अमेरिका में विदेशी छात्रों के आवेदन 10% घटे, वजह क्या?
वीजा सख्ती से अमेरिका से दूरी बना रहे विदेशी छात्र?
अमेरिका की पढ़ाई से क्यों घट रहा विदेशी छात्रों का रुझान?
अमेरिकी कॉलेजों में विदेशी छात्रों के आवेदन करीब 10% घटने की रिपोर्ट सामने आई है। 2025-26 में नए अंतरराष्ट्रीय दाखिले पहले ही 17% घटे थे। वीजा जांच, यात्रा प्रतिबंध और बदलते इमिग्रेशन नियम इस गिरावट के प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं, हालांकि हर गिरावट को केवल वीजा नीति से जोड़ना उचित नहीं है।
वॉशिंगटन/नई दिल्ली | 25 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
अमेरिका की यूनिवर्सिटियों के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों का बाजार दबाव में दिखाई दे रहा है। नई रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिकी कॉलेजों में विदेशी छात्रों के आवेदन लगभग 10% घटे हैं, जबकि नए अंतरराष्ट्रीय दाखिलों में इससे पहले ही बड़ी गिरावट दर्ज हो चुकी है। यह बदलाव ऐसे समय आया है जब अमेरिकी प्रशासन ने छात्र वीजा की जांच, इमिग्रेशन स्क्रीनिंग और प्रवेश नियमों को अधिक सख्त किया है। वीजा अपॉइंटमेंट में देरी, सोशल मीडिया और बैकग्राउंड जांच को लेकर चिंता तथा नए नियमों की अनिश्चितता ने अमेरिका को विदेशी छात्रों के लिए पहले की तुलना में कम आकर्षक बनाया है। हालांकि यहां एक जरूरी फर्क है। आवेदन में गिरावट और वास्तविक दाखिले में गिरावट एक ही आंकड़ा नहीं हैं। आवेदन का आंकड़ा छात्रों की शुरुआती दिलचस्पी बताता है, जबकि दाखिला बताता है कि कितने छात्र वास्तव में अमेरिकी संस्थान में पहुंचे।
इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन यानी आईआईई के फॉल 2025 स्नैपशॉट के मुताबिक 2025-26 अकादमिक वर्ष में अमेरिकी संस्थानों में नए अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या 17% कम हुई। कुल अंतरराष्ट्रीय छात्र संख्या में गिरावट करीब 1% रही, लेकिन पहली बार दाखिला लेने वाले छात्रों में कमी कहीं ज्यादा थी। आईआईई के सर्वे में 825 से अधिक अमेरिकी उच्च शिक्षा संस्थानों ने हिस्सा लिया। इनमें 57% संस्थानों ने नए अंतरराष्ट्रीय दाखिलों में गिरावट बताई, जबकि केवल 29% ने बढ़ोतरी दर्ज की। यानी समस्या केवल कुछ चुनिंदा यूनिवर्सिटियों तक सीमित नहीं दिखती। इसका असर अमेरिकी उच्च शिक्षा व्यवस्था के व्यापक हिस्से में दिखाई दे रहा है।
आवेदन में करीब 10% गिरावट का मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी कैंपस में विदेशी छात्रों की संख्या तुरंत 10% कम हो जाएगी। आवेदन, ऑफर, वीजा और वास्तविक दाखिला अलग-अलग चरण हैं। लेकिन आवेदन शुरुआती मांग का अहम संकेतक है। अगर दुनिया के अलग-अलग देशों से छात्र अमेरिकी यूनिवर्सिटियों को पहले की तुलना में कम प्राथमिकता दे रहे हैं, तो आने वाले दाखिला चक्रों में इसका असर दिखाई दे सकता है।
इसीलिए शिक्षा विशेषज्ञ आवेदन के ट्रेंड को गंभीर संकेत मान रहे हैं। अमेरिकी यूनिवर्सिटियों के लिए विदेशी छात्रों की संख्या केवल कैंपस की विविधता का सवाल नहीं है, बल्कि वित्तीय और रिसर्च इकोसिस्टम से भी जुड़ा है।
आईआईई के फॉल 2025 सर्वे में जिन अमेरिकी संस्थानों ने नए अंतरराष्ट्रीय दाखिलों में कमी बताई, उनमें 96% ने वीजा आवेदन संबंधी चिंताओं को एक प्रमुख कारण बताया। 68% संस्थानों ने यात्रा प्रतिबंधों का भी उल्लेख किया। यह आंकड़ा इस बात का मजबूत संकेत देता है कि वीजा प्रक्रिया छात्रों के फैसले को प्रभावित कर रही है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर छात्र ने केवल वीजा नीति की वजह से अमेरिका को छोड़ा।
छात्रों के सामने फीस, रहने का खर्च, नौकरी की संभावनाएं, पोस्ट-स्टडी वर्क ऑप्शन और दूसरे देशों की प्रतिस्पर्धी नीतियां भी मौजूद हैं।
