भारत में इस साल मानसून की शुरुआत उम्मीदों के विपरीत धीमी और असमान रही है। जून के पहले आधे हिस्से में देशभर में बारिश का आंकड़ा सामान्य से काफी नीचे रहा, जिससे गर्मी और उमस ने लोगों को बेहाल कर दिया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार 4 जून से 18 जून के बीच देश में औसतन 72.2 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन केवल 42.6 मिमी बारिश ही दर्ज की गई। यह 41% की बड़ी कमी को दर्शाता है, जो कृषि, जल संसाधन और दैनिक जीवन पर गहरा असर डाल सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार दक्षिण महाराष्ट्र में मानसून की प्रगति रुकने से पूरे देश में बारिश के पैटर्न पर असर पड़ा है। आमतौर पर जून के पहले सप्ताह में महाराष्ट्र में मानसून तेजी से आगे बढ़ता है, लेकिन इस बार अनुकूल हवाओं और समुद्री परिस्थितियों की कमी के कारण इसकी गति धीमी रही। IMD ने स्पष्ट किया है कि "बड़े पैमाने पर अनुकूल मौसमी परिस्थितियों की कमी" इस ठहराव का मुख्य कारण है।
IMD के क्षेत्रीय आंकड़ों के अनुसार भारत के विभिन्न हिस्सों में बारिश की कमी अलग-अलग स्तर पर देखी गई है। मध्य भारत में सबसे ज्यादा 67% की गिरावट दर्ज हुई है, जो चिंता का विषय है क्योंकि यह क्षेत्र कृषि के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 42% की कमी, दक्षिणी प्रायद्वीप में 22% और उत्तर-पश्चिम भारत में 6% की कमी दर्ज की गई है। इन आंकड़ों से साफ है कि मानसून का प्रभाव पूरे देश में समान नहीं है।
तेलंगाना और आसपास के राज्यों में मानसून की धीमी प्रगति के कारण हीटवेव जैसे हालात फिर से बन गए हैं। हैदराबाद समेत कई क्षेत्रों में तापमान सामान्य से अधिक बना हुआ है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि बादलों की कमी और मानसून के धीमे फैलाव ने गर्मी को बढ़ावा दिया है। आमतौर पर मानसून के आने के बाद तापमान में गिरावट आती है, लेकिन इस साल यह पैटर्न टूटता नजर आ रहा है।
वैश्विक मौसम विशेषज्ञों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि 2026 में ‘सुपर अल नीनो’ की स्थिति बन सकती है। अल नीनो एक ऐसी जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर के तापमान में वृद्धि के कारण होती है और इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। भारत में यह आमतौर पर कमजोर मानसून और कम बारिश का कारण बनता है। यदि यह स्थिति मजबूत होती है, तो आने वाले महीनों में बारिश की कमी और बढ़ सकती है।
भारत में मानसून की अनियमितता कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस साल की शुरुआत विशेष रूप से कमजोर रही है। पिछले वर्षों में भी जून में बारिश की कमी देखी गई है, लेकिन बाद के महीनों में स्थिति सुधर जाती थी। हालांकि, इस बार वैश्विक जलवायु संकेतों को देखते हुए विशेषज्ञ ज्यादा सतर्क हैं।
बारिश की कमी का सबसे बड़ा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ता है। खरीफ फसलों की बुवाई मानसून पर निर्भर करती है, और यदि बारिश समय पर नहीं होती तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किसान मानसून की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
केवल ग्रामीण ही नहीं, शहरी क्षेत्रों में भी इसका असर देखने को मिल रहा है। जलाशयों का स्तर गिर सकता है, जिससे पानी की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। साथ ही, बिजली की मांग बढ़ने से ऊर्जा संकट भी पैदा हो सकता है।
सरकार और संबंधित एजेंसियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। IMD नियमित अपडेट जारी कर रहा है और राज्यों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है। यदि बारिश की कमी जारी रहती है, तो जल प्रबंधन और आपूर्ति के लिए विशेष कदम उठाने पड़ सकते हैं।
सोशल मीडिया और जनमानस में मानसून को लेकर चिंता बढ़ रही है। लोग गर्मी और पानी की कमी को लेकर परेशान हैं। किसान संगठनों ने भी सरकार से सहायता और स्पष्ट दिशा-निर्देश की मांग की है।
मौसम विभाग का कहना है कि आने वाले दिनों में कुछ क्षेत्रों में बारिश बढ़ सकती है, खासकर पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों में। हालांकि, पूरे देश में संतुलित बारिश होने में अभी समय लग सकता है। मानसून की प्रगति अगले दो हफ्तों में स्थिति को स्पष्ट करेगी।
भारत के लिए मानसून केवल मौसम नहीं, बल्कि जीवनरेखा है। इस साल इसकी धीमी और असमान शुरुआत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जल्द सुधार नहीं हुआ, तो इसका असर कृषि, अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन पर व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है। आने वाले हफ्ते इस बात का फैसला करेंगे कि 2026 का मानसून सामान्य रहेगा या चुनौतीपूर्ण।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।