चीन से जुड़े जोखिमों के बीच जापानी कंपनियां भारत में निवेश और कारोबार बढ़ा रही हैं। अगले दशक में जापान से भारत के लिए 10 ट्रिलियन येन निजी निवेश का लक्ष्य तय है।
नई दिल्ली | 1 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
जापान की कंपनियां भारत को अपने अगले बड़े कारोबारी और निवेश केंद्र के तौर पर देख रही हैं। चीन से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला के जोखिम और जापान के घरेलू बाजार में लंबे समय से जारी जनसांख्यिकीय दबाव के बीच भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार और तेज आर्थिक विकास जापानी कंपनियों को आकर्षित कर रहा है।
हाल के महीनों में खुदरा, वित्तीय सेवाओं, सेमीकंडक्टर, विनिर्माण, हरित ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल बुनियादी ढांचे में जापानी कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ी है। भारत सरकार भी इस पूंजी को आकर्षित करने के लिए जापान के साथ आर्थिक साझेदारी को तेज कर रही है।
भारत और जापान ने अगले दशक में जापान से भारत में 10 ट्रिलियन येन निजी निवेश को बढ़ावा देने का लक्ष्य तय किया है। भारतीय दूतावास के मुताबिक, यह दोनों देशों के बीच अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी निवेश लक्ष्य है।
भारत में अप्रैल 2000 से दिसंबर 2025 तक जापान से 47.59 अरब डॉलर से अधिक का संचयी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया। जापान भारत के प्रमुख विदेशी निवेश स्रोतों में पांचवें स्थान पर है।
भारत के बड़े शहरों में जापानी ब्रांडों की मौजूदगी अब पहले से ज्यादा दिखाई दे रही है।
यूनीक्लो और मुजी पहले से भारतीय बाजार में सक्रिय हैं। फर्नीचर कंपनी नितोरी ने भी भारत में प्रवेश किया है, जबकि लॉसन ने भारतीय बाजार में विस्तार की योजना बनाई है। ओनित्सुका टाइगर भी भारतीय उपभोक्ता बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है।
यह बदलाव केवल ब्रांड विस्तार नहीं है। जापानी कंपनियां भारत के बढ़ते मध्यम वर्ग, शहरीकरण और उपभोक्ता मांग को लंबे समय के कारोबारी अवसर के रूप में देख रही हैं।
जापानी निवेश की कहानी खुदरा बाजार से आगे बढ़ चुकी है। वित्तीय क्षेत्र में जापान की बड़ी संस्थाओं ने भारत में बड़े सौदे किए हैं।
एमयूएफजी बैंक ने श्रीराम फाइनेंस में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने के लिए 4.4 अरब डॉलर का सौदा किया। जापान की सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग कॉरपोरेशन भी यस बैंक की सबसे बड़ी शेयरधारक बन चुकी है।
भारत सरकार के मुताबिक एमयूएफजी भारत में नवीकरणीय ऊर्जा और हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में भी अपनी दिलचस्पी बढ़ा रहा है।
भारत और जापान की साझेदारी अब पारंपरिक विनिर्माण से आगे बढ़ रही है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जापानी कंपनियों के सामने सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा सेंटर, नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, उन्नत विनिर्माण और डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश के अवसर रखे हैं।
भारत के लिए यह रणनीति इसलिए अहम है क्योंकि सरकार चीन पर आपूर्ति श्रृंखला की निर्भरता कम करने और देश को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने की कोशिश कर रही है।
यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। जापानी कंपनियों की रणनीति को चीन से पूरी तरह बाहर निकलने के रूप में देखना सही नहीं होगा।
जापान के आर्थिक शोध संस्थान के अध्ययन के मुताबिक, भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ने पर जापानी बहुराष्ट्रीय कंपनियां आपूर्ति स्रोतों और उत्पादन केंद्रों में विविधता लाती हैं। लेकिन चीन से बड़े पैमाने पर पूरी तरह बाहर निकलने के प्रमाण सीमित हैं।
