अगर वहां किसी तरह की रुकावट आती है तो तेल कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है.
भारत समेत कई एशियाई देश खाड़ी क्षेत्र से बड़े पैमाने पर तेल आयात करते हैं. ऐसे में मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव भारतीय बाजारों, महंगाई और ईंधन कीमतों पर भी असर डाल सकता है.
ग्लोबल इन्वेस्टर्स भी ऐसे हालात में सुरक्षित निवेश विकल्पों की तरफ बढ़ते हैं. इससे शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है.
सम्पादकीय दृष्टिकोण
नई अमेरिकी इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स ने यह साफ कर दिया है कि ईरान की सैन्य ताकत को पूरी तरह खत्म मान लेना जल्दबाजी हो सकती है. होर्मुज स्ट्रेट के पास एक्टिव मिसाइल साइट्स और 90% यूरेनियम संवर्धन की चेतावनी ने मिडिल ईस्ट को फिर वैश्विक चिंता के केंद्र में ला खड़ा किया है.
हालांकि अभी यह कहना मुश्किल है कि स्थिति खुली जंग तक पहुंचेगी या फिर कूटनीति के जरिए तनाव कम होगा. लेकिन इतना तय है कि आने वाले महीनों में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच हर बयान और हर सैन्य गतिविधि पर दुनिया की नजर बनी रहेगी.




