आयुष मलिक ने अदालत में कहा कि उन्होंने 2014 में अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें धर्म, निवास और जीवनसाथी के बारे में अपनी पसंद से फैसला लेने की आज़ादी दी।
📍 शामली, उत्तर प्रदेश
🗓️ 17 सितंबर 2026
✍️ मोहम्मद नावेद
आयुष मलिक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक पसंद से जुड़े अहम सवाल पर अपना फैसला सुनाया है। शामली के रहने वाले 31 वर्षीय आयुष मलिक ने अदालत के सामने कहा कि उन्होंने 2014 में अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया था। उनका कहना था कि इस फैसले के पीछे किसी तरह का दबाव, धमकी, अनुचित प्रभाव या लालच नहीं था।
अदालत ने आयुष को सुनने के बाद उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता बहाल कर दी। जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने माना कि बालिग व्यक्ति अपने विवेक के आधार पर धर्म से जुड़ा फैसला लेने का अधिकार रखता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जीवनसाथी का चुनाव भी व्यक्तिगत स्वायत्तता का हिस्सा है।
मामला अदालत तक कैसे पहुंचा
आयुष मलिक की ओर से उनके मित्र सुल्तान ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि आयुष को उनके पिता की ओर से उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में रखा गया है।
9 सितंबर 2026 को हाई कोर्ट ने राज्य के अधिकारियों और आयुष के पिता को उन्हें अदालत के सामने पेश करने का निर्देश दिया था। अदालत ने उस समय कथित हिरासत और उसमें सरकारी अधिकारियों की भूमिका से जुड़े आरोपों को गंभीर प्रकृति का माना था।
16 सितंबर को आयुष को अदालत के सामने पेश किया गया। जस्टिस संदीप जैन ने उनसे बातचीत की और उनके बयान को दर्ज किया। इसके बाद अदालत ने उनकी स्वतंत्रता से जुड़े सवाल पर फैसला किया।
आयुष मलिक ने अदालत में क्या कहा
अदालत के सामने आयुष ने बताया कि उन्होंने 2014 में अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया था। उनके मुताबिक इस फैसले में कोई दबाव, धमकी, अनुचित प्रभाव या प्रलोभन शामिल नहीं था।
उन्होंने यह भी कहा कि वह इस्लाम की धार्मिक प्रथाओं का पालन कर रहे हैं। उनका दावा था कि परिवार के कुछ सदस्यों को उनका धार्मिक फैसला स्वीकार नहीं था।
आयुष ने चांदनी क़ुरैशी के साथ वैवाहिक संबंध बनाने की इच्छा भी अदालत के सामने रखी। उनके अनुसार परिवार इस फैसले से सहमत नहीं था। अदालत ने धर्म की पसंद के साथ जीवनसाथी चुनने के अधिकार को भी व्यक्तिगत स्वायत्तता से जोड़कर देखा।
पिता की ओर से क्या दलील दी गई
आयुष के पिता ने अपने बेटे के बयान से असहमति जताई। उन्होंने अदालत के सामने कहा कि आयुष पर किसी का प्रभाव पड़ा था और उन्होंने धर्म परिवर्तन अपनी स्वतंत्र इच्छा से नहीं किया था।
पिता ने बेटे की सुरक्षा और भलाई को लेकर चिंता जताई। उन्होंने आयुष के इस्लाम अपनाने और चांदनी क़ुरैशी से विवाह के फैसले पर भी आपत्ति दर्ज कराई।
अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद क्या कहा
अदालत ने आयुष और उनके पिता दोनों से बातचीत की। इसके बाद पीठ ने माना कि आयुष बालिग हैं और अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने में सक्षम हैं।
अदालत के अनुसार, आयुष ने स्पष्ट रूप से कहा था कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया और उनके फैसले में दबाव, धमकी, अनुचित प्रभाव या किसी तरह की मजबूरी नहीं थी। अदालत के सामने मौजूद सामग्री में ऐसा आधार नहीं मिला जिससे उस समय आयुष के बयान की स्वैच्छिकता पर संदेह किया जा सके।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि पिता की अपने बेटे की भलाई को लेकर चिंता समझी जा सकती है। लेकिन ऐसी पारिवारिक असहमति किसी बालिग व्यक्ति की संवैधानिक रूप से संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खत्म करने का आधार नहीं बन सकती।
धर्म और जीवनसाथी चुनने पर अदालत की टिप्पणी
इस मामले में अदालत का प्रमुख पहलू व्यक्तिगत स्वायत्तता रहा। पीठ ने माना कि बालिग व्यक्ति अपने विवेक के अनुसार धर्म चुनने और उसे मानने का फैसला कर सकता है।