यानी रणनीति अधिकतर “चीन प्लस वन” जैसी है। कंपनियां चीन में अपना कारोबार बनाए रखते हुए भारत जैसे दूसरे बाजारों में नई क्षमता तैयार कर रही हैं।
भारत के पक्ष में सबसे बड़ा कारक उसका घरेलू बाजार है। 1.4 अरब से अधिक आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और विस्तार करता मध्यम वर्ग जापानी कंपनियों के लिए बड़ा कारोबारी आधार तैयार करता है। जापान टाइम्स के मुताबिक, जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन के 2025 के सर्वेक्षण में भारत लगातार चौथे साल जापानी कंपनियों के लिए सबसे संभावनाशील विदेशी बाजार रहा।
भारत की आर्थिक वृद्धि और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बढ़ती भूमिका भी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण है।
जापान केमिकल कंपनियों की रणनीति में भी यह बदलाव दिखाई देता है। केमिकल एंड इंजीनियरिंग न्यूज़ के अनुसार, कई जापानी रासायनिक कंपनियों ने चीन में निवेश की गति घटाई और भारत में अवसर तलाशने शुरू किए हैं।
जापानी कंपनियों के लिए भारत का महत्व केवल स्थानीय बिक्री तक सीमित नहीं है।
भारत में स्थापित उत्पादन और सेवा केंद्रों से कंपनियां मध्य पूर्व, अफ्रीका और दूसरे एशियाई बाजारों को भी सेवा दे सकती हैं। फुजीफिल्म के प्रमुख ने भारत को भविष्य में ऐसे क्षेत्रीय आपूर्ति आधार के तौर पर देखने की बात कही है।
भारत में जापानी कंपनियों के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर भी बढ़ रहे हैं। इन केंद्रों में अनुसंधान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कॉरपोरेट रणनीति और दूसरी उच्च-मूल्य वाली सेवाओं पर काम हो रहा है।
जापानी निवेश बढ़ाने की कोशिशों के बीच भारत के सामने कुछ पुरानी चुनौतियां कायम हैं।
नियामकीय जटिलता, अलग-अलग राज्यों में अलग नियम, भूमि और पर्यावरण मंजूरी में देरी तथा अनुबंध लागू कराने से जुड़े सवाल विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। जापान सरकार ने भी भारतीय बाजार में प्रवेश करने वाली छोटी और मध्यम जापानी कंपनियों की ऐसी दिक्कतें कम करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर काम शुरू किया है।
2024 में भारत में करीब 1,434 जापानी कंपनियां सक्रिय थीं। यह संख्या 2018 के करीब 1,400 के स्तर से बहुत ज्यादा नहीं बदली है। इससे पता चलता है कि रुचि बढ़ने के बावजूद निवेश को जमीन पर उतारने की रफ्तार में चुनौतियां मौजूद हैं।
भारत अब जापानी कंपनियों को केवल बाजार उपलब्ध कराने की कोशिश नहीं कर रहा। लक्ष्य तकनीक, पूंजी और विनिर्माण क्षमता को भारत के औद्योगिक विकास से जोड़ना है।
पीयूष गोयल की हालिया जापान यात्रा के दौरान भारत ने 30 से ज्यादा बड़ी जापानी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों के साथ निवेश और औद्योगिक साझेदारी पर बातचीत की। जापानी कंपनियों ने सेमीकंडक्टर और उन्नत तकनीक के क्षेत्र में भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने में रुचि जताई।
जापानी कंपनियों का भारत की ओर बढ़ता रुझान चीन के साथ आर्थिक संबंधों के तत्काल अंत का संकेत नहीं है। इसे अधिकतर जोखिम प्रबंधन और निवेश विविधीकरण के रूप में देखना बेहतर होगा।
भारत के लिए यह अवसर इसलिए अहम है क्योंकि जापान लंबे समय से पूंजी, तकनीक और औद्योगिक विशेषज्ञता का महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। यदि भारत नियामकीय अड़चनों और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याओं को कम करता है, तो जापानी निवेश का अगला चरण वित्त और खुदरा से आगे बढ़कर उन्नत विनिर्माण, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा तक फैल सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।