भाजपा ने शिमला समझौते की वर्षगांठ पर कांग्रेस की तत्कालीन विदेश नीति की आलोचना करते हुए दावा किया कि 1971 युद्ध के बाद भारत के पास पाकिस्तान के साथ स्थायी समाधान निकालने का अवसर था, लेकिन उसका पर्याप्त उपयोग नहीं किया गया। यह बयान एक पुराने ऐतिहासिक फैसले पर नई राजनीतिक बहस को सामने लाता है।
📍 स्थान: नई दिल्ली
📰 दिनांक: 2 जुलाई 2026
✍️ Apurva Choudhary
शिमला समझौते पर भाजपा का कांग्रेस पर हमला, विदेश नीति को लेकर उठाए सवाल
भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1972 में हुए शिमला समझौते को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी ने इस समझौते को कांग्रेस की तत्कालीन कूटनीतिक नीति की कमजोरी बताते हुए कहा कि 1971 के युद्ध में मिली निर्णायक बढ़त का पूरा रणनीतिक लाभ नहीं उठाया गया।
भाजपा ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया मंच पर जारी बयान में कहा कि उस समय भारत के पास बड़ी संख्या में पाकिस्तानी युद्धबंदी और कब्जे वाले क्षेत्र होने के कारण बातचीत में मजबूत स्थिति थी। इसके बावजूद कश्मीर सहित महत्वपूर्ण मुद्दों पर स्थायी समाधान सुनिश्चित करने के बजाय द्विपक्षीय वार्ता का रास्ता अपनाया गया।
1971 की जीत और शिमला समझौते पर भाजपा का तर्क
भाजपा का कहना है कि 1971 के युद्ध के बाद भारत अभूतपूर्व रणनीतिक स्थिति में था। पार्टी के अनुसार, उस समय उपलब्ध परिस्थितियों का उपयोग दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों के अनुरूप किया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
पार्टी ने दावा किया कि शिमला समझौता आज भी इस सवाल के केंद्र में है कि क्या भारत ने अपने रणनीतिक लाभ के बदले पर्याप्त राजनीतिक या सुरक्षा संबंधी परिणाम हासिल किए थे।
ऐतिहासिक समझौते पर अलग-अलग दृष्टिकोण
शिमला समझौता भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का महत्वपूर्ण कूटनीतिक दस्तावेज माना जाता है। इसके समर्थकों का तर्क है कि इस समझौते ने युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच संवाद की प्रक्रिया को संस्थागत स्वरूप दिया और विवादों को द्विपक्षीय स्तर पर सुलझाने का आधार बनाया।
वहीं आलोचकों का मानना है कि उस समय भारत की मजबूत स्थिति का उपयोग कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर अधिक स्पष्ट और स्थायी समाधान के लिए किया जा सकता था। यही कारण है कि यह समझौता दशकों बाद भी राजनीतिक और रणनीतिक बहस का विषय बना हुआ है।
राजनीतिक विमर्श में फिर आया शिमला समझौता
भाजपा के ताजा बयान के बाद शिमला समझौता एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन गया है। पार्टी ने इसे कांग्रेस की विदेश नीति और कूटनीतिक निर्णयों का उदाहरण बताते हुए ऐतिहासिक फैसलों की समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया है।
हालांकि इस विषय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों और विदेश नीति विशेषज्ञों की राय भिन्न रही है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी ऐतिहासिक समझौते का मूल्यांकन उस समय की अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, सुरक्षा चुनौतियों और राजनीतिक संदर्भों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
बहस अभी भी जारी
पांच दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी शिमला समझौता भारत की विदेश नीति और भारत-पाकिस्तान संबंधों पर होने वाली चर्चाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। भाजपा के ताजा बयान ने इस ऐतिहासिक समझौते को एक बार फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है।