
Allahabad High Court clarified that mutation entries do not decide land ownership, says Shah Times.
दाखिल खारिज आदेश से टाइटल तय नहीं होता: हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दाखिल खारिज प्रविष्टि का भूमि के स्वामित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। स्वामित्व का निर्धारण स्वतंत्र रूप से सिविल कोर्ट द्वारा किया जाएगा। कोर्ट ने दाखिल खारिज कार्यवाही को संक्षिप्त प्रक्रिया बताया।
📍प्रयागराज🗓️ 4 जनवरी 2026 ✍️आसिफ खान
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दाखिल खारिज की प्रविष्टि का भूमि के स्वामित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भूमि के टाइटल से संबंधित विवादों का अंतिम निर्धारण सिविल कोर्ट द्वारा स्वतंत्र रूप से किया जाएगा। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने दाखिल खारिज से जुड़े आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट की पीठ और याचिका का निस्तारण
यह निर्णय न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ द्वारा दिया गया। याचिका बस्ती जिले के निवासी गंगाराम मिश्र द्वारा दाखिल की गई थी। अदालत ने कहा कि मामले में कोई असाधारण परिस्थिति नहीं पाई गई, जिससे हाई कोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।
दाखिल खारिज प्रक्रिया की प्रकृति
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दाखिल खारिज कार्यवाही एक संक्षिप्त प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य केवल राजस्व रिकॉर्ड को अद्यतन करना होता है, न कि भूमि के स्वामित्व का अंतिम निर्धारण करना। इस प्रक्रिया में किया गया इंद्राज केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए होता है।
स्वामित्व निर्धारण का अधिकार क्षेत्र
अदालत ने स्पष्ट किया कि भूमि के स्वामित्व से संबंधित विवादों पर निर्णय लेने का अधिकार सिविल कोर्ट के पास है। सिविल कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मामले के गुण-दोष पर फैसला करेगी और वह किसी भी राजस्व प्रविष्टि से बाध्य नहीं होगी।
याचिका की पोषणीयता पर सवाल
हाई कोर्ट ने कहा कि दाखिल खारिज कार्यवाही के खिलाफ सामान्यतः रिट याचिका पोषणीय नहीं होती। केवल सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कुछ सीमित अपवादों में ही ऐसी याचिका पर विचार किया जा सकता है। वर्तमान मामले में याची का दावा उन अपवादों के अंतर्गत नहीं पाया गया।
विवादित भूमि और पृष्ठभूमि
मामला उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की भानपुर तहसील स्थित छितिरगवां गांव की कृषि भूमि से संबंधित है। रिकॉर्ड के अनुसार 25 जुलाई 2016 को याची के भाई तुलसीराम ने सुशीला देवी के पक्ष में बिक्री विलेख निष्पादित किया था।
याची के दावे और आपत्तियां
याची का कहना था कि संबंधित भूमि का विधिवत विभाजन नहीं हुआ था और उसके हिस्से से अधिक भूमि का बैनामा किया गया। याची ने यह भी दावा किया कि उसी दिन उसकी मां द्वारा उसके पक्ष में एक रजिस्टर्ड वसीयत की गई थी।
दाखिल खारिज कार्यवाही की शुरुआत
बिक्री विलेख के आधार पर राजस्व अधिकारियों के समक्ष दाखिल खारिज की कार्यवाही शुरू की गई। इस प्रक्रिया के तहत 18 अक्टूबर 2021 को सुशीला देवी के पक्ष में दाखिल खारिज की अनुमति प्रदान की गई।
रिकॉल आवेदन और आदेश
याची द्वारा दाखिल खारिज आदेश को वापस लेने के लिए रिकॉल आवेदन प्रस्तुत किया गया। इस आवेदन के साथ आपत्तियां भी दर्ज की गईं। हालांकि, 5 फरवरी 2024 को तहसीलदार ने आपत्तियों को निरस्त करते हुए दाखिल खारिज इंद्राज की पुष्टि कर दी।
अपील और उसका निस्तारण
इसके बाद याची ने यूपी रेवेन्यू कोड 2006 की धारा 35(2) के तहत अपील दाखिल की। यह अपील 18 जुलाई 2024 को संबंधित प्राधिकारी द्वारा खारिज कर दी गई।
उच्च अधिकारियों के आदेश
मामले में तहसीलदार, उपजिलाधिकारी और अतिरिक्त आयुक्त द्वारा पारित आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। याचिका में धारा 34, 35(2) और 210 के अंतर्गत पारित आदेशों को अवैध बताया गया।
सिविल कोर्ट में लंबित मुकदमा
कोर्ट के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि याची और उसकी मां द्वारा एक मूल सिविल वाद दायर किया गया है। इस वाद में भूमि के स्वामित्व के निर्धारण और बिक्री विलेख को निरस्त करने की मांग की गई है। यह मामला सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में लंबित है।
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
हाई कोर्ट ने कहा कि यदि रिट याचिका को स्वीकार किया जाता है, तो इससे सिविल कोर्ट में लंबित कार्यवाही को दरकिनार किया जा सकता है। ऐसा करना न्यायिक प्रक्रिया की पुनरावृत्ति और अनावश्यक विस्तार को बढ़ावा देगा।
दाखिल खारिज रिकॉर्ड का प्रभाव
अदालत ने दोहराया कि दाखिल खारिज रिकॉर्ड का भूमि के टाइटल पर कोई कानूनी प्रभाव नहीं पड़ता। यह रिकॉर्ड केवल राजस्व प्रशासन के उद्देश्य से तैयार किया जाता है और इससे स्वामित्व के अधिकार उत्पन्न या समाप्त नहीं होते।
वैकल्पिक उपाय की उपलब्धता
कोर्ट ने कहा कि याची के पास सिविल कोर्ट में प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है। ऐसे में हाई कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं बनती। सिविल कोर्ट मामले के सभी पहलुओं पर स्वतंत्र रूप से विचार करेगी।
कोर्ट का अंतिम आदेश
इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिविल कोर्ट मामले का निर्णय हाई कोर्ट की किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुए बिना करेगी।




