
वंदे मातरम, इतिहास और आज की सत्ता की परीक्षा
संसद में वंदे मातरम और सियासी टकराव की जड़ें
संसद के शीतकालीन सत्र में वंदे मातरम के १५० वर्ष पूरे होने पर हुई बहस सिर्फ़ इतिहास की याद नहीं थी, बल्कि यह आज की राजनीति, पहचान, विरोध और राष्ट्रभाव की असली तस्वीर भी बन गई।
वंदे मातरम एक गीत नहीं, एक यात्रा
वंदे मातरम को केवल एक गीत कह देना शायद उसके साथ बहुत बड़ी नाइंसाफी होगी। यह शब्दों का ऐसा संगम है, जिसमें दर्द भी है, उम्मीद भी है, आजादी की तड़प भी है और भविष्य का सपना भी। संसद में जब इसका नाम गूंजता है, तो वह सिर्फ़ अतीत नहीं बुलाता, बल्कि वर्तमान को भी कठघरे में खड़ा कर देता है। आज का भारत जिस आत्मविश्वास के साथ दुनिया में अपनी जगह बना रहा है, उसकी जड़ों में वह संघर्ष भी है, जिसमें वंदे मातरम जैसा नारा एक ताकत बन गया था।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हम वाकई उसी भावना के साथ इसे याद कर रहे हैं, या फिर इसे आज की सियासत के हथियार में बदल चुके हैं।
प्रधानमंत्री का संबोधन और उसका संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वंदे मातरम की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ पर बोलते हुए इसे नए भारत की ऊर्जा बताया। उन्होंने आजादी के आंदोलन, बंगाल विभाजन, स्वदेशी आंदोलन और बलिदान की कहानियों को सामने रखा। उनका बयान भावनात्मक भी था और राजनीतिक भी।
उन्होंने कहा कि यह गीत अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति के खिलाफ खड़ा हुआ था। यह बात ऐतिहासिक रूप से काफी हद तक सही भी है। लेकिन यहीं से सवाल उठता है कि क्या आज भी हम उसी एकता की भावना में खड़े हैं, या फिर हम खुद नए तरीके से बंटते जा रहे हैं।
विपक्ष की आपत्तियां और उनके तर्क
टीएमसी सांसद ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को अनौपचारिक ढंग से संबोधित किए जाने पर आपत्ति जताई। डीएमके सांसद ए राजा ने यह मुद्दा उठाया कि वंदे मातरम पर जो विभाजन दिखता है, वह किसने पैदा किया। उन्होंने इतिहास की व्याख्याओं को सामने रखते हुए कहा कि इस गीत को लेकर आपत्तियां पूरी तरह आधारहीन भी नहीं थीं।
अखिलेश यादव का व्यंग्य कि सत्ता पक्ष हर चीज़ पर कब्जा करना चाहता है, आज की राजनीति का एक बड़ा सच भी दिखाता है। हर दल चाहता है कि इतिहास उसी की किताब में छपे।
कांग्रेस का जवाब और नेहरू का संदर्भ
गौरव गोगोई ने प्रधानमंत्री के संबोधन पर पलटवार करते हुए कहा कि आज की बहस कहीं न कहीं इतिहास को अपने हिसाब से दोबारा लिखने की कोशिश है। उन्होंने नेहरू, बोस और मौलाना आज़ाद का संदर्भ देते हुए यह याद दिलाया कि विरोध और समर्थन दोनों की अपनी जटिल कहानियां हैं।
यही वह बिंदु है, जहां यह संपादकीय रुककर सवाल करता है कि क्या हम इतिहास को समझने की कोशिश कर रहे हैं या उसे केवल इस्तेमाल कर रहे हैं।
एक गीत और कई पहचानें
वंदे मातरम कभी एक समुदाय का नहीं रहा। इसे स्कूलों के बच्चे भी गाते थे, इसे किसान भी गुनगुनाते थे और इसे क्रांतिकारी फांसी के तख्ते पर चढ़ते वक्त भी कहते थे। अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे नाम यह साबित करते हैं कि यह नारा किसी एक मज़हब या विचारधारा की जागीर नहीं रहा।
फिर आज यह बहस इतनी तीखी क्यों हो गई है।
राजनीति का बदलता स्वभाव
आज की राजनीति भावनाओं को बहुत तेज़ी से भुनाती है। एक नारा, एक गीत, एक इतिहास का पन्ना और फिर उसे वोट की शक्ल दे दी जाती है। प्रधानमंत्री जब कांग्रेस पर तुष्टीकरण का आरोप लगाते हैं और विपक्ष जब सत्ता पक्ष पर इतिहास के अपहरण का आरोप लगाता है, तो आम आदमी कहीं बीच में खड़ा रह जाता है।
