भारतनेट फेज-3 परियोजना, जिसका उद्देश्य 6 लाख से अधिक गांवों तक इंटरनेट पहुंचाना है, बढ़ती लागत और सप्लाई चेन संकट के कारण मुश्किल में है। ऑप्टिकल फाइबर केबल और IP-MPLS राउटर की कीमतें लगभग दोगुनी हो गई हैं, जिससे कंपनियों ने DoT से ‘फोर्स मेज्योर’ के तहत राहत मांगी है। पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे माल की कमी ने इस परियोजना की गति धीमी कर दी है। इसका सीधा असर डिजिटल इंडिया मिशन और ग्रामीण कनेक्टिविटी पर पड़ सकता है।
डिजिटल इंडिया के सपने पर छाया संकट
भारत के डिजिटल भविष्य की सबसे अहम परियोजनाओं में से एक, भारतनेट फेज-3, इस समय एक बड़े मोड़ पर खड़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘गांव-गांव इंटरनेट’ मिशन, जो देश के दूर-दराज इलाकों को डिजिटल दुनिया से जोड़ने का सपना देखता है, अब लागत और वैश्विक संकटों के बोझ तले दबता नजर आ रहा है।
यह सिर्फ एक सरकारी प्रोजेक्ट की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस महत्वाकांक्षी विजन की परीक्षा है, जो भारत को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने के लिए तैयार किया गया था।
क्या हुआ: अचानक बढ़ी लागत और अटका प्रोजेक्ट
भारतनेट फेज-3, जिसे अगस्त 2023 में कैबिनेट से मंजूरी मिली थी, अब अपने क्रियान्वयन चरण में गंभीर बाधाओं का सामना कर रहा है।
ऑप्टिकल फाइबर केबल और IP-MPLS राउटर जैसे अहम उपकरणों की कीमतों में लगभग 100% की वृद्धि हो चुकी है। यह वृद्धि इतनी तेज और अप्रत्याशित है कि प्रोजेक्ट पर काम कर रही कंपनियों के लिए पुराने कॉन्ट्रैक्ट रेट पर काम जारी रखना लगभग असंभव हो गया है।
इस स्थिति में पॉलीकैब और स्टरलाइट टेक्नोलॉजीज जैसी कंपनियों ने सरकार से ‘फोर्स मेज्योर’ के तहत राहत की मांग की है।
क्यों बढ़ीं कीमतें: वैश्विक संकट का असर
इस संकट की जड़ें भारत के बाहर, वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों में छिपी हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने कच्चे माल की सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है। खासतौर पर हाई-प्योरिटी सिलिका प्रीफॉर्म, फाइबर रीइन्फोर्स्ड प्लास्टिक (FRP) और अरामिड यार्न जैसे जरूरी कंपोनेंट्स की उपलब्धता कम हो गई है। इन कच्चे माल की कमी ने उत्पादन लागत को तेजी से बढ़ा दिया, जिसका सीधा असर अंतिम उत्पादों यानी केबल और राउटर पर पड़ा।
क्यों महत्वपूर्ण है भारतनेट फेज-3
भारतनेट सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह डिजिटल इंडिया मिशन की रीढ़ है। इस परियोजना का उद्देश्य देश के 6 लाख से अधिक गांवों को हाई-स्पीड इंटरनेट से जोड़ना है, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेंस और डिजिटल सेवाओं तक पहुंच आसान हो सके। ग्रामीण भारत के लिए यह परियोजना आर्थिक और सामाजिक बदलाव का आधार बन सकती है।
टाइमलाइन: कैसे बढ़ा संकट
अगस्त 2023 में परियोजना को मंजूरी मिलने के बाद कंपनियों ने काम शुरू किया। 2024 और 2025 के दौरान वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन में बाधाएं बढ़ने लगीं। हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में तनाव के चलते कच्चे माल की कीमतों में अचानक उछाल आया। अब स्थिति यह है कि कंपनियां प्रोजेक्ट को पुराने रेट पर पूरा करने में असमर्थ हैं।
कंपनियों की चिंता और ‘फोर्स मेज्योर’
कंपनियों का कहना है कि मौजूदा हालात ‘फोर्स मेज्योर’ के दायरे में आते हैं। यह एक ऐसी कानूनी शर्त है, जो असाधारण परिस्थितियों में कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों को बदलने या समय सीमा बढ़ाने की अनुमति देती है। अगर सरकार राहत नहीं देती है, तो प्रोजेक्ट में देरी या रुकावट आ सकती है।
जनता पर असर: गांवों की डिजिटल दूरी
इस संकट का सबसे बड़ा असर ग्रामीण भारत पर पड़ सकता है। अगर भारतनेट फेज-3 में देरी होती है, तो लाखों गांवों तक इंटरनेट पहुंचने में और समय लगेगा। इससे डिजिटल डिवाइड यानी डिजिटल असमानता और बढ़ सकती है।
राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव
यह मुद्दा अब राजनीतिक बहस का विषय भी बन सकता है। सरकार के सामने चुनौती है कि वह परियोजना को समय पर पूरा करे और साथ ही कंपनियों की आर्थिक चिंताओं का भी समाधान निकाले। नीतिगत स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए फ्लेक्सिबल कॉन्ट्रैक्ट मॉडल होना चाहिए।
क्या सिस्टम पूरी तरह विफल है?
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समस्या अस्थायी है और वैश्विक हालात सुधरने पर कीमतें स्थिर हो सकती हैं। वहीं, अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक संकेत है कि भारत को अपने कच्चे माल के स्रोतों को विविध बनाना चाहिए।
ग्राउंड रियलिटी: जमीनी स्तर पर चुनौतियां
ग्राउंड स्तर पर कंपनियों को न सिर्फ महंगे कच्चे माल का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि लॉजिस्टिक्स और डिलीवरी में भी देरी हो रही है। इसके कारण प्रोजेक्ट की समय सीमा प्रभावित हो रही है।
संभावित परिणाम
अगर स्थिति नहीं सुधरी, तो भारतनेट फेज-3 में देरी हो सकती है। इससे डिजिटल इंडिया मिशन की गति धीमी पड़ सकती है।
साथ ही, कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान भी हो सकता है।
भविष्य की राह
सरकार और कंपनियों के बीच बातचीत इस संकट का समाधान निकाल सकती है। संभव है कि कॉन्ट्रैक्ट में संशोधन या अतिरिक्त फंडिंग के जरिए परियोजना को बचाया जाए। साथ ही, भारत को अपने कच्चे माल के उत्पादन को बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा। भारतनेट फेज-3 का संकट सिर्फ एक परियोजना की समस्या नहीं है, बल्कि यह भारत के डिजिटल भविष्य की परीक्षा है। अगर इस चुनौती का समाधान समय रहते नहीं किया गया, तो इसका असर देश के करोड़ों लोगों पर पड़ सकता है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार और उद्योग इस संकट से कैसे निपटते हैं और डिजिटल इंडिया के सपने को कैसे बचाते हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।