लखनऊ विवेक तिवारी हत्याकांड में सिपाही प्रशांत चौधरी को 10 साल की जेल
Wasi Siddiqui
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2026-09-21 16:43:56
📍 लखनऊ
🗓️ 21 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui
8 साल पुराने मामले में आया फैसला
लखनऊ के चर्चित विवेक तिवारी हत्याकांड में अदालत ने पूर्व सिपाही प्रशांत चौधरी को 10 साल की जेल की सजा सुनाई है। मामला 2018 में पुलिस की गोली से एप्पल के कर्मचारी विवेक तिवारी की मौत से जुड़ा है। इससे पहले अदालत ने प्रशांत चौधरी को गैर-इरादतन हत्या के अपराध का दोषी ठहराया था।
जिला एवं सत्र न्यायालय ने मामले में सह-आरोपी सिपाही संदीप कुमार को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया था। अदालत का यह फैसला लगभग 8 साल चली कानूनी कार्रवाई के बाद सामने आया है।
2018 में क्या हुआ था
यह घटना 30 सितंबर 2018 की रात लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार इलाके में हुई थी। विवेक तिवारी अपनी सहकर्मी सना सिद्दीकी के साथ एसयूवी से घर लौट रहे थे।
अभियोजन के मुताबिक, मकदूमपुर पुलिस चौकी के पास गश्त कर रहे सिपाही प्रशांत चौधरी और संदीप कुमार ने वाहन को रुकने का इशारा किया। वाहन के तत्काल नहीं रुकने के बाद दोनों पुलिसकर्मियों ने उसका पीछा किया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, इसी दौरान प्रशांत चौधरी ने गोली चलाई। गोली विवेक तिवारी को लगी और वाहन डिवाइडर से टकरा गया। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया।
अदालत ने हत्या की धारा में दोषी नहीं माना
मामले की शुरुआत हत्या के आरोप से हुई थी। प्रशांत चौधरी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत कार्रवाई हुई थी।
हालांकि अदालत ने उन्हें धारा 304 भाग 2 के तहत दोषी माना। यह प्रावधान गैर-इरादतन हत्या से संबंधित है, जिसमें मृत्यु कारित करने वाले कृत्य में मौत की आशंका की जानकारी होने की स्थिति शामिल होती है, लेकिन हत्या के लिए आवश्यक इरादा स्थापित नहीं होता।
धारा 304 भाग 2 के तहत अधिकतम 10 साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान था। अदालत ने प्रशांत चौधरी को 10 साल की सजा दी।
सह-आरोपी संदीप कुमार को राहत
मामले में दूसरे सिपाही संदीप कुमार को अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। अदालत के मुताबिक अभियोजन उनके खिलाफ आपराधिक जिम्मेदारी साबित करने में सफल नहीं रहा।
इससे मामले में दोनों पुलिसकर्मियों की कानूनी स्थिति अलग हो गई। प्रशांत चौधरी को दोषी ठहराकर सजा दी गई, जबकि संदीप कुमार को बरी कर दिया गया।
मामले की जांच और गवाही
घटना के बाद मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल गठित किया गया था। जांच के दौरान पुलिस ने गोली चलने की परिस्थितियों और घटनास्थल की स्थिति की पड़ताल की।
अभियोजन ने अदालत में कुल 8 प्रमुख गवाहों को पेश किया। इनमें विवेक तिवारी की सहकर्मी सना सिद्दीकी, उनकी पत्नी कल्पना तिवारी, पुलिसकर्मी, चिकित्सक, तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट और जांच अधिकारी शामिल थे।
सना सिद्दीकी घटना के समय वाहन में मौजूद थीं और अभियोजन की अहम गवाह रहीं। उन्होंने 2019 में अदालत में अपना बयान दर्ज कराया था। विवेक तिवारी की पत्नी कल्पना तिवारी ने भी उसी वर्ष गवाही दी थी।
जांच अधिकारी एसीपी विवेक पांडेय की गवाही 2024 में दर्ज की गई। मुकदमे में अंतिम दलीलों के बाद अदालत ने सितंबर 2026 में फैसला सुनाया।
प्रशांत चौधरी का पक्ष क्या था
प्रशांत चौधरी की ओर से गोली चलाने को आत्मरक्षा से जोड़कर सफाई दी गई थी। हालांकि जांच एजेंसी की चार्जशीट में इस दलील को स्वीकार नहीं किया गया और उनके खिलाफ हत्या का मामला चलाया गया।
अदालत के अंतिम निष्कर्ष में उन्हें हत्या की धारा के बजाय गैर-इरादतन हत्या के तहत दोषी ठहराया गया। यही कानूनी अंतर इस फैसले का अहम पहलू है।
परिवार ने फैसले पर जताई असहमति
फैसले के बाद विवेक तिवारी की पत्नी कल्पना तिवारी ने असंतोष जताया। उनके वकील के मुताबिक परिवार अदालत के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देने के विकल्प पर आगे कार्रवाई करेगा।
परिवार की आपत्ति मुख्य रूप से अपराध की कानूनी श्रेणी और अदालत से मिली सजा को लेकर है। दूसरी ओर अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर प्रशांत चौधरी को धारा 304 भाग 2 के तहत दोषी माना है।
पुलिस कार्रवाई और जवाबदेही पर उठा था सवाल
विवेक तिवारी की मौत के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली और गश्त के दौरान बल प्रयोग को लेकर व्यापक बहस हुई थी। मामला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि आरोपी पुलिसकर्मी उस समय ड्यूटी पर थे।
घटना के बाद दोनों सिपाहियों को गिरफ्तार किया गया था। मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया लंबे समय तक चली। करीब 8 साल बाद आया यह फैसला अब पुलिस बल के भीतर जवाबदेही और हथियारों के इस्तेमाल से जुड़े सवालों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
8 साल की कानूनी प्रक्रिया
मामले में गवाहों के बयान 2019 से शुरू हुए। चिकित्सकीय और पोस्टमार्टम साक्ष्यों की भी अदालत में जांच हुई। जांच अधिकारी की गवाही 2024 तक चली।
इसके बाद अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलों का दौर पूरा हुआ और अदालत ने सितंबर 2026 में अपना फैसला सुनाया।
आगे क्या होगा
प्रशांत चौधरी को 10 साल की सजा मिलने के बाद मामले की अगली कानूनी दिशा अपील पर निर्भर करेगी। विवेक तिवारी का परिवार पहले ही फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाने की बात कह चुका है।
इस मामले में अब मुख्य कानूनी सवाल अदालत के फैसले के खिलाफ संभावित अपील और उसके बाद होने वाली न्यायिक समीक्षा से जुड़ा है। सह-आरोपी संदीप कुमार की बरी होने की स्थिति भी अभियोजन के लिए आगे की कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा रहेगी।
विवेक तिवारी हत्याकांड का फैसला करीब 8 साल लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद आया है। अदालत ने प्रशांत चौधरी को हत्या के बजाय गैर-इरादतन हत्या का दोषी माना और 10 साल की जेल की सजा सुनाई। परिवार के हाईकोर्ट जाने के संकेत के साथ इस मामले की कानूनी लड़ाई अभी आगे बढ़ सकती है।
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Wasi Siddiqui
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।