संभल शाही जामा मस्जिद सर्वे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टल गई है। अब मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर को होगी। विवाद में सर्वे आदेश और मुकदमे की पोषणीयता अहम मुद्दे हैं।
📍 संभल, उत्तर प्रदेश
🗓️ 1 सितंबर 2026
✍️ Mohd Naved
संभल की शाही जामा मस्जिद से जुड़े सर्वे विवाद में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टल गई है। अब मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर को होगी। इस मुकदमे में अदालत के आदेश पर मस्जिद के सर्वे और मूल वाद की पोषणीयता को लेकर कानूनी सवाल उठाए गए हैं।
यह मामला संवेदनशील धार्मिक स्थलों से जुड़े उन विवादों में शामिल है, जिनमें न्यायिक प्रक्रिया, धार्मिक दावों और कानून-व्यवस्था से जुड़े सवाल एक साथ सामने आए हैं।
सर्वे आदेश को लेकर विवाद
विवाद की शुरुआत नवंबर 2024 में हुई, जब हिंदू पक्ष की ओर से संभल की अदालत में एक वाद दाखिल किया गया। वाद में दावा किया गया कि वर्तमान शाही जामा मस्जिद का स्थल पहले एक हिंदू मंदिर से जुड़ा था। मुस्लिम पक्ष ने इस दावे और मुकदमे की पोषणीयता को चुनौती दी है।
स्थानीय अदालत ने मामले में एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त कर सर्वे का आदेश दिया था। इसके बाद मस्जिद प्रबंधन ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया। हाई कोर्ट ने 19 मई 2025 को निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा और सर्वे से जुड़े आदेश के खिलाफ दायर चुनौती को स्वीकार नहीं किया।
इसके बाद मस्जिद प्रबंधन समिति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट में मुख्य सवाल यह है कि निचली अदालत की ओर से सर्वे का आदेश किस कानूनी आधार पर दिया गया और क्या मूल वाद को आगे बढ़ाने की अनुमति कानून के अनुरूप है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या मामला लंबित है
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष शाही जामा मस्जिद प्रबंधन समिति की ओर से इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिका में सर्वे के लिए एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति और उससे जुड़े निचली अदालत के आदेश पर सवाल उठाए गए हैं।
मुस्लिम पक्ष की दलीलों में पूजा स्थल अधिनियम, 1991 का मुद्दा भी प्रमुख है। मस्जिद प्रबंधन की ओर से तर्क दिया गया है कि धार्मिक स्थल की स्थिति को लेकर इस तरह की कार्यवाही कानून की पाबंदियों के दायरे में देखी जानी चाहिए। जुलाई 2026 की सुनवाई में भी इसी कानूनी पहलू पर बहस सामने आई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी मामले में यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। सितंबर 2025 में अदालत ने यथास्थिति की व्यवस्था को आगे बढ़ाया था और रजिस्ट्री से यह जांच करने को कहा था कि मस्जिद प्रबंधन की ओर से अलग-अलग अपीलें किस अधिकार के तहत दाखिल की गईं।
सर्वे के बाद बढ़ा था तनाव
शाही जामा मस्जिद के सर्वे को लेकर नवंबर 2024 में संभल में गंभीर तनाव पैदा हुआ था। 24 नवंबर 2024 को दूसरे सर्वे के दौरान हिंसा हुई। सरकारी और न्यायिक रिकॉर्ड में इस घटना में चार लोगों की मौत और पुलिसकर्मियों के घायल होने की जानकारी दर्ज है।
घटना के बाद मामला केवल स्थानीय अदालत की कार्यवाही तक सीमित नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों ने भी इस विवाद को व्यापक संवैधानिक और न्यायिक संदर्भ दे दिया।
अगस्त 2026 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में संभल हिंसा की जांच करने वाले न्यायिक आयोग की रिपोर्ट भी पेश की गई। आयोग ने हिंसा को पूर्व नियोजित साजिश बताया। हालांकि आयोग के निष्कर्ष जांच रिपोर्ट का हिस्सा हैं और उन्हें विवाद से जुड़े सभी न्यायिक सवालों का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
मूल विवाद क्या है