एक साधारण नागरिक यही सोचता है कि क्या यह बहस उसकी महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और हवाई टिकट की कीमतें कम कर देगी।
इंडिगो संकट और बहस का विरोधाभास
उसी संसद में जहां वंदे मातरम की गरिमा पर चर्चा हो रही थी, वहीं विपक्ष इंडिगो संकट और महंगी उड़ानों की बात उठा रहा था। यह विरोधाभास बहुत कुछ कहता है। एक तरफ़ हम अतीत के गौरव में खड़े होकर ताली बजा रहे हैं, दूसरी तरफ़ वर्तमान की परेशानी दरवाज़े पर खड़ी है।
राजनीति अक्सर यही करती है। वह भावनाओं की रोशनी में हकीकत की छाया को ढक देती है।
राष्ट्रवाद की नई परिभाषा
आज राष्ट्रवाद का मतलब कई लोगों के लिए सिर्फ़ नारे रह गए हैं। लेकिन असली राष्ट्रवाद शायद वह है, जहां सवाल पूछने की आज़ादी भी उतनी ही पवित्र हो जितनी जयघोष। वंदे मातरम की ताकत यह थी कि वह लोगों को जोड़ता था, डराता नहीं था।
अगर आज कोई असहमत होता है, तो उसे तुरंत शक की नज़र से देखा जाता है। यह बदलाव चिंता पैदा करता है।
इतिहास को लेकर हमारी अधूरी समझ
हम अक्सर इतिहास को ब्लैक और व्हाइट में देखते हैं। या तो कोई पूरी तरह नायक होता है या पूरी तरह खलनायक। लेकिन हकीकत हमेशा धुंधली और जटिल होती है। नेहरू, बोस, बंकिम, जिन्ना, आज़ाद सब अपने दौर की उपज थे, अपनी सीमाओं और मजबूरियों के साथ।
आज हम उन्हें आज की राजनीति की कसौटी पर कसते हैं, जो शायद उनके साथ भी और हमारे साथ भी इंसाफ़ नहीं।
धर्म, अस्मिता और डर
कुछ वर्गों में वंदे मातरम को लेकर आज भी एक झिझक है। यह झिझक डर से पैदा होती है, इतिहास से नहीं। जब राष्ट्रवाद को किसी एक धार्मिक पहचान से जोड़ दिया जाता है, तो बाकी पहचानें अपने आप सिमटने लगती हैं। यही वह जगह है, जहां लोकतंत्र सबसे ज़्यादा नाज़ुक होता है।
संसद की बहस और जनता का मन
संसद में जो बोला गया, वह टीवी की स्क्रीन से होता हुआ गलियों और चाय की दुकानों तक पहुंच जाता है। कोई इसे गर्व से देखता है, कोई बेचैनी से, कोई संशय से। एक बुज़ुर्ग यह कहता है कि हमने तो इसे आज़ादी के समय एकता का गीत माना था, यह कब विवाद बन गया, पता ही नहीं चला।
सवाल जो खत्म नहीं होते
क्या वंदे मातरम को गाने से ही देशभक्ति साबित हो जाती है। क्या सवाल पूछना देश को कमजोर करना है। क्या इतिहास की हर आलोचना अपमान है। ये सवाल आज पहले से ज़्यादा जरूरी हो गए हैं।
सत्ता, स्मृति और सियासत
सत्ता हमेशा स्मृति को चुनती है। वह वही याद रखती है, जो उसके काम आए। बाकी को वह धीरे धीरे हाशिये पर डाल देती है। वंदे मातरम की बहस इसी चयन की एक मिसाल बन गई है।
एक आम भारतीय की दृष्टि
एक आम आदमी शायद यह बहस अलग तरह से देख रहा है। वह पूछ रहा है कि क्या उसके बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलेगी। क्या उसकी उड़ान सस्ती होगी। क्या उसकी सांसें साफ़ होंगी। इन सवालों का जवाब वंदे मातरम की बहस में कहीं खो जाता है।
नए भारत की असली परीक्षा
नया भारत सिर्फ़ बड़ी इकोनॉमी और ऊंची इमारतों से नहीं बनता। वह भरोसे, संवाद और असहमति को साथ लेकर चलता है। अगर हम केवल जयघोष करेंगे और संवाद खो देंगे, तो यह नया भारत कहीं खोखला न रह जाए।
निष्कर्ष का नहीं, सोच का समय
वंदे मातरम पर संसद की बहस हमें किसी एक निष्कर्ष तक नहीं पहुंचाती, बल्कि कई सवालों के बीच खड़ा कर देती है। यही एक जीवित लोकतंत्र की पहचान है। जब तक सवाल ज़िंदा हैं, तब तक उम्मीद भी ज़िंदा है।