अमेरिकी छात्र वीजा के आंकड़े भी इसी दिशा में संकेत देते हैं। इनसाइड हायर एड की स्टेट डिपार्टमेंट डेटा पर आधारित समीक्षा के मुताबिक जून से अगस्त 2025 के दौरान नए छात्र वीजा जारी होने की संख्या 186,160 रही, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 35.6% कम थी। इस गिरावट का एक हिस्सा 2025 में छात्र वीजा इंटरव्यू पर अस्थायी रोक और बाद में बनी अपॉइंटमेंट बैकलॉग से जुड़ा था। इसलिए पूरे आंकड़े को केवल स्थायी नीति बदलाव का परिणाम मानना सही नहीं होगा। फिर भी भारत समेत प्रमुख छात्र स्रोत देशों में गिरावट उल्लेखनीय रही। इनसाइड हायर एड के मुताबिक 2025 की गर्मियों में भारतीय छात्रों के लिए जारी छात्र वीजा में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 63% की कमी दर्ज हुई।
भारत लंबे समय से अमेरिका के लिए सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय छात्र स्रोत बना हुआ है। आईआईई के 2025 ओपन डोर्स आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में अमेरिका में 363,019 भारतीय छात्र थे, जो कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों में सबसे बड़ा राष्ट्रीय समूह था। इसलिए अमेरिकी वीजा नीति में बदलाव का असर भारतीय छात्रों पर खास तौर पर दिखाई देता है। वीजा अपॉइंटमेंट, इंटरव्यू, डॉक्यूमेंटेशन और प्रवेश प्रक्रिया में अनिश्चितता बढ़ने पर छात्र कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं। हालिया रिपोर्टों में भारतीय छात्रों के अमेरिकी कॉलेज आवेदन में भी दो अंकों की गिरावट का संकेत मिला है। हालांकि अलग-अलग डेटासेट और आवेदन प्लेटफॉर्म अलग तस्वीर दे सकते हैं, इसलिए एक सर्वे के आंकड़े को पूरे भारतीय छात्र बाजार का अंतिम प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा।
अमेरिकी प्रशासन ने विदेशी छात्रों के लिए वीजा प्रक्रिया में अधिक कठोर जांच लागू की है। इसके अलावा डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी ने F छात्र और J एक्सचेंज वीजा की अवधि को लेकर नया नियम बनाया है, जिसके तहत 15 सितंबर 2026 से इन वीजाओं के लिए अधिकतम चार साल की अवधि तय की जानी है। यह नियम खासकर लंबे PhD और कुछ शोध कार्यक्रमों के छात्रों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे छात्रों को अपनी पढ़ाई की अवधि बढ़ने पर एक्सटेंशन की जरूरत पड़ सकती है। इस नियम को लेकर कानूनी चुनौती भी सामने आ चुकी है। यूनियनों और वकालती संगठनों ने अमेरिकी सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर किया है और तर्क दिया है कि इससे विदेशी छात्रों की भर्ती प्रभावित होगी।
यह निष्कर्ष निकालना आसान होगा कि विदेशी छात्रों की पूरी गिरावट केवल ट्रंप प्रशासन की वीजा नीति की वजह से है। उपलब्ध डेटा इससे अधिक जटिल तस्वीर दिखाता है। अमेरिका में पढ़ाई महंगी है। ट्यूशन फीस, स्वास्थ्य बीमा, आवास और दैनिक खर्च कई छात्रों के लिए बड़ा आर्थिक बोझ हैं। इसके साथ पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा और H-1B में जाने की अनिश्चितता भी छात्रों के फैसले को प्रभावित करती है। दूसरी तरफ ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोप के कई देश अंतरराष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित करने के लिए अपनी शिक्षा और इमिग्रेशन नीतियां बदल रहे हैं। इसलिए अमेरिकी गिरावट को केवल एक नीति का परिणाम बताना अधूरा विश्लेषण होगा। वीजा सख्ती महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन वैश्विक शिक्षा बाजार की प्रतिस्पर्धा भी उतनी ही अहम है।
विदेशी छात्र अमेरिकी यूनिवर्सिटियों और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में बड़ी रकम लाते हैं। वे ट्यूशन फीस के अलावा आवास, भोजन, परिवहन और दूसरी सेवाओं पर भी खर्च करते हैं। एनएएफएसए और जेबी इंटरनेशनल के अगस्त 2026 के विश्लेषण के मुताबिक फॉल 2026 में अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या 111,000 तक घट सकती है। इस अनुमान के अनुसार अमेरिकी अर्थव्यवस्था को 3.4 अरब डॉलर तक का नुकसान और करीब 40,000 नौकरियों पर असर पड़ सकता है। यह आंकड़ा वास्तविक परिणाम नहीं, बल्कि एक प्रोजेक्शन है। इसलिए इसे भविष्य का निश्चित आर्थिक नुकसान बताना उचित नहीं होगा। फिर भी यह अनुमान बताता है कि विदेशी छात्रों का मुद्दा केवल यूनिवर्सिटी एडमिशन तक सीमित नहीं है। इसका असर स्थानीय कारोबार और रोजगार तक पहुंच सकता है।
