
पंजाब के पूर्व डीजीपी मुहम्मद मुस्तफ़ा, बेटे आक़िल अख़्तर और परिवार से जुड़ा विवाद – साज़िश या सच्चाई?
डीजीपी मुस्तफ़ा केस: बेटे की मौत, राजनीति और साज़िश की सच्चाई की तलाश?
आक़िल अख़्तर की मौत या मुक़द्दर की साज़िश? पंजाब की सियासत में हलचल
📍चंडीगढ़ 🗓️ 22 अक्तूबर 2025✍️ आसिफ़ ख़ान
पूर्व डीजीपी मोहम्मद मुस्तफ़ा और पूर्व मंत्री रज़िया सुल्ताना के इकलौते बेटे आक़िल अख़्तर की रहस्यमयी मौत ने पंजाब की राजनीति, पुलिस तंत्र और सामाजिक विवेक को झकझोर दिया है। सवाल यह है—क्या यह साज़िश है या पारिवारिक त्रासदी की गूंज?
एक बेटे की मौत और एक पिता का इम्तिहान
मलेरकोटला हाउस में जब आक़िल अख़्तर की मौत की खबर पहुँची, तो जैसे वक्त ठहर गया।
पूर्व डीजीपी मुहम्मद मुस्तफ़ा—एक ऐसा नाम जो पंजाब पुलिस में सख़्ती और ईमानदारी दोनों के लिए जाना जाता रहा—अब खुद एक मुक़दमे में आरोपी हैं।
उनकी पत्नी, पूर्व कैबिनेट मंत्री रज़िया सुल्ताना, जो कभी राजनीति की इज्ज़त थीं, अब सवालों के घेरे में हैं।
लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह मामला महज़ एक पारिवारिक त्रासदी है या किसी सोची-समझी साज़िश का हिस्सा?
राजनीति और पुलिस के बीच उलझा सच
आक़िल अख़्तर की मौत 16 अक्तूबर को पंचकुला स्थित घर में संदिग्ध हालात में हुई।
परिवार ने इसे ड्रग ओवरडोज़ बताया।
मगर पंजाब पुलिस की एफआईआर ने कहानी को उलट दिया।
शिकायत में परिवार के कई सदस्यों—यहाँ तक कि पिता मुस्तफ़ा तक—पर हत्या और आपराधिक साज़िश के आरोप दर्ज हुए।
मुस्तफ़ा साहब का बयान आया:
“कानून का काम है जांच करना। एफआईआर का मतलब गुनाह साबित होना नहीं।”
उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे जांच का स्वागत करते हैं, लेकिन साथ ही इशारा किया कि यह सब राजनीतिक दुश्मनी का हिस्सा भी हो सकता है।
वीडियो जिसने सब कुछ बदल दिया
अगस्त 2025 में एक वीडियो सामने आया जिसमें आक़िल अख़्तर ने अपने ही परिवार पर गंभीर आरोप लगाए।
उसने कहा—
“मेरे अब्बा और मेरी बीवी के बीच नाजायज़ ताल्लुक़ात हैं… मुझे मारने की साज़िश चल रही है।”
ये शब्द आग की तरह फैले।
लोगों ने सवाल उठाया कि क्या यह वीडियो किसी दबाव में रिकॉर्ड हुआ या सच्चाई का बयान था?
यही वह मोड़ था, जहाँ एक बेटे की मौत ने पिता की इज़्ज़त को कठघरे में खड़ा कर दिया।
ड्रग्स, डिप्रेशन और समाज की खामोशी
मुस्तफ़ा ने बाद में कहा—
“मेरा बेटा 18 साल से ड्रग एडिक्ट था, उसका इलाज चलता रहा।”
ड्रग्स, जो पंजाब के युवाओं का सबसे बड़ा दुश्मन है, शायद आक़िल की ज़िंदगी को धीरे-धीरे निगल गया।
मगर समाज की खामोशी और पारिवारिक टूटन ने उसे और अंदर धकेल दिया।
यहां सवाल उठता है—क्या हम वाक़ई नशे से लड़ रहे हैं, या बस आंकड़ों से?
राजनीतिक साज़िश या न्याय की राह?
कुछ राजनीतिक हल्कों का मानना है कि मुस्तफ़ा के खिलाफ यह सब एक पॉलिटिकल स्क्रिप्ट है।
क्योंकि वे पहले भी कई बार सत्ता और सिस्टम के खिलाफ आवाज़ उठा चुके हैं।
दूसरी तरफ़, जांच एजेंसियां कहती हैं कि वीडियो, चैट्स और गवाहों के बयान इतने गंभीर हैं कि जांच ज़रूरी है।
इस सच्चाई की तलाश में दोनों पक्ष खुद को सही और दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं।
लेकिन कानून का तक़ाज़ा है कि फैसला सबूतों पर हो, सियासत पर नहीं।
सियासत की संवेदनहीनता
पंजाब की राजनीति में हाल के वर्षों में यह मामला “इमोशनल हथियार” बन गया है।
किसी के लिए यह एक परिवार की त्रासदी है, किसी के लिए राजनीतिक मौका।
सोशल मीडिया पर अफवाहें, मीम्स, और अर्ध-सत्य बयान चल रहे हैं।
यहाँ पत्रकारिता और सियासत दोनों की असल परीक्षा है—क्या वे सच्चाई की रक्षा करेंगे या भावनाओं की नीलामी?
मुस्तफ़ा का संतुलित जवाब
पूर्व डीजीपी ने अपने बयान में कहा—
“एफआईआर का दर्ज होना प्रक्रिया है, सज़ा नहीं। कुछ ही दिनों में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।”
उन्होंने अपने समर्थकों से संयम की अपील की,
और कहा कि “गंदी राजनीति और तुच्छ विचारों वाले लोग ज़्यादा देर तक नहीं टिकेंगे।”
ये बयान एक पुलिस अधिकारी की नहीं, बल्कि एक पिता के दर्द की गवाही लगते हैं—जिसने सिस्टम को भी देखा और उसका शिकार भी बना।
इज्ज़तमाई दुआ — इंसानियत की उम्मीद
25 अक्तूबर को मालेरकोटला हाउस में मरहूम आक़िल अख़्तर की मग़फिरत के लिए इज्ज़तमाई दुआ रखी गई है।
पूर्व डीजीपी मुस्तफ़ा ने कहा,
“दुआ में शामिल होकर हमारे बेटे की रूह की सुकून के लिए फ़ातिहा पढ़ें।”
यह दुआ सिर्फ़ एक रस्म नहीं—बल्कि उस समाज के लिए संदेश है जो आज भी संवेदना से ज़्यादा सनसनी में यकीन रखता है।
साज़िश या सबक़?
यह मामला सिर्फ़ एक परिवार की त्रासदी नहीं,
बल्कि हमारी सामाजिक और राजनीतिक सोच का आईना है।
कानून को अपना काम करने देना चाहिए।
राजनीतिक पार्टियों को इसे हथियार नहीं, चेतावनी के रूप में लेना चाहिए।
अगर यह साज़िश है—तो सच सामने आएगा।
अगर यह पारिवारिक त्रासदी है—तो समाज को सीख लेनी चाहिए कि नशा, मानसिक दबाव और पारिवारिक टूटन किस तरह ज़िंदगियाँ छीन लेते हैं।
सच्चाई चाहे जो हो, इस केस ने पंजाब और पूरे देश को एक सख्त सवाल दिया है—
“क्या हम सियासत के आगे इंसानियत को भूल चुके हैं?”






