
Jamiat Ulama-e-Hind started a help desk in New Delhi for Umeed Portal registration.
वक्फ रजिस्ट्रेशन लाज़मी:जमीअत उलमा-ए-हिंद की अपील
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जमीअत उलमा-ए-हिंद का बड़ा बयान
जमीअत उलमा-ए-हिंद ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 के तहत वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण को लेकर नई दिल्ली में हेल्प डेस्क स्थापित की है। महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि 5 दिसंबर 2025 तक उम्मीद पोर्टल पर सभी वक्फ संपत्तियों का विवरण अपलोड करना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं लगाई है।
📍नई दिल्ली | 🗓️ 21 अक्तूबर 2025 ✍️ आसिफ़ ख़ान
जमीअत उलमा-ए-हिंद ने नई दिल्ली में वक्फ पंजीकरण हेतु हेल्प डेस्क की स्थापना की
नई दिल्ली की हवा में इस वक़्त एक नई जागरूकता की सुगंध घुली है—वक्फ संपत्तियों की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर। जमीअत उलमा-ए-हिंद ने एक ऐसा क़दम उठाया है जो न सिर्फ प्रशासनिक रूप से अहम है, बल्कि धार्मिक संस्थाओं की साख और सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
मौलाना हकीमुद्दीन कासमी का बयान स्पष्ट है—“वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की धारा 3B के तहत उम्मीद पोर्टल पर पंजीकरण अब अनिवार्य है।” यानी अब कोई भी वक्फ संपत्ति अनरजिस्टर्ड नहीं रह सकती। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने अंतरिम आदेश में इस प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं लगाई। इसका सीधा मतलब यह है कि यह काम कानूनी रूप से भी वैध और आवश्यक है।
वक्फ संपत्तियां क्यों ज़रूरी हैं?
वक्फ की ज़मीनें और संपत्तियां सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक सेवा का अहम हिस्सा होती हैं—मदरसों, मस्जिदों, दरगाहों और कब्रिस्तानों से लेकर स्कूल, अस्पताल और अनाथालय तक। लेकिन अक्सर इन संपत्तियों पर विवाद, फर्जीवाड़ा या कब्ज़े की शिकायतें सामने आती रही हैं।
इसलिए उम्मीद पोर्टल की व्यवस्था एक पारदर्शी सिस्टम के रूप में सामने आई है। अब कोई भी संपत्ति, उसकी लोकेशन, दस्तावेज़ और मुतवल्ली की जानकारी सार्वजनिक रिकॉर्ड में रहेगी। इससे जवाबदेही बढ़ेगी और भ्रष्टाचार की गुंजाइश घटेगी।
जमीअत का कदम – राहत और जिम्मेदारी दोनों
जमीअत उलमा-ए-हिंद का यह कदम सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास भी है। हेल्प डेस्क का मक़सद यह सुनिश्चित करना है कि छोटे मदरसे, मस्जिदें और दरगाहें जिनके पास तकनीकी संसाधन या मार्गदर्शन नहीं है, वे भी आसानी से उम्मीद पोर्टल पर अपनी संपत्तियों का विवरण दर्ज कर सकें।
नई दिल्ली स्थित मुख्यालय के साथ-साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी ऐसे कई हेल्प डेस्क खोले जा रहे हैं, ताकि कोई भी संस्था या मुतवल्ली पीछे न रह जाए। संपर्क के लिए नंबर भी जारी किए गए हैं — 9670672842 और 7409856082।
कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण से अहम
अगर 5 दिसंबर 2025 तक उम्मीद पोर्टल पर पंजीकरण नहीं किया गया तो ऐसी वक्फ संपत्तियों की कानूनी स्थिति प्रभावित हो सकती है। यानी उनका अधिकारिक दावा कमजोर पड़ जाएगा। यह स्थिति कई धार्मिक संस्थाओं के लिए खतरे की घंटी बन सकती है।
इसलिए जमीअत की अपील है कि सभी मुतवल्ली और संस्थाएं बिना देर किए अपने दस्तावेज़ तैयार करें और जल्द से जल्द उम्मीद पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन पूरी करें।
एक सवाल – क्या यह निगरानी का नया दौर है या सुधार का?
यहाँ एक अहम सवाल भी उठता है — क्या यह कदम सिर्फ निगरानी बढ़ाने के लिए है या वास्तव में पारदर्शिता लाने के लिए?
अगर इसे ईमानदारी से लागू किया गया, तो यह वक्फ संस्थाओं की साख बढ़ाने का ज़रिया बन सकता है। लेकिन अगर ब्यूरोक्रेटिक जाल या तकनीकी कठिनाइयों ने इसमें अड़चन डाली, तो इसका असर उल्टा भी हो सकता है।
यहाँ ज़रूरत है — सहयोग, संवेदनशीलता और समन्वय की। वक्फ बोर्ड, धार्मिक संस्थाएँ और समाज—तीनों को मिलकर यह प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
वक्फ सुधार: एक व्यापक दृष्टि
वक्फ संपत्तियों की समस्या कोई नई नहीं है। देश के कई हिस्सों में वक्फ भूमि पर अतिक्रमण, फर्जी मुतवल्ली और विवाद आम हैं। उम्मीद पोर्टल जैसी पहल एक डिजिटल निगरानी की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे न सिर्फ रिकॉर्ड सुधरेंगे, बल्कि भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा।
लेकिन सुधार सिर्फ क़ानून से नहीं, नीयत से भी आता है। अगर जमीअत जैसी संस्थाएं जमीनी स्तर पर लोगों को जागरूक करती रहें, तो यह कदम मुस्लिम समुदाय के लिए एक मिसाल बन सकता है।
नतीजा
जमीअत उलमा-ए-हिंद का यह प्रयास समय की मांग है। यह केवल सरकारी निर्देश का पालन नहीं, बल्कि एक सामाजिक सुधार की शुरुआत भी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कितनी संस्थाएं इस दिशा में सक्रिय कदम उठाती हैं और कितनी इसे औपचारिकता मानकर छोड़ देती हैं।
सच्चाई यह है — पारदर्शिता का डर उन्हीं को होता है जो जवाबदेही से भागते हैं। उम्मीद है कि वक्फ संपत्तियों की यह नई व्यवस्था ईमानदार मुतवल्लियों के लिए सहूलियत और समुदाय के लिए भरोसे का नया पुल बनेगी।




