मुजफ्फरनगर में 155 दिनों के दौरान दस मामलों में 23 दोषियों को मृत्युदंड सुनाने वाले जज रवि कुमार दिवाकर ने कथित दबाव और धमकियों के बीच न्यायिक स्वतंत्रता पर जोर दिया।
लोकेशन
मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश
डेट
08 सितंबर 2026
बाय
Wasi Siddiqui
मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 इन दिनों अपने लगातार आए कठोर फैसलों को लेकर चर्चा में है। अदालत के पीठासीन अधिकारी रवि कुमार दिवाकर ने छह अप्रैल से सात सितंबर 2026 के बीच 155 दिनों में दस मामलों में 23 दोषियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, यह मुजफ्फरनगर न्यायालय के करीब सात दशक के इतिहास में एक उल्लेखनीय आंकड़ा है।
इन फैसलों के साथ न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की एक टिप्पणी भी सार्वजनिक चर्चा का केंद्र बनी है। उन्होंने अपने एक फैसले में कथित तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माफिया और गैंगस्टरों की ओर से दबाव तथा अदालत बदलवाने या तबादला कराने की धमकी मिलने का उल्लेख किया। न्यायाधीश ने कहा कि वह डर के कारण अपने कर्तव्य से पीछे हटने के बजाय मौत स्वीकार करना पसंद करेंगे, लेकिन डरपोक जज कहलाना नहीं।
155 दिन में दस मामले, 23 मृत्युदंड
रिपोर्टों के अनुसार, छह अप्रैल से सात सितंबर तक फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 में दस चर्चित मामलों में 23 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया गया। इससे पहले छह अप्रैल से 13 अगस्त के बीच नौ मामलों में 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद शाहपुर के शहजादी हत्याकांड में नदीम को मृत्युदंड सुनाए जाने के साथ संख्या 23 हो गई।
मुजफ्फरनगर में न्यायालय की स्थापना का इतिहास भी पुराना है। जिले में 12 अप्रैल 1956 को मेरठ से विभाजन के बाद अस्थायी न्यायालय की शुरुआत हुई थी। इसके बाद 14 जुलाई 1958 से स्थायी तौर पर न्यायिक कार्य शुरू हुआ। इसी पृष्ठभूमि में मौजूदा आंकड़े को स्थानीय न्यायिक इतिहास में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जज ने कथित धमकियों का किया जिक्र
रवि कुमार दिवाकर ने शाहपुर के शहजादी हत्याकांड में दिए फैसले के दौरान न्यायिक स्वतंत्रता और सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल उठाए। प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने फैसले में लिखा कि उन्हें संदेश भिजवाया गया था कि अगर वह कुछ लोगों के पीछे पड़े या उनके खिलाफ टिप्पणी करते रहे तो प्रभाव का इस्तेमाल करके उनका न्यायालय बदलवाया जा सकता है या उन्हें जिले से बाहर स्थानांतरित कराया जा सकता है।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट के उपलब्ध स्रोतों से नहीं होती। इसलिए इन्हें न्यायाधीश द्वारा फैसले में दर्ज कथन के रूप में देखना जरूरी है, स्थापित तथ्य के रूप में नहीं। यह अंतर न्यायिक और आपराधिक मामलों की रिपोर्टिंग में खास महत्व रखता है।
‘डरपोक जज कहलाने से बेहतर मौत’
न्यायाधीश ने अपने फैसले में अपने पारिवारिक संस्कारों का भी जिक्र किया। प्रकाशित विवरण के अनुसार, उन्होंने कहा कि उनके माता-पिता ने उन्हें भगवान के अलावा किसी अन्य से नहीं डरने की शिक्षा दी है। उन्होंने यह भी कहा कि वह डरपोक कहलाने के बजाय मरना पसंद करेंगे।
यह टिप्पणी उस वक्त सामने आई जब अदालत ने शाहपुर की शहजादी की हत्या के मामले में उसके शौहर नदीम को मृत्युदंड सुनाया। अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और मृत्युपूर्व बयान को महत्वपूर्ण माना।
शहजादी हत्याकांड में क्या हुआ
प्रकाशित अदालत संबंधी विवरणों के मुताबिक, शाहपुर कस्बे की 23 वर्षीय शहजादी को जुलाई 2018 में गंभीर रूप से जला दिया गया था। आरोप था कि घरेलू विवाद के दौरान उसके शौहर नदीम ने उस पर केरोसिन डालकर आग लगा दी। बाद में उसकी मौत हो गई।
मामले में मृतका के पिता समेत कुछ गवाहों के पक्षद्रोही हो जाने के बावजूद मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज मृत्युपूर्व बयान को अदालत ने महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। इसी आधार पर नदीम को हत्या का दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड सुनाया गया।
रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने दहेज हत्या का आरोप अलग आधार पर सिद्ध नहीं माना, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जानबूझकर हत्या का अपराध सिद्ध माना। यह अंतर मामले के कानूनी विश्लेषण में महत्वपूर्ण है।
कई चर्चित हत्याकांडों में सख्त सजा
