
PM Modi's visit to Japan and China is a new turn in India's global strategy.
मोदी का एशियाई एजेंडा: ग्लोबल साउथ में भारत की नई भूमिका
मोदी की जापान-चीन यात्रा: ट्रंप टैरिफ़ डिप्लोमेसी को भारत का जवाब
प्रधानमंत्री मोदी की जापान और चीन यात्रा वैश्विक कूटनीति का अहम मोड़ है, जहां भारत अमेरिका की टैरिफ़ पॉलिसी का संतुलित जवाब खोज रहा है।
New Delhi,( Shah Times) । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान और चीन यात्रा 29 अगस्त से शुरू हुई। यह यात्रा ऐसे वक्त पर हो रही है जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ़ डिप्लोमेसी ने वैश्विक व्यापार और राजनीति में हलचल मचा दी है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह सवाल अहम है कि वह किस तरह इस वैश्विक दबाव में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बचा पाए। जापान और चीन जैसे पड़ोसी और प्रमुख आर्थिक साझेदारों के साथ यह यात्रा भारत की विदेश नीति का इम्तिहान भी है और अवसर भी।
जापान: आर्थिक और रणनीतिक भरोसे का स्तंभ
मोदी का पहला पड़ाव जापान है। टोक्यो में आयोजित 15वें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा के बीच मुलाकात हुई।
जापान लंबे अरसे से भारत का भरोसेमंद आर्थिक साझेदार रहा है।
जापान ने भारत में 43.2 बिलियन डॉलर का FDI निवेश किया है।
सुजुकी जैसी कंपनियां अगले दशक में 68 बिलियन डॉलर तक का निवेश करने की योजना बना रही हैं।
बुलेट ट्रेन से लेकर मेट्रो नेटवर्क और सेमीकंडक्टर तक, जापान ने भारत को तकनीकी ताक़त दी है।
मोदी ने टोक्यो में कहा – “भारत टैलेंट का पावरहाउस है और जापान टेक्नोलॉजी का। दोनों मिलकर इस सदी की तकनीकी क्रांति का नेतृत्व कर सकते हैं।”
यह संदेश साफ़ है: भारत अब अमेरिकी मार्केट पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहता। जापान के साथ सहयोग से भारत सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, एआई और न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्रों में नई छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है।
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चीन: भू-राजनीति और SCO मंच
जापान के बाद मोदी की यात्रा चीन की ओर है, जहां वे शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। SCO, रूस और चीन के नेतृत्व में बना ऐसा मंच है जो पश्चिमी ताक़तों के मुकाबले उभरते देशों को आवाज़ देता है।
भारत के लिए यह यात्रा दो मायनों में महत्वपूर्ण है:
अमेरिका को संदेश – भारत सिर्फ वॉशिंगटन की नीति का अनुयायी नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र वैश्विक खिलाड़ी है।
चीन के साथ संतुलन – सीमा विवादों के बावजूद आर्थिक और रणनीतिक डायलॉग को जीवित रखना ज़रूरी है।
चीनी नेतृत्व भी ट्रंप की टैरिफ़ डिप्लोमेसी से परेशान है। ऐसे में भारत और चीन का साझा मंच पर आना, वैश्विक व्यापार की नई धुरी का संकेत है।
ट्रंप की टैरिफ़ पॉलिसी: भारत की परीक्षा
डोनाल्ड ट्रंप ने जब से अपने टैरिफ़ हथियार का इस्तेमाल शुरू किया, तब से भारत समेत कई देश दबाव महसूस कर रहे हैं।
अमेरिका ने जापान पर भी टैरिफ़ लगाया।
भारत की स्टील और एल्यूमिनियम पर पाबंदी लगाई।
आईटी और फार्मा इंडस्ट्री पर नए टैक्स लगाए।
इस दबाव ने भारत को मजबूर किया है कि वह नए साझेदारों की तलाश करे। जापान और चीन, दोनों ही देश अमेरिका के खिलाफ वैश्विक संतुलन के लिए भारत के नैचुरल सहयोगी बन सकते हैं।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता
मोदी की यह यात्रा बताती है कि भारत अब “गुटनिरपेक्ष” से आगे बढ़कर “बहुध्रुवीय रणनीति” अपना रहा है।
जापान के साथ टेक्नोलॉजी और इंवेस्टमेंट
चीन के साथ SCO और ऊर्जा सहयोग
अमेरिका के साथ सुरक्षा और व्यापार वार्ता
यूरोप के साथ क्लाइमेट और ग्रीन एनर्जी
यह संतुलन भारत को वह ताक़त देता है जिससे वह किसी भी एक शक्ति पर निर्भर नहीं होता।
विरोधी तर्क और सवाल
हालांकि आलोचकों का कहना है कि भारत इस “मल्टी-अलाइनमेंट” पॉलिसी से खुद को और ज़्यादा उलझा सकता है।
चीन के साथ रिश्ते हमेशा सीमा विवाद और पाकिस्तान की वजह से नाज़ुक रहते हैं।
जापान के साथ गहरी साझेदारी अमेरिका को खटक सकती है।
ट्रंप जैसी शख़्सियत के दोबारा सत्ता में आने की संभावना भारत के लिए नई मुश्किलें ला सकती है।
यानी भारत को सावधानी से संतुलन साधना होगा, वरना रणनीतिक स्वायत्तता खोने का ख़तरा भी रहेगा।
नतीजा
मोदी की जापान और चीन यात्रा केवल कूटनीतिक शिष्टाचार भर नहीं है, बल्कि भारत की विदेश नीति का गहरा संदेश है। भारत यह दिखाना चाहता है कि वह वैश्विक मंच पर अपनी जगह खुद बना सकता है और अमेरिकी दबावों के बावजूद अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों की रक्षा कर सकता है।
यह यात्रा भारत को न सिर्फ एशिया में बल्कि ग्लोबल साउथ और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में भी नई भूमिका निभाने का मौका देती है। सवाल यह है कि क्या भारत इस मौके को पूरी तरह भुना पाएगा? आने वाले महीनों में इसका जवाब मिलेगा।






