सुप्रीम कोर्ट ने आवारा सांड के हमले में मृत व्यक्ति के परिवार को ₹15 लाख का एकमुश्त मुआवज़ा देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि आवारा मवेशियों से होने वाली दुर्घटनाएं बढ़ती सार्वजनिक चुनौती हैं और सरकारों को पीड़ितों के लिए प्रभावी मुआवज़ा व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।
📍 नई दिल्ली
📰 1 अगस्त 2026
✍️ By Haris
देशभर में सड़कों पर घूम रहे आवारा मवेशियों से होने वाली दुर्घटनाएं लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को केवल स्थानीय प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन और सड़क सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सार्वजनिक मसला माना है।
अदालत ने 2007 में पंजाब के संगरूर में आवारा सांड के हमले में घायल होकर बाद में मृत्यु होने वाले व्यक्ति के परिवार को ₹15 लाख का एकमुश्त मुआवज़ा देने का निर्देश दिया। इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसी घटनाओं के लिए व्यापक नीति विकसित करने पर विचार करने को कहा।
यह मामला पंजाब के संगरूर में वर्ष 2007 की घटना से जुड़ा है। विजय कुमार नामक व्यक्ति पर सड़क पर एक आवारा सांड ने हमला किया था। गंभीर सिर की चोट के बाद उनकी मृत्यु हो गई।
पीड़ित की पत्नी ने मुआवज़े की मांग की। एकल पीठ ने मोटर वाहन अधिनियम के सिद्धांतों के आधार पर मुआवज़ा दिया था, लेकिन बाद में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने वह आदेश निरस्त कर परिवार को सिविल मुकदमा दायर करने का विकल्प बताया। इसके खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि लगभग दो दशक पुराने मामले में पीड़ित परिवार को फिर से लंबी कानूनी प्रक्रिया में भेजना न्यायसंगत नहीं होगा।
इसी आधार पर अदालत ने ₹15 लाख का एकमुश्त मुआवज़ा देने का आदेश दिया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राहत इस मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए दी गई है और इसे सामान्य कानूनी मिसाल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन राज्यों में मवेशियों से जुड़े कानून पहले से मौजूद हैं, उन्हें प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि केंद्र और राज्य ऐसी कानूनी व्यवस्था विकसित करें जिसके तहत पैदल चलने वालों और वाहन चालकों, दोनों को आवारा पशुओं से होने वाली दुर्घटनाओं में मुआवज़ा मिल सके।
फैसले में अदालत ने सभी मवेशियों की अनिवार्य टैगिंग की सिफारिश की ताकि उनकी पहचान, स्वास्थ्य रिकॉर्ड और निगरानी आसान हो सके।
साथ ही अदालत ने कहा कि जो पशुपालक आर्थिक उपयोग समाप्त होने के बाद पशुओं को सड़कों पर छोड़ देते हैं, उनकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। ऐसे पशुओं को अधिकृत गौशालाओं या आश्रय स्थलों तक सुरक्षित पहुंचाना मालिक की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में आवारा मवेशियों से जुड़ी दुर्घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं। राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों से लेकर शहरों और कस्बों तक यह समस्या लगातार बढ़ रही है।
अदालत ने माना कि यह केवल मानव जीवन का प्रश्न नहीं है, बल्कि पशु कल्याण और प्रशासनिक जवाबदेही का भी विषय है।
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एक समान राष्ट्रीय मुआवज़ा नीति बनती है तो पीड़ित परिवारों को वर्षों तक अदालतों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
दूसरी ओर, कुछ राज्यों का कहना है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग व्यवस्थाएं पहले से मौजूद हैं। उदाहरण के तौर पर हरियाणा ने आवारा पशु दुर्घटनाओं के लिए अलग मुआवज़ा पोर्टल शुरू किया था।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब राज्यों पर दबाव बढ़ सकता है कि वे आवारा मवेशियों की निगरानी, गौशालाओं के संचालन और सड़क सुरक्षा के लिए ठोस व्यवस्था तैयार करें।
यदि केंद्र सरकार व्यापक दिशानिर्देश जारी करती है तो देशभर में एक समान मुआवज़ा व्यवस्था लागू करने की दिशा में भी पहल हो सकती है। फिलहाल अदालत ने सुझाव दिए हैं, कोई नया राष्ट्रीय कानून लागू नहीं किया है।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि केंद्र और राज्य सरकारें अदालत की सिफारिशों पर क्या कदम उठाती हैं। टैगिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, आश्रय स्थलों की निगरानी और मुआवज़ा तंत्र जैसे सुझाव लागू होने पर सड़क सुरक्षा में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।
यह फैसला एक संदेश भी देता है कि सार्वजनिक सड़कों पर आवारा पशुओं की समस्या केवल स्थानीय निकायों का मुद्दा नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़ा राष्ट्रीय प्रश्न है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।