इस अवधि में अदालत ने कई गंभीर हत्या के मामलों में मृत्युदंड सुनाया। छह अप्रैल को अधिवक्ता समीर सैफी हत्याकांड में तीन दोषियों को मृत्युदंड दिया गया। मामला वर्ष 2019 में कथित तौर पर चालीस लाख रुपये के लेन-देन के विवाद से जुड़ा था। एक अन्य दोषी को सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई।
28 अप्रैल को शेखर हत्याकांड में चार दोषियों को मृत्युदंड सुनाया गया। मामला वर्ष 2019 में हुए हत्या प्रकरण से संबंधित था।
30 मई को राजेश देवी और उनके छह वर्षीय बेटे हिमांशु की हत्या से जुड़े मामले में दोषी रईस को मृत्युदंड दिया गया। दोनों के शव वर्ष 2011 में चरथावल क्षेत्र में मिले थे।
20 जून को राजेंद्र सैनी हत्याकांड में रामकरण उर्फ सावन गिरी और गीलू को मृत्युदंड सुनाया गया। मामला हत्या के बाद शव जलाने से जुड़ा था।
दो जुलाई को गश्त के दौरान होमगार्ड रतिराम की हत्या के मामले में दोषी दीपक को मृत्युदंड दिया गया। छह जुलाई को प्रधान पद की रंजिश में राजबीर सिंह की हत्या के मामले में पूर्व प्रधान प्रमोद कुमार और सहदेव उर्फ पप्पू को मृत्युदंड सुनाया गया।
मृत्युदंड के फैसले का कानूनी अर्थ
मृत्युदंड सुनाया जाना और सजा का अंतिम रूप से लागू होना दो अलग चरण हैं। निचली अदालत का फैसला न्यायिक प्रक्रिया का अंतिम पड़ाव नहीं होता। ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा और उपलब्ध कानूनी अपील की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है।
इसलिए 23 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने की खबर को 23 लोगों को फांसी दिए जाने के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। मौजूदा जानकारी के अनुसार बात अदालत द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा की है।
न्यायिक स्वतंत्रता पर बहस
इस पूरे घटनाक्रम का एक अहम पहलू न्यायिक स्वतंत्रता है। यदि किसी न्यायाधीश को प्रभावशाली अपराधियों या संगठित आपराधिक समूहों से धमकी मिलने का दावा सामने आता है, तो मामला केवल एक अदालत या एक मुकदमे तक सीमित नहीं रहता। यह न्यायपालिका की सुरक्षा, स्वतंत्र निर्णय और आम नागरिक के अदालत पर भरोसे से जुड़ जाता है।
हालांकि, धमकी संबंधी दावे की पुष्टि के लिए आधिकारिक सुरक्षा रिकॉर्ड, जांच या सक्षम प्राधिकारी की पुष्टि महत्वपूर्ण होगी। इसलिए रिपोर्टिंग में न्यायाधीश के कथन और स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य के बीच स्पष्ट फर्क बनाए रखना जरूरी है।
फास्ट ट्रैक अदालत की भूमिका
फास्ट ट्रैक अदालतों का मकसद गंभीर मामलों की सुनवाई में अनावश्यक देरी कम करना है। मुजफ्फरनगर में सामने आए इन फैसलों ने तेज सुनवाई और कठोर दंड के बीच संतुलन को लेकर भी चर्चा बढ़ाई है।
तेजी से फैसला देना अपने आप में न्याय की पर्याप्त कसौटी नहीं है। निष्पक्ष सुनवाई, अभियोजन और बचाव पक्ष को पर्याप्त अवसर, साक्ष्यों की विश्वसनीयता और उच्च न्यायिक समीक्षा भी उतनी ही अहम हैं।
मृत्युदंड जैसे मामलों में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, क्योंकि इसके परिणाम अपरिवर्तनीय होते हैं।
जनहित में असली सवाल
23 मृत्युदंड के आंकड़े से आगे सबसे अहम सवाल यह है कि इन मामलों में अदालतों के फैसले किस साक्ष्य, गवाही और कानूनी आधार पर टिके हैं। प्रत्येक मामले का तथ्यात्मक आधार अलग है और सभी मामलों को एक ही पैमाने पर देखना उचित नहीं होगा।
शहजादी मामले में गवाहों के पक्षद्रोही होने के बावजूद मृत्युपूर्व बयान को महत्व दिया गया। यह मुद्दा बताता है कि आपराधिक मुकदमों में साक्ष्य की प्रकृति और उसकी न्यायिक स्वीकार्यता कितनी अहम होती है।
आगे क्या होगा
इन मृत्युदंड के मामलों में आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर नजर रखना जरूरी होगा। दोषियों को उपलब्ध कानूनी उपायों के तहत उच्च न्यायालय में अपील का अधिकार रहता है। इसलिए प्रत्येक मामले की अंतिम स्थिति संबंधित न्यायिक आदेशों और आगे की कार्यवाही से तय होगी।
इसी तरह न्यायाधीश द्वारा कथित धमकियों का मामला भी संस्थागत स्तर पर जांच और सुरक्षा समीक्षा की मांग करता है, यदि संबंधित प्राधिकारी इसे आवश्यक मानते हैं।
मुजफ्फरनगर में 155 दिनों में 23 मृत्युदंड के आंकड़े ने न्यायिक व्यवस्था, अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई और न्यायाधीशों की सुरक्षा पर बहस को तेज किया है। लेकिन इस बहस का केंद्र केवल सजा की संख्या नहीं होना चाहिए। असली कसौटी निष्पक्ष सुनवाई, प्रमाण आधारित फैसला, न्यायिक स्वतंत्रता और कानून के तहत अंतिम न्यायिक समीक्षा है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।