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भारत में कोयले की मांग 4.2% बढ़ने का अनुमान, उत्पादन भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की उम्मीद: आईईए

Wasi Siddiqui 2026-09-10 16:33:12
भारत में कोयले की मांग 4.2% बढ़ने का अनुमान, उत्पादन भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की उम्मीद: आईईए

भारत में 2026 के दौरान कोयले की मांग 4.2% बढ़कर करीब 1.35 अरब टन पहुंचने का अनुमान है। आईईए ने बिजली जरूरत और मौसम संबंधी परिस्थितियों को अहम वजह बताया है।

📍 नई दिल्ली
🗓️ 10 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui


भारत में कोयले की मांग बढ़ने का अनुमान

भारत में कोयले की मांग 2026 में 4.2% बढ़ने का अनुमान है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के ताजा आकलन के मुताबिक देश में कोयले की खपत करीब 1.35 अरब टन तक पहुंच सकती है। बिजली की बढ़ती जरूरत और मौसम संबंधी परिस्थितियां इस वृद्धि की अहम वजहों में शामिल हैं।

आईईए के अनुसार, भारत में कोयला अभी भी बिजली उत्पादन और भारी उद्योग के लिए अहम ईंधन बना हुआ है। घरेलू उत्पादन बढ़ाने की नीति के साथ भारत आयात पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।

बिजली की बढ़ती जरूरत बनेगी बड़ा कारक

आईईए के ताजा बिजली संबंधी आकलन के मुताबिक भारत में 2026 के दौरान बिजली की मांग में करीब 7% वृद्धि का अनुमान है। यह 2025 की अपेक्षाकृत धीमी 1.6% वृद्धि के मुकाबले बड़ा बदलाव है।

बिजली की मांग बढ़ने का सीधा असर कोयले पर पड़ता है। भारत में कोयले की खपत का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा बिजली क्षेत्र से जुड़ा है। इसलिए बिजली की मांग में तेज बढ़ोतरी होने पर ताप विद्युत संयंत्रों के लिए कोयले की जरूरत भी बढ़ती है।

आईईए ने मौजूदा वैश्विक ऊर्जा परिस्थितियों के साथ मौसम को भी अहम कारक माना है। एजेंसी के अनुसार इस साल मजबूत अल नीनो की स्थिति एशिया के कुछ प्रमुख बाजारों में शीतलन की जरूरत बढ़ा सकती है और जलविद्युत उत्पादन पर असर डाल सकती है। ऐसी स्थिति में कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है।

घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर सरकार का जोर

भारत की ऊर्जा रणनीति में घरेलू कोयला उत्पादन बढ़ाना अहम प्राथमिकता बना हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में देश का कोयला उत्पादन 1,047.52 मिलियन टन और वित्त वर्ष 2025-26 में 1,040.08 मिलियन टन रहा। लगातार दो वित्त वर्षों में उत्पादन 1 अरब टन के स्तर से ऊपर रहा।

कैप्टिव और कमर्शियल खदानों का योगदान भी बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में इन खदानों का कुल उत्पादन 210.46 मिलियन टन रहा, जो पिछले वित्त वर्ष के 190.95 मिलियन टन से 10.22% अधिक था।

आईईए के पिछले आपूर्ति आकलन में भी भारत को प्रमुख उत्पादक देशों में अपवाद के तौर पर देखा गया था। 2026 के लिए भारत के कोयला उत्पादन में वृद्धि का अनुमान लगाया गया था, जबकि कई दूसरे बड़े उत्पादक देशों में उत्पादन घटने की संभावना जताई गई थी।

आयात पर निर्भरता घटाने की कोशिश

घरेलू उत्पादन में वृद्धि का एक प्रमुख मकसद आयातित कोयले की जरूरत कम करना है। आईईए ने अपने पिछले आकलन में कहा था कि भारत में घरेलू थर्मल कोयला उत्पादन की वृद्धि मांग से तेज रहने की संभावना है। इससे आयातित थर्मल कोयले पर निर्भरता कम होने की उम्मीद जताई गई थी।

यह नीति भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी अहम है। वैश्विक बाजार में कोयले की कीमत, माल ढुलाई और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारक आयात लागत को प्रभावित करते हैं। घरेलू उत्पादन बढ़ने से इन बाहरी जोखिमों का असर कुछ हद तक सीमित करने में मदद मिलती है।

हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत कोयले का आयात पूरी तरह समाप्त कर रहा है। बिजली क्षेत्र के अलावा इस्पात और दूसरे औद्योगिक क्षेत्रों में अलग-अलग गुणवत्ता वाले कोयले की जरूरत रहती है। इसलिए घरेलू उत्पादन बढ़ने के बावजूद कुछ श्रेणियों में आयात की आवश्यकता बनी रह सकती है।

वैश्विक ऊर्जा संकट का भी असर

आईईए की नई रिपोर्ट केवल भारत की घरेलू स्थिति पर आधारित नहीं है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी बड़े बदलाव हो रहे हैं। एजेंसी के अनुसार मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण प्राकृतिक गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से एलएनजी आपूर्ति में भारी गिरावट ने कई देशों के ऊर्जा बाजारों को प्रभावित किया है।

आईईए के अनुसार होर्मुज़ से सीधे तौर पर कोयले की बड़ी मात्रा की आवाजाही नहीं होती। लेकिन गैस आपूर्ति में व्यवधान और कीमतों में बढ़ोतरी ने कुछ देशों को गैस से कोयले की ओर बिजली उत्पादन स्थानांतरित करने के लिए प्रेरित किया है।