अमेरिकी यूनिवर्सिटियों के लिए विदेशी छात्रों में कमी दोहरी समस्या पैदा करती है। पहली चुनौती कैंपस की अंतरराष्ट्रीय विविधता बनाए रखना है। दूसरी चुनौती बजट और राजस्व की है। कुछ संस्थान अंतरराष्ट्रीय छात्रों को ज्यादा ट्यूशन फीस वाले कार्यक्रमों में भर्ती करते हैं। खासकर ग्रेजुएट और STEM प्रोग्रामों में विदेशी छात्रों की मौजूदगी रिसर्च और टीचिंग असिस्टेंटशिप से भी जुड़ी होती है। आईआईई के आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में अमेरिका में करीब 11.8 लाख अंतरराष्ट्रीय छात्र थे। इनमें ग्रेजुएट छात्र सबसे बड़ा अकादमिक समूह थे। अगर नए छात्रों का प्रवाह लगातार कमजोर होता है, तो आने वाले वर्षों में इसका असर यूनिवर्सिटी की रिसर्च क्षमता और वित्तीय योजना पर भी पड़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा बाजार में अमेरिका अकेला विकल्प नहीं है। छात्र अब यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और दूसरे यूरोपीय देशों की नीतियों की तुलना करते हैं। अगर किसी देश में वीजा प्रक्रिया तेज हो, पढ़ाई के बाद काम करने के अवसर स्पष्ट हों और कुल लागत अपेक्षाकृत कम हो, तो छात्र उस देश को प्राथमिकता दे सकते हैं। अमेरिका की चुनौती इसलिए केवल वीजा नहीं है। उसे अपनी उच्च शिक्षा की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता, इमिग्रेशन नीति और छात्रों के लिए पोस्ट-स्टडी करियर रास्तों के बीच संतुलन बनाना होगा।
ऐसा कहना फिलहाल सही नहीं होगा। आईआईई के 2025 आंकड़ों में अमेरिका में कुल अंतरराष्ट्रीय छात्र संख्या 1,177,766 रही, जो पिछले अकादमिक वर्ष से 5% अधिक थी। भारत से छात्रों की संख्या भी 10% बढ़कर 363,019 हुई। यानी 2024-25 में अमेरिका अभी भी दुनिया का बड़ा अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र था। मौजूदा चिंता मुख्यतः नए छात्रों की घटती संख्या और आगे के आवेदन ट्रेंड को लेकर है। यह अंतर महत्वपूर्ण है। पुराना छात्र आधार अभी बड़ा है, लेकिन अगर नए दाखिलों में गिरावट कई वर्षों तक बनी रही तो कुल संख्या पर बाद में अधिक स्पष्ट असर दिख सकता है।
फॉल 2026 के वास्तविक दाखिला आंकड़े इस बहस में अगला बड़ा संकेत देंगे। अभी उपलब्ध कई आंकड़े सर्वे, आवेदन और प्रोजेक्शन पर आधारित हैं। पूर्ण तस्वीर बाद में स्पष्ट होगी। सबसे अहम सवाल यह रहेगा कि वीजा प्रक्रिया में सख्ती के बावजूद क्या छात्र अमेरिकी यूनिवर्सिटियों को अंतिम विकल्प के रूप में चुनते हैं। अगर आवेदन गिरावट दाखिले में भी बदलती है, तो अमेरिकी उच्च शिक्षा क्षेत्र पर दबाव बढ़ेगा। दूसरी तरफ अगर वीजा प्रक्रिया सामान्य होती है और अपॉइंटमेंट बैकलॉग कम होता है, तो कुछ गिरावट वापस भी आ सकती है। 2025 के वीजा आंकड़ों में गर्मियों के आगे बढ़ने के साथ गिरावट की दर कम होने के संकेत मिले थे।
अमेरिका में विदेशी छात्रों के आवेदन और नए दाखिलों में गिरावट एक गंभीर शिक्षा और इमिग्रेशन ट्रेंड का संकेत दे रही है। आईआईई के अनुसार 2025-26 में नए अंतरराष्ट्रीय दाखिले 17% घटे और कई संस्थानों ने वीजा चिंताओं को गिरावट का प्रमुख कारण बताया। अमेरिकी छात्र वीजा में 2025 की बड़ी गिरावट और 2026 में प्रस्तावित नए वीजा नियमों ने अनिश्चितता बढ़ाई है। लेकिन इस पूरे बदलाव को केवल वीजा सख्ती से जोड़ना सही नहीं होगा। फीस, रोजगार की संभावनाएं और दूसरे देशों की प्रतिस्पर्धा भी छात्रों के फैसले को प्रभावित कर रही हैं। अमेरिका के लिए असली चुनौती अपनी उच्च शिक्षा की वैश्विक अपील बनाए रखना है। अगर विदेशी छात्रों का भरोसा लंबे समय तक कमजोर रहा, तो असर यूनिवर्सिटी कैंपस से आगे बढ़कर रिसर्च, स्थानीय अर्थव्यवस्था और अमेरिका की वैश्विक शिक्षा साख तक पहुंच सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।