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सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद ध्वस्तीकरण पर अरशद मदनी ने उठाए समान इंसाफ के सवाल

Asif Khan • 2026-09-05 19:16:27
सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद ध्वस्तीकरण पर अरशद मदनी ने उठाए समान इंसाफ के सवाल

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद ध्वस्तीकरण पर अरशद मदनी ने संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता और समान न्याय का सवाल उठाया। अदालत के आदेश और जमीन के विवाद का भी संदर्भ सामने आया।


📍 Deoband 🗓️  5 सितंबर 2026✍️ Shahnazar 


सहारनपुर मस्जिद ध्वस्तीकरण पर अरशद मदनी ने उठाए सवाल


सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को शनिवार सुबह ध्वस्त किए जाने के बाद इस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया सामने आई है। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने घटना को अफसोसजनक बताते हुए संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के समान अनुप्रयोग पर सवाल उठाए हैं। 


मदनी ने कहा कि किसी भी धार्मिक स्थल से जुड़ा विवाद कानून के तहत तय होना चाहिए और यदि अतिक्रमण या अनधिकृत निर्माण कार्रवाई का आधार है तो उसका इस्तेमाल सभी समुदायों और धार्मिक स्थलों के लिए समान रूप से होना चाहिए।


अदालत के आदेश के बाद हुई कार्रवाई


उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को लेकर विवाद में नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने जुलाई में परिसर खाली करने और ढांचे को हटाने का आदेश दिया था। आदेश में जमीन को सरकारी भूमि से संबंधित माना गया और क्षतिपूर्ति की रकम भी निर्धारित की गई थी। मस्जिद पक्ष ने इसके खिलाफ अपील की। 


सितंबर की शुरुआत में जिला अदालत ने मस्जिद पक्ष की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद शनिवार, ५ सितंबर को कलेक्ट्रेट परिसर में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई। 


मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कार्रवाई सुबह करीब पांच बजे शुरू हुई और कलेक्ट्रेट परिसर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई थी। 


मदनी ने समानता के सिद्धांत का मुद्दा उठाया


मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि यह मामला केवल एक धार्मिक ढांचे को हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे कानून के शासन, धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य की निष्पक्षता से जुड़े व्यापक सवाल पैदा होते हैं।


उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकारी जमीन या अतिक्रमण के आधार पर कार्रवाई की जाती है तो क्या देशभर में मौजूद अन्य धार्मिक निर्माणों के मामलों में भी समान कानूनी कसौटी अपनाई जा रही है।


मदनी के अनुसार, किसी एक समुदाय के धार्मिक स्थल पर अलग तरह की सख्ती का आभास कानून के समान संरक्षण के सिद्धांत पर सवाल पैदा कर सकता है। यह उनका राजनीतिक और सार्वजनिक बयान है; इसे प्रशासन या अदालत के स्थापित निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।


१९९१ के अधिनियम का मदनी ने दिया हवाला


मदनी ने उपासना स्थल संबंधी १९९१ के केंद्रीय कानून का भी हवाला दिया। आधिकारिक कानून के अनुसार इस अधिनियम का उद्देश्य धार्मिक स्थलों के धार्मिक चरित्र को १५ अगस्त १९४७ को जैसा था, वैसा बनाए रखना और धार्मिक स्थलों के रूपांतरण पर रोक लगाना है। 


हालांकि, उपलब्ध अदालती रिपोर्टों में सहारनपुर विवाद का मुख्य कानूनी प्रश्न कलेक्ट्रेट परिसर की भूमि और मस्जिद के निर्माण की वैधता से जुड़ा बताया गया है। इसलिए मदनी द्वारा १९९१ के कानून के उल्लंघन का दावा उनका कानूनी तर्क और आरोप है, न कि इस रिपोर्ट में स्थापित न्यायिक निष्कर्ष। 


वक्फ संपत्ति को लेकर भी दावा


मदनी ने मस्जिद के वक्फ से जुड़े होने और पंजीकरण संख्या का उल्लेख करते हुए कहा कि इस पहलू को भी कानूनी विवाद में ध्यान में रखा जाना चाहिए।


वहीं, मौजूदा वक्फ कानून में २०२५ के संशोधन के बाद ‘वक्फ बाई यूजर’ से संबंधित प्रावधानों में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। आधिकारिक कानून में यह भी दर्ज है कि पहले से पंजीकृत ऐसी संपत्तियां कुछ परिस्थितियों में वक्फ संपत्ति बनी रह सकती हैं, लेकिन सरकारी संपत्ति या विवादित भूमि से जुड़े मामलों के लिए अलग प्रावधान लागू होते हैं। 


इसलिए मस्जिद की भूमि, स्वामित्व और वक्फ स्थिति का अंतिम कानूनी निर्धारण संबंधित अभिलेखों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही किया जाना चाहिए।


मस्जिद कमेटी के दस्तावेजों का दावा


मदनी ने कहा कि मस्जिद कमेटी की ओर से पुराने दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए गए थे और दावा किया गया था कि मस्जिद का अस्तित्व कलेक्ट्रेट की मौजूदा इमारत से पहले का है। उनके बयान के मुताबिक इनमें पुराने नगरपालिका और राजस्व अभिलेखों का भी हवाला दिया गया।


हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में अदालत के समक्ष मुख्य विवादित बिंदु भूमि के सरकारी होने और परिसर में निर्माण की वैधता से संबंधित बताया गया है। जिला अदालत द्वारा निचली अदालत का आदेश बरकरार रखे जाने के बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की। 


कार्रवाई के बाद राजनीतिक विवाद


ध्वस्तीकरण के बाद मामले ने राजनीतिक रूप भी ले लिया है। रिपोर्टों के मुताबिक समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकने के लिए उनके आवास पर पुलिस तैनात की गई और उन्हें बाहर नहीं निकलने दिया गया। यह दावा भी संबंधित राजनीतिक पक्ष का है। 


वहीं, प्रशासनिक कार्रवाई का आधार अदालतों द्वारा पारित आदेश और सरकारी भूमि पर अनधिकृत निर्माण से संबंधित निष्कर्ष बताए गए हैं। 


आगे क्या?


सहारनपुर का यह मामला अब धार्मिक स्वतंत्रता, सरकारी भूमि, पुराने धार्मिक निर्माण और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच कानूनी संतुलन से जुड़े सवालों के कारण महत्वपूर्ण हो गया है। मस्जिद पक्ष की ओर से आगे की न्यायिक चुनौती की संभावना भी रिपोर्टों में सामने आई है। 


मौलाना अरशद मदनी ने सरकार से किसी विशेष रियायत के बजाय सभी धार्मिक स्थलों और नागरिकों के लिए समान कानूनी मानदंड लागू करने की मांग की है। मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया और संबंधित सरकारी पक्ष के विस्तृत स्पष्टीकरण से विवाद के शेष कानूनी पहलुओं पर अधिक स्पष्टता आ सकती है।


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Asif Khan

Asif Khan

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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