इसका असर वैश्विक कोयला मांग के अनुमान पर भी पड़ा है। आईईए ने 2026 में वैश्विक कोयला मांग में 1.2% वृद्धि का अनुमान लगाया है। इसके साथ वैश्विक खपत करीब 8.94 अरब टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है।

भारत के लिए बढ़ी मांग का मतलब क्या है

भारत के लिए बढ़ती कोयला मांग का पहला असर बिजली आपूर्ति की सुरक्षा पर पड़ सकता है। अगर बिजली की खपत तेज गति से बढ़ती है, तो ताप विद्युत संयंत्रों के लिए पर्याप्त ईंधन उपलब्ध रखना जरूरी होगा।

दूसरा असर आयात नीति पर होगा। घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी आयात आवश्यकता को सीमित कर सकती है, लेकिन मांग में तेज वृद्धि होने पर घरेलू उत्पादन और खपत के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण रहेगा।

तीसरा पहलू परिवहन और लॉजिस्टिक्स का है। खदानों से बिजली संयंत्रों तक कोयला पहुंचाने के लिए रेल नेटवर्क और अन्य परिवहन माध्यमों की क्षमता महत्वपूर्ण बनी रहेगी। हाल के महीनों में बिजली संयंत्रों के स्टॉक को लेकर भी आपूर्ति व्यवस्था पर ध्यान बढ़ा है।

रिकॉर्ड उत्पादन की उम्मीद, लेकिन चुनौती भी कायम

भारत ने हाल के वर्षों में कोयला उत्पादन बढ़ाने में उल्लेखनीय प्रगति की है। आईईए के 2025 के आंकलन में 2024 के दौरान भारत का कोयला उत्पादन 1.082 अरब टन तक पहुंचने का उल्लेख था। उस वर्ष उत्पादन में 7% वृद्धि दर्ज की गई थी।

लेकिन उत्पादन बढ़ाना अकेली चुनौती नहीं है। कोयले की गुणवत्ता, खनन क्षेत्र में सुरक्षा, पर्यावरणीय प्रभाव, भूमि संबंधी मुद्दे और खदानों से उपभोक्ता केंद्रों तक परिवहन भी नीति निर्धारण के अहम हिस्से हैं।

साथ ही, भारत के ऊर्जा मिश्रण में सौर और पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी भी बढ़ रही है। 2025 में मजबूत मानसून और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि के कारण भारत में कोयला आधारित बिजली उत्पादन में करीब 3% की गिरावट दर्ज हुई थी।

इससे स्पष्ट होता है कि कोयले की मांग का भविष्य केवल खनन उत्पादन से तय नहीं होगा। बिजली की कुल मांग, नवीकरणीय ऊर्जा की गति, जलविद्युत उत्पादन और मौसम सभी इसमें भूमिका निभाएंगे।

वैश्विक तस्वीर भी बदल रही है

आईईए के ताजा आकलन के मुताबिक 2026 में वैश्विक कोयला उत्पादन 9 अरब टन से ऊपर रहने की संभावना है, हालांकि 2025 के रिकॉर्ड स्तर के बाद इसमें गिरावट का अनुमान है। चीन में उत्पादन में कमी इसकी प्रमुख वजहों में शामिल है।

दूसरी ओर, भारत उन बड़े उत्पादक देशों में है जहां उत्पादन बढ़ने की दिशा बनी हुई है। यह स्थिति भारत को घरेलू ऊर्जा सुरक्षा के मामले में अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति देती है।

लेकिन वैश्विक बाजार में मांग, कीमत और व्यापार प्रवाह पर भू-राजनीतिक घटनाओं का असर बना रहेगा। खास तौर पर प्राकृतिक गैस की कीमत और एलएनजी आपूर्ति में बदलाव कोयले की अंतरराष्ट्रीय मांग को प्रभावित कर सकते हैं।

आगे क्या देखना होगा

अब सबसे अहम निगाह भारत की बिजली मांग, मानसून और कोयला उत्पादन के वास्तविक आंकड़ों पर रहेगी। यदि बिजली की मांग आईईए के अनुमान के अनुरूप तेज रहती है, तो कोयले की उपलब्धता और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था की अहमियत और बढ़ेगी।

साथ ही यह भी देखना होगा कि घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी किस हद तक आयात को प्रतिस्थापित करती है। इस्पात और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों की जरूरतें भी कोयला व्यापार की दिशा तय करेंगी।

आईईए ने 2027 के लिए भी अनिश्चितता की ओर इशारा किया है। एजेंसी के मुताबिक होर्मुज़ क्षेत्र में एलएनजी आपूर्ति की स्थिति और प्राकृतिक गैस की कीमतें अगले वर्ष कोयले की वैश्विक मांग की दिशा पर महत्वपूर्ण असर डाल सकती हैं।

भारत के मामले में तस्वीर दोहरी है। एक ओर बढ़ती बिजली जरूरत को पूरा करने के लिए कोयला अभी भी अहम है। दूसरी ओर नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार ऊर्जा मिश्रण को बदल रहा है। इसलिए आने वाले वर्षों में चुनौती केवल अधिक कोयला पैदा करने की नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, लागत, पर्यावरणीय दायित्व और स्वच्छ ऊर्जा विस्तार के बीच संतुलन बनाने की होगी।

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Wasi Siddiqui

Wasi Siddiqui

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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