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RBI FX Swap: अतिरिक्त नकदी सोखने के लिए डॉलर-रुपया स्वैप

Apurva Choudhary 2026-09-09 22:06:40
RBI FX Swap: अतिरिक्त नकदी सोखने के लिए डॉलर-रुपया स्वैप
भारतीय बैंकिंग सिस्टम में surplus रुपये की liquidity बढ़ने के बीच RBI ने कथित तौर पर डॉलर-रुपया sell-buy swaps का इस्तेमाल शुरू किया है। Reuters के मुताबिक core liquidity surplus 14–15 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा। केंद्रीय बैंक का उद्देश्य liquidity absorb करना और monetary policy transmission को संतुलित रखना है।

Location: Mumbai, Maharashtra
Date: 9 September 2026
By: Apurva Choudhary 

RBI FX Swap: अतिरिक्त नकदी सोखने के लिए डॉलर-रुपया स्वैप
भारतीय बैंकिंग सिस्टम में बढ़ी हुई अतिरिक्त रुपये की liquidity को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने डॉलर-रुपया foreign exchange sell-buy swaps का सहारा लिया है। Reuters की 9 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक सात बैंकर्स और विदेशी मुद्रा कारोबारियों ने बताया कि RBI ने सितंबर और संभवतः अक्टूबर में maturity वाले swaps के जरिए surplus rupee liquidity को absorb करना शुरू किया है।
यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब हाल में RBI की विशेष डॉलर-डिपॉजिट व्यवस्था के जरिए बैंकों में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा आई और उसके बदले रुपये की liquidity बढ़ी। Reuters के अनुसार core liquidity surplus करीब 14–15 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था और केंद्रीय बैंक विभिन्न उपायों से करीब 7 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त liquidity को absorb करने की कोशिश कर सकता है।

क्या हुआ?
Reuters के मुताबिक RBI ने near-maturity डॉलर-रुपया sell-buy swaps किए हैं। इन transactions में केंद्रीय बैंक डॉलर बेचकर रुपये प्राप्त करता है और तय maturity पर डॉलर को वापस खरीदने का समझौता करता है। इस प्रक्रिया का तत्काल असर बैंकिंग सिस्टम से रुपये की liquidity को बाहर खींचने के रूप में होता है।
इस कार्रवाई को समझने के लिए यह फर्क महत्वपूर्ण है कि RBI केवल रुपये को “बचाने” के लिए कदम नहीं उठा रहा है। FX intervention का एक हिस्सा रुपये पर दबाव को नियंत्रित करने से जुड़ा है, जबकि swap operation का दूसरा असर banking-system liquidity को absorb करना है।
Reuters की अलग रिपोर्ट के अनुसार 9 सितंबर को रुपया डॉलर के मुकाबले 95.2250 के session low तक गया और बाद में कुछ सुधरकर करीब 95.07 तक आया। कारोबारी सूत्रों ने इसे RBI की संभावित currency intervention से जोड़ा। दिन के अंत में रुपया करीब 95.1050 प्रति डॉलर पर बंद हुआ।

पूरा संदर्भ क्या है?
बैंकिंग सिस्टम में liquidity बढ़ने की शुरुआत RBI की विशेष विदेशी मुद्रा जमा व्यवस्था से हुई। इस योजना के तहत गैर-निवासी भारतीयों से डॉलर जमा आकर्षित किए गए और बैंकों को विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए प्रोत्साहन मिला।
Reuters की 3 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार इस विशेष व्यवस्था से करीब 127 अरब डॉलर के foreign-currency deposits आए और banking-system liquidity surplus करीब 9.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। बाद में liquidity surplus और बढ़ा।
इंडियन एक्सप्रेस ने भी 3 सितंबर को liquidity surplus को करीब 10.3 लाख करोड़ रुपये के चार साल के उच्च स्तर पर बताया था। रिपोर्ट के मुताबिक excessive liquidity से overnight money-market rates policy rate से नीचे जा सकती हैं और इससे monetary-policy transmission जटिल हो सकता है।