इसी तरह जीवनसाथी का चुनाव भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा फैसला है। परिवार की असहमति अपने आप में किसी बालिग व्यक्ति की इस पसंद पर रोक लगाने का पर्याप्त कानूनी आधार नहीं बनती।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल में यदि कानून में मान्य कोई बाधा सामने आती है तो स्थिति अलग हो सकती है। इस मामले में अदालत के सामने आयुष ने अपने फैसले को स्वैच्छिक बताया और पीठ को उस समय उनके बयान पर अविश्वास करने का पर्याप्त आधार नहीं मिला।
हाउस अरेस्ट के आरोप का क्या हुआ
आयुष ने अदालत को बताया कि उन्हें 4 जून 2026 से घर में रखा गया था और उनके साथ धमकी तथा गैरकानूनी हिरासत जैसा व्यवहार हुआ। यह उनके पक्ष का आरोप था।
दूसरी ओर, उनके पिता ने इन आरोपों से असहमति जताई। अदालत ने इस विवाद के बीच आयुष को व्यक्तिगत रूप से सुनने और उनकी स्वतंत्र इच्छा का आकलन करने के बाद उनकी स्वतंत्रता बहाल की।
हाई कोर्ट ने क्या आदेश दिया
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निपटारा करते हुए आयुष मलिक को स्वतंत्र कर दिया। अदालत ने उन्हें अपनी पसंद की जगह पर रहने और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने की आज़ादी दी।
उन्हें अपनी पसंद के धर्म को मानने और उसका पालन करने की भी स्वतंत्रता दी गई। साथ ही अदालत ने कहा कि वह कानून के मुताबिक अपने वैवाहिक संबंध को लेकर उचित फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
मामले का व्यापक कानूनी संदर्भ
यह मामला केवल धर्म परिवर्तन के सवाल तक सीमित नहीं रहा। सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक आस्था, परिवार की असहमति और जीवनसाथी चुनने के अधिकार जैसे संवैधानिक पहलू सामने आए।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उद्देश्य किसी व्यक्ति की हिरासत की वैधता की न्यायिक जांच कराना होता है। ऐसे मामलों में अदालत व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा और हिरासत के कानूनी आधार को महत्वपूर्ण रूप से देखती है।
इस मामले में अदालत ने यह रुख अपनाया कि बालिग व्यक्ति की स्पष्ट और स्वैच्छिक पसंद को केवल पारिवारिक असहमति के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
क्या यह फैसला धर्म परिवर्तन को लेकर हर मामले पर लागू होगा
इस फैसले को हर धर्म परिवर्तन विवाद के लिए एक समान आदेश के रूप में देखना उचित नहीं होगा। अदालत का निष्कर्ष मामले के सामने आए तथ्यों, आयुष के बयान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े सवालों पर आधारित था।
अदालत ने इस स्तर पर आयुष के बयान में ऐसी कोई सामग्री नहीं पाई जिससे यह साबित हो कि उनका धर्म संबंधी फैसला दबाव, धमकी, अनुचित प्रभाव या प्रलोभन से प्रभावित था। इसलिए इस आदेश का केंद्रीय आधार उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अदालत के सामने व्यक्त की गई स्वैच्छिक पसंद रही।
अब आगे क्या
हाई कोर्ट के आदेश के बाद आयुष मलिक को अपनी पसंद के स्थान पर रहने, अपने चुने हुए धर्म का पालन करने और कानून के मुताबिक अपने वैवाहिक जीवन के संबंध में निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिली है।
इस मामले का महत्व इस बात में है कि अदालत ने बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता को पारिवारिक असहमति से अलग करके देखा। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि किसी भी वैवाहिक या धार्मिक फैसले पर लागू अन्य कानूनी प्रावधान अपनी जगह प्रभावी रहेंगे।
आयुष मलिक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश इसलिए अहम है क्योंकि इसमें धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत जीवन से जुड़े फैसलों को बालिग नागरिक की स्वतंत्रता के संदर्भ में परखा गया। अदालत के सामने आयुष का स्पष्ट बयान और उनकी स्वैच्छिक पसंद इस आदेश के प्रमुख आधार रहे।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।