स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर विपक्षी राजनीति फिर एक साझा मंच पर दिखाई दी है। 23
राजनीतिक दलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को संयुक्त पत्र भेजकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि यह अभियान केवल मतदाता सूची को अधिक सटीक और विश्वसनीय बनाने के लिए चलाया जा रहा है।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। मंगलवार को 23 विपक्षी दलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को संयुक्त पत्र भेजकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर गंभीर एतराज़ दर्ज कराया। इस कदम की सबसे बड़ी राजनीतिक अहमियत यह है कि इसमें कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी और डीएमके भी शामिल हुए हैं। यह घटनाक्रम केवल एक पत्र तक सीमित नहीं है। यह विपक्ष की उस कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है जिसमें वह चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और संस्थागत जवाबदेही को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाना चाहता है।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची का व्यापक सत्यापन अभियान है। इसका उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट अथवा अयोग्य नामों को हटाना और पात्र मतदाताओं का सही पंजीकरण सुनिश्चित करना बताया गया है। आयोग का कहना है कि सटीक मतदाता सूची स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की बुनियाद है। विपक्ष का आरोप अलग है। उसका कहना है कि यदि प्रक्रिया पर्याप्त पारदर्शी नहीं रही या दस्तावेज़ी शर्तें कठिन रहीं, तो बड़ी संख्या में वैध मतदाता प्रभावित हो सकते हैं। यही चिंता अब न्यायपालिका के समक्ष रखी गई है।
राजनीतिक दृष्टि से इस पत्र की सबसे बड़ी कहानी विपक्ष की एकजुटता है। पिछले कुछ समय में कई मुद्दों पर अलग-अलग रुख अपनाने वाले दल इस मामले में एक मंच पर दिखाई दिए हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि 23 राजनीतिक दलों और एक निर्दलीय सांसद ने इस पहल का समर्थन किया है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से भी इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा से जुड़ा विषय बताया गया। राहुल गांधी, ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव और शिवसेना (यूबीटी) सहित कई प्रमुख विपक्षी नेताओं के हस्ताक्षर इस पत्र पर बताए गए हैं। हालांकि पत्र का पूरा पाठ अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।
चुनाव आयोग लगातार यह कहता रहा है कि एसआईआर का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल को लाभ या हानि पहुँचाना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को अधिक विश्वसनीय बनाना है। आयोग के अधिकारियों के अनुसार यह प्रक्रिया संवैधानिक अधिकारों और वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप संचालित की जा रही है। कई राज्यों में यह अभियान चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है।
इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू भी है। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय चुनाव आयोग के एसआईआर अधिकारों पर सुनवाई कर चुका है। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि मतदाता सूची का शुद्धिकरण संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है और चुनाव आयोग को इस संबंध में अधिकार प्राप्त हैं। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में किसी विशेष प्रक्रिया या उसके क्रियान्वयन पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। यदि किसी नए तथ्य या प्रक्रिया संबंधी शिकायत को लेकर याचिका आती है, तो न्यायालय उसका स्वतंत्र परीक्षण कर सकता है।
इस समय उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि विपक्ष के आरोप सिद्ध हो चुके हैं। विपक्ष ने न्यायिक जांच और हस्तक्षेप की मांग की है, लेकिन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष अभी नहीं निकला है। दूसरी ओर चुनाव आयोग लगातार अपने अभियान का बचाव कर रहा है और कह रहा है कि यह मतदाता सूची की विश्वसनीयता बढ़ाने की नियमित प्रक्रिया है।
इस घटनाक्रम का सबसे तत्काल असर विपक्षी राजनीति पर दिखाई देता है। कई महीनों से अलग-अलग मुद्दों पर बिखरा विपक्ष अब चुनावी संस्थाओं से जुड़े सवालों पर साझा रणनीति बनाता दिख रहा है। सत्तापक्ष इस पूरे अभियान को चुनावी सुधार के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ रहा है। यही कारण है कि एसआईआर अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक बहस बन चुका है।
अब सबकी निगाह इस बात पर रहेगी कि मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए पत्र पर कोई औपचारिक न्यायिक कार्रवाई होती है या नहीं। साथ ही चुनाव आयोग भी अपने अभियान को जारी रखे हुए है। यदि न्यायपालिका इस मामले पर सुनवाई करती है, तो आने वाले महीनों में चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सत्यापन और संस्थागत पारदर्शिता से जुड़े कई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न फिर चर्चा में आ सकते हैं। एसआईआर पर विवाद केवल मतदाता सूची का तकनीकी विवाद नहीं रह गया है। यह लोकतांत्रिक भरोसे, चुनावी पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका से जुड़ा व्यापक विमर्श बन चुका है। फिलहाल तथ्य यह बताते हैं कि विपक्ष ने अपनी चिंताएं न्यायपालिका के सामने रखी हैं, जबकि चुनाव आयोग अपनी प्रक्रिया को वैध और आवश्यक बता रहा है। अंतिम निर्णय न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से ही सामने आएगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।