पृष्ठभूमि और घटनाक्रम
RBI के सामने समस्या यह है कि banking system में बहुत ज्यादा liquidity रहने पर बैंकों के पास कर्ज देने के लिए बड़ी मात्रा में धन उपलब्ध रहता है। इससे short-term interest rates पर दबाव पड़ सकता है और केंद्रीय बैंक के policy-rate framework का transmission कमजोर हो सकता है।
इसी वजह से RBI ने पिछले दिनों liquidity absorption के लिए कई instruments का इस्तेमाल किया। 7 सितंबर की Reuters रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय बैंक ने एक दिन में 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक liquidity absorption operations के जरिए खींची थी, जबकि banking-system surplus उस समय रिकॉर्ड करीब 11.6 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।
इसके अलावा 30-day variable-rate reverse repo operation के जरिए भी बड़ी मात्रा में liquidity absorb करने की कोशिश की गई। बाजार में sell-buy FX swaps को भी एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा था।
अब Reuters के 9 सितंबर के संकेत बताते हैं कि RBI ने FX swap route का इस्तेमाल भी शुरू कर दिया है। इससे liquidity management और foreign-exchange intervention को एक साथ संभालने का रास्ता मिलता है।

प्रमुख पक्षकारों का रुख
Reuters के मुताबिक बैंकर्स और foreign-exchange brokers ने RBI की swap activity की जानकारी दी है। इनमें से कई market participants ने नाम सार्वजनिक न करने की शर्त पर जानकारी दी क्योंकि वे मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत नहीं थे।
RBI की ओर से Reuters के सवालों पर तत्काल आधिकारिक प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं थी। इसलिए इस खबर को “RBI ने आधिकारिक रूप से घोषणा की” के बजाय market participants की जानकारी और trading signals के आधार पर रिपोर्ट करना अधिक सटीक है।
बैंकिंग क्षेत्र पहले ही surplus liquidity को धीरे-धीरे absorb करने के लिए FX sell-buy swaps का सुझाव दे चुका था। 3 सितंबर की Reuters रिपोर्ट में बैंकर्स द्वारा RBI के साथ बैठक में इसी तरह के उपाय का प्रस्ताव दिए जाने की जानकारी दी गई थी।

उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?
उपलब्ध रिपोर्टिंग से तीन प्रमुख बातें सामने आती हैं। पहली, banking system में liquidity surplus असाधारण रूप से ऊंचे स्तर पर पहुंचा है। दूसरी, RBI ने liquidity absorption के लिए reverse repo सहित कई उपायों का इस्तेमाल किया है। तीसरी, market participants के मुताबिक केंद्रीय बैंक ने डॉलर-रुपया sell-buy swaps का इस्तेमाल भी शुरू किया है।
हालांकि 14–15 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा एक अनुमानित core liquidity surplus है और इसे RBI की आधिकारिक घोषणा के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए। Reuters की रिपोर्ट में इसे bankers और market sources के आकलन के तौर पर रखा गया है।
इसी तरह करीब 7 लाख करोड़ रुपये liquidity absorb करने का लक्ष्य भी विभिन्न policy tools के संभावित इस्तेमाल से जुड़ा अनुमान है। इसे किसी एक FX swap operation का निश्चित आकार नहीं माना जाना चाहिए।
संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं?
FX sell-buy swap का तत्काल उद्देश्य banking system से रुपये की अतिरिक्त liquidity को हटाना है। इससे money-market conditions पर दबाव संतुलित हो सकता है और RBI के policy corridor के भीतर short-term rates को बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
इसका currency market पर भी असर हो सकता है। RBI जब डॉलर बेचता है तो बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ती है और रुपये पर तत्काल दबाव कम हो सकता है। हालांकि रुपये की दिशा केवल RBI intervention से तय नहीं होती।
वैश्विक crude prices, विदेशी निवेश flows, डॉलर की अंतरराष्ट्रीय मजबूती और geopolitical tensions भी रुपये की exchange rate को प्रभावित करते हैं। 9 सितंबर को Brent crude 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जाने और मध्य-पूर्व के तनाव ने रुपये पर अतिरिक्त दबाव बनाया।

राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव
यह कदम मुख्य रूप से monetary और liquidity management से जुड़ा है, इसलिए इसे किसी राजनीतिक intervention के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
नीतिगत स्तर पर RBI के सामने संतुलन की चुनौती है। उसे ऐसी liquidity को absorb करना है जो interest rates को बहुत नीचे खींच सकती है, लेकिन साथ ही ऐसा करते समय credit conditions को अचानक बहुत कड़ा भी नहीं करना है।
यदि liquidity लगातार ऊंची बनी रहती है तो RBI को FX swaps, reverse repos, government securities operations और अन्य liquidity-management instruments के बीच संतुलन बनाना पड़ सकता है।

आर्थिक और सामाजिक असर
बैंकों के लिए पर्याप्त liquidity सामान्य तौर पर credit growth के लिए सकारात्मक हो सकती है। लेकिन जरूरत से ज्यादा liquidity money-market rates को दबा सकती है और monetary policy transmission को कमजोर कर सकती है।
दूसरी ओर liquidity absorption से short-term borrowing conditions कुछ सख्त हो सकती हैं। इसका असर आगे चलकर lending rates और credit availability पर पड़ सकता है, हालांकि तत्काल retail borrowers पर असर तय मानना उचित नहीं होगा।
रुपये की कमजोरी का आर्थिक असर भी महत्वपूर्ण है। भारत एक बड़ा crude-oil importer है। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो import bill बढ़ सकता है और inflationary pressure पर असर पड़ सकता है। 9 सितंबर की market movement में crude और geopolitical tensions को रुपये पर दबाव का प्रमुख कारण बताया गया।

अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रभाव
भारतीय रुपये की कमजोरी इस समय केवल घरेलू liquidity conditions का परिणाम नहीं है। मध्य-पूर्व में बढ़ता तनाव और crude prices में उछाल global currency markets को प्रभावित कर रहा है।
9 सितंबर को Brent crude 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया, जबकि भारत जैसे बड़े oil importer के लिए महंगा crude external balance और inflation दोनों के लिहाज से चुनौती पैदा कर सकता है।
ऐसे माहौल में RBI का FX intervention रुपये में अत्यधिक volatility को सीमित करने का एक माध्यम बन सकता है, लेकिन यह global oil shock को स्थायी रूप से खत्म नहीं कर सकता।

कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि RBI कितनी मात्रा में FX swaps कर रहा है और इनकी कुल maturity कितनी है। उपलब्ध Reuters reporting में कुछ market participants ने लगभग 700 मिलियन डॉलर के swaps का अनुमान दिया है, लेकिन इसे RBI की आधिकारिक disclosed transaction size नहीं माना जा सकता।
दूसरा सवाल यह है कि banking system में surplus liquidity कितने समय तक ऊंची बनी रहेगी। यदि विदेशी मुद्रा deposits और अन्य liquidity inflows जारी रहते हैं, तो RBI को बार-बार absorption operations करने पड़ सकते हैं।
तीसरा सवाल रुपये की दिशा से जुड़ा है। यदि crude oil prices और geopolitical tensions लंबे समय तक ऊंचे रहते हैं, तो liquidity management के बावजूद currency पर दबाव बना रह सकता है।

आगे क्या होगा?
आने वाले दिनों में बाजार RBI की liquidity operations, FX intervention और रुपये की movement पर नजर रखेगा। केंद्रीय बैंक जरूरत के अनुसार reverse repo operations, FX swaps और दूसरे liquidity-management instruments का इस्तेमाल कर सकता है।
यदि surplus liquidity कम होती है तो money-market conditions सामान्य हो सकती हैं। लेकिन यदि foreign-currency inflows और रुपये की liquidity लगातार बढ़ती है, तो RBI को अतिरिक्त absorption measures अपनाने पड़ सकते हैं।
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Apurva Choudhary

Apurva Choudhary

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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