गाजा में जारी संघर्ष को लेकर कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाया है। उनके लेख के बाद भारत की विदेश नीति, मानवीय दृष्टिकोण और पश्चिम एशिया में भारत की भूमिका पर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। यह विवाद केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की वैश्विक कूटनीतिक स्थिति से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
गाजा में जारी युद्ध और मानवीय संकट के बीच कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि दुनिया के कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने गाजा में जारी हालात पर चिंता जताई है, जबकि भारत सरकार की सार्वजनिक चुप्पी हैरान करने वाली प्रतीत होती है। उनके इस लेख के बाद देश में विदेश नीति, मानवीय दायित्व और रणनीतिक संतुलन को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। सोनिया गांधी के लेख को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने खुला समर्थन दिया। दोनों नेताओं का कहना है कि भारत को अपने ऐतिहासिक कूटनीतिक संतुलन और स्वतंत्र विदेश नीति की परंपरा को बनाए रखना चाहिए।
कांग्रेस का कहना है कि भारत लंबे समय तक फलस्तीन के अधिकारों का समर्थक रहा है। पार्टी के नेताओं का तर्क है कि मौजूदा समय में जब गाजा में नागरिकों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता व्यक्त की जा रही है, तब भारत को भी मानवीय आधार पर स्पष्ट और संतुलित रुख सामने रखना चाहिए। मल्लिकार्जुन खरगे ने अपने सार्वजनिक वक्तव्य में कहा कि भारत की नैतिक जिम्मेदारी केवल रणनीतिक हितों तक सीमित नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और नागरिक सुरक्षा के मुद्दे पर भारत की आवाज स्पष्ट होनी चाहिए।
केंद्र सरकार ने इस विशेष राजनीतिक टिप्पणी पर तत्काल कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि पिछले कई महीनों में भारत ने अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह दोहराया है कि वह आतंकवाद के विरुद्ध अपनी स्पष्ट नीति रखता है और साथ ही नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय सहायता तथा दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता है। भारत ने कई मौकों पर गाजा के नागरिकों के लिए मानवीय सहायता भी भेजी है। आधिकारिक स्तर पर भारत लगातार यह कहता रहा है कि स्थायी शांति का रास्ता संवाद और कूटनीतिक समाधान से होकर गुजरता है। यही कारण है कि सरकार के समर्थक विपक्ष के आरोपों को अधूरा बताते हैं। उनका कहना है कि भारत ने सार्वजनिक बयानबाजी के बजाय संतुलित डिप्लोमेसी को प्राथमिकता दी है।
पिछले एक दशक में भारत ने पश्चिम एशिया के लगभग सभी प्रमुख देशों के साथ अपने संबंध मजबूत किए हैं। इजरायल के साथ रक्षा, कृषि, तकनीक और इंटेलिजेंस सहयोग बढ़ा है। दूसरी ओर संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर और अन्य अरब देशों के साथ भी आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी तेज हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत आज ऐसी स्थिति में है जहां उसे कई परस्पर विरोधी हितों के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ता है। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, भारतीय प्रवासी समुदाय, रक्षा सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे कई कारक विदेश नीति को प्रभावित करते हैं। इसी वजह से सरकार सार्वजनिक बयानों में अक्सर संतुलित भाषा का इस्तेमाल करती है।
यह दावा राजनीतिक बहस का हिस्सा है और इस पर अलग-अलग मत मौजूद हैं। एक पक्ष का कहना है कि भारत पहले फलस्तीन के समर्थन में अधिक मुखर रहता था, जबकि अब उसकी प्राथमिकताएं बदलती दिखाई देती हैं। दूसरा पक्ष तर्क देता है कि भारत ने अपनी मूल नीति नहीं बदली है बल्कि उसने इजरायल और फलस्तीन दोनों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखने की रणनीति अपनाई है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के मतदान रिकॉर्ड और आधिकारिक वक्तव्यों को देखने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत आज भी दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता है, हालांकि उसकी भाषा पहले की तुलना में अधिक संतुलित और रणनीतिक हो गई है।
गाजा में जारी संघर्ष केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का विषय नहीं रह गया है। इसका असर वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और मानवीय सहायता अभियानों तक पहुंच चुका है। संयुक्त राष्ट्र सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं लगातार नागरिकों की सुरक्षा, युद्धविराम और राहत सहायता की आवश्यकता पर जोर देती रही हैं। दूसरी ओर इजरायल अपनी सुरक्षा चिंताओं और आतंकवादी हमलों के जवाब में सैन्य कार्रवाई को आवश्यक बताता है। इसी विरोधाभास के कारण वैश्विक स्तर पर भी मतभेद दिखाई देते हैं।
भारतीय लोकतंत्र में विदेश नीति पर राजनीतिक मतभेद कोई नई बात नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों समय-समय पर अलग-अलग प्राथमिकताओं की बात करते रहे हैं। सोनिया गांधी का लेख इस व्यापक बहस को फिर सामने लाता है कि क्या भारत को अंतरराष्ट्रीय मानवीय मुद्दों पर अधिक मुखर होना चाहिए, या फिर रणनीतिक संतुलन बनाए रखना ही राष्ट्रीय हित में है। इन दोनों दृष्टिकोणों के अपने-अपने तर्क हैं। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक नीति, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों को साथ देखकर समझना आवश्यक है।
पश्चिम एशिया में हालात निकट भविष्य में भी वैश्विक राजनीति के केंद्र में बने रहने की संभावना है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो भारत सहित अनेक देशों को अपनी कूटनीतिक सक्रियता और मानवीय सहायता प्रयासों को और मजबूत करना पड़ सकता है। भारत के सामने चुनौती यह रहेगी कि वह इजरायल के साथ रणनीतिक साझेदारी, अरब देशों के साथ आर्थिक संबंध और फलस्तीन के प्रति अपने पारंपरिक समर्थन के बीच संतुलन बनाए रखे।
सोनिया गांधी का लेख केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि भारत की विदेश नीति पर व्यापक सार्वजनिक चर्चा का आधार बन गया है। विपक्ष इसे नैतिक स्पष्टता और मानवीय दृष्टिकोण का प्रश्न बता रहा है, जबकि सरकार समर्थक इसे संतुलित डिप्लोमेसी और राष्ट्रीय हितों से जुड़ा विषय मानते हैं। तथ्य यह है कि गाजा संकट ने दुनिया के अधिकांश देशों के सामने कठिन कूटनीतिक विकल्प खड़े किए हैं। भारत भी इसी चुनौती का सामना कर रहा है। आने वाले समय में सरकार के आधिकारिक कदम और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी भूमिका यह तय करेगी कि भारत इस जटिल जियोपॉलिटिक्स में किस प्रकार अपना संतुलन बनाए रखता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।