मामले का केंद्रीय विवाद शाही जामा मस्जिद के धार्मिक चरित्र और उसके ऐतिहासिक स्वरूप से जुड़ा है। हिंदू पक्ष का दावा है कि मस्जिद का निर्माण एक पुराने मंदिर स्थल पर हुआ। मुस्लिम पक्ष इस दावे को स्वीकार नहीं करता और मुकदमे की कानूनी पोषणीयता पर सवाल उठाता है।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट के सामने केवल सर्वे की प्रक्रिया का सवाल नहीं है। अदालत के सामने यह भी महत्वपूर्ण है कि ऐसे दावों पर निचली अदालत किस सीमा तक आगे बढ़ सकती है और 1991 के पूजा स्थल अधिनियम की प्रासंगिकता किस तरह लागू होती है।
यही वजह है कि इस मामले की हर सुनवाई का असर केवल संभल तक सीमित नहीं माना जाता। धार्मिक स्थलों से जुड़े दूसरे मुकदमों में भी अदालत के रुख और कानूनी व्याख्या को महत्वपूर्ण संदर्भ के तौर पर देखा जाता है।
निचली अदालत की कार्यवाही पर असर
सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित रहने के कारण संभल की चंदौसी अदालत में चल रही कार्यवाही प्रभावित हुई है। अगस्त 2026 में चंदौसी अदालत में प्रस्तावित सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की रोक के कारण आगे नहीं बढ़ सकी और अगली तारीख 29 सितंबर तय की गई थी।
इसका मतलब यह है कि स्थानीय अदालत में विवाद की अगली कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से सीधे प्रभावित होगी। इसलिए 8 सितंबर की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
पक्षकारों के लिए अगला चरण
8 सितंबर की सुनवाई में अदालत के सामने सर्वे आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाएं रहेंगी। अदालत आगे की प्रक्रिया, अंतरिम व्यवस्था और निचली अदालत में लंबित कार्यवाही को लेकर दिशा-निर्देश दे सकती है।
हालांकि किसी भी पक्ष के दावे को अदालत के अंतिम फैसले से पहले स्थापित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। अभी तक मंदिर होने या मस्जिद के धार्मिक चरित्र में किसी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष की घोषणा नहीं हुई है।
कानूनी प्रक्रिया पर नजर
इस विवाद में एक अहम पहलू यह भी है कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में अदालतें कानूनी प्रक्रिया और संवैधानिक सीमाओं को किस तरह लागू करती हैं। पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने व्यापक कानूनी प्रश्न पहले से लंबित रहे हैं।
संभल मामले में भी दोनों पक्षों की दलीलों का केंद्र यही है कि निचली अदालत की कार्यवाही कानून की निर्धारित सीमाओं के भीतर है या नहीं। इसी वजह से सर्वे की अनुमति और मुकदमे की पोषणीयता दोनों मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं।
आगे क्या होगा
8 सितंबर की सुनवाई के बाद तस्वीर कुछ हद तक साफ होने की उम्मीद है। सुप्रीम कोर्ट यदि विस्तृत सुनवाई आगे बढ़ाता है तो दोनों पक्षों की कानूनी दलीलों पर और चर्चा होगी। अदालत अंतरिम व्यवस्था को बनाए रखने, उसमें बदलाव करने या आगे की कार्यवाही के लिए निर्देश देने पर भी विचार कर सकती है।
फिलहाल स्थानीय अदालत में कार्यवाही सुप्रीम कोर्ट के रुख से प्रभावित है। इसलिए अगले चरण में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा कि शीर्ष अदालत सर्वे आदेश और मूल वाद पर किस दिशा में आगे बढ़ती है।
संभल विवाद का संवेदनशील सामाजिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। 2024 की हिंसा के बाद कानून-व्यवस्था और सामुदायिक शांति का सवाल इस मामले के साथ लगातार जुड़ा हुआ है। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया का शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ना सभी पक्षों के लिए अहम है।
8 सितंबर की सुनवाई अब इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद के अगले कानूनी चरण का निर्धारण करेगी। अंतिम स्थिति अदालत के आदेश और आगे की न्यायिक कार्यवाही से ही स्पष्ट होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।