अप्रैल २०२२ में १०० से अधिक थर्मल प्लांटों में कोयला स्टॉक क्रिटिकल स्तर से नीचे था। ५० से अधिक संयंत्रों में स्टॉक १० प्रतिशत से कम बताया गया।
लोकेशन
भारत
Date
5/9/26
By
Wasi Siddiqui
भारत के बिजली क्षेत्र में कोयला स्टॉक की कमी ने अप्रैल २०२२ में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी यानी सीईए के आंकड़ों के मुताबिक, देश के १०० से अधिक थर्मल पावर प्लांटों में कोयले का भंडार क्रिटिकल स्तर से नीचे पहुंच गया था। इनमें ५० से अधिक संयंत्र ऐसे थे जहां उपलब्ध स्टॉक जरूरी स्तर के १० प्रतिशत से भी कम रह गया था।
यह स्थिति इसलिए अहम थी क्योंकि उस दौर में भारत की बिजली व्यवस्था में कोयला आधारित उत्पादन की केंद्रीय भूमिका बनी हुई थी। बिजली की बढ़ती मांग, घरेलू कोयला आपूर्ति पर दबाव और आयातित कोयले की उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों ने उत्पादन व्यवस्था के सामने कई मुश्किलें खड़ी कर दी थीं।
कोयला स्टॉक संकट कितना गंभीर था
सीईए के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, १९ अप्रैल २०२२ तक घरेलू कोयले से चलने वाले थर्मल पावर प्लांटों की कुल उत्पादन क्षमता करीब १८२ गीगावाट थी और इन संयंत्रों में औसत कोयला स्टॉक लगभग ३४ प्रतिशत बताया गया था। आयातित कोयले पर आधारित करीब १६.७३ गीगावाट क्षमता वाले संयंत्रों में भी औसत स्टॉक लगभग ३४ प्रतिशत था।
इसी अवधि में १७३ थर्मल पावर प्लांटों के विश्लेषण में ८५ घरेलू कोयला आधारित संयंत्रों में स्टॉक २५ प्रतिशत के क्रिटिकल स्तर से नीचे बताया गया। आयातित कोयले से चलने वाले ११ संयंत्र भी क्रिटिकल श्रेणी में थे। कुछ संयंत्र संचालन से बाहर भी थे।
क्रिटिकल स्टॉक का मतलब क्या है
पावर सेक्टर में कोयले के स्टॉक को लेकर क्रिटिकल स्थिति का इस्तेमाल तब किया जाता है जब किसी संयंत्र में उपलब्ध ईंधन तय जरूरत के मुकाबले बहुत नीचे पहुंच जाता है। अप्रैल २०२२ की रिपोर्टिंग में २५ प्रतिशत से कम स्टॉक को क्रिटिकल स्तर के तौर पर संदर्भित किया गया था। ५० से अधिक संयंत्रों में स्टॉक १० प्रतिशत से भी नीचे पहुंचना इस दबाव की गंभीरता को दर्शाता था।
यह समझना जरूरी है कि क्रिटिकल स्टॉक का मतलब अपने आप बिजली उत्पादन बंद होना नहीं है। इसका अर्थ है कि संयंत्र के पास सामान्य संचालन को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए पर्याप्त ईंधन सुरक्षा मार्जिन नहीं है। यदि कोयले की नई खेप समय पर नहीं पहुंचे, तो उत्पादन क्षमता पर असर पड़ सकता है।
बिजली की मांग ने बढ़ाया दबाव
उस समय बिजली की मांग में लगातार इजाफा हो रहा था। उपलब्ध विश्लेषण के मुताबिक, भारत में बिजली की मासिक मांग २०१९ में करीब १०६.६ अरब यूनिट से बढ़कर २०२१ में १२४.२ अरब यूनिट तक पहुंच गई थी। २०२२ में यह मांग करीब १३२ अरब यूनिट मासिक स्तर तक पहुंचने का अनुमान दर्ज किया गया था।
मांग बढ़ने का सीधा असर थर्मल पावर प्लांटों पर पड़ा। ज्यादा बिजली उत्पादन के लिए ज्यादा कोयले की जरूरत हुई। यदि खदान से संयंत्र तक आपूर्ति की रफ्तार मांग के अनुरूप नहीं रहती, तो पावर स्टेशन का स्टॉक तेजी से घटता है।
सिर्फ कोयले की उपलब्धता ही समस्या नहीं
इस संकट को केवल देश में कोयला कम होने के नजरिये से देखना अधूरा होगा। असली चुनौती उत्पादन, परिवहन और पावर प्लांट तक समय पर आपूर्ति के पूरे नेटवर्क से जुड़ी होती है।
कोयला खदानों से निकलने के बाद उसे रेलवे रेक, सड़क या अन्य परिवहन माध्यमों से बिजली संयंत्रों तक पहुंचाना पड़ता है। किसी भी स्तर पर लॉजिस्टिक बाधा आने से प्लांट का स्टॉक प्रभावित हो सकता है।
अक्टूबर २०२१ के कोयला संकट के बाद केंद्र स्तर पर कारणों की समीक्षा की गई थी। उपलब्ध रिपोर्टों में भारी बारिश, कोयला उत्पादन में गिरावट, स्टॉक की अपर्याप्त तैयारी और आयातित कोयले से जुड़े व्यवधानों को आपूर्ति दबाव के कारणों में शामिल किया गया था।
आयातित कोयले की चुनौती
भारत के कुछ थर्मल पावर प्लांट आयातित कोयले पर निर्भर हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने या समुद्री परिवहन में व्यवधान आने पर इन संयंत्रों के लिए ईंधन जुटाना मुश्किल हो सकता है।
२०२२ के संकट में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में पैदा हुए असंतुलन ने भी आयातित ईंधन की लागत और उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ाई थी। ऐसे माहौल में घरेलू कोयले पर निर्भरता बढ़ने से घरेलू आपूर्ति श्रृंखला पर अतिरिक्त दबाव आया।
घरेलू उत्पादन और आपूर्ति का महत्व
भारत के ऊर्जा ढांचे में कोल इंडिया की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। घरेलू कोयला उत्पादन बढ़ाना सरकार की ऊर्जा रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा रहा है।
हालांकि उत्पादन बढ़ाना अकेला समाधान नहीं है। कोयला खदानों से बिजली संयंत्रों तक तेज और भरोसेमंद परिवहन व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। यदि उत्पादन बढ़े लेकिन रेलवे रेक या परिवहन क्षमता पर्याप्त न हो, तो पावर प्लांट के स्टॉक में अपेक्षित सुधार नहीं आएगा।
बिजली क्षेत्र पर संभावित असर
थर्मल पावर प्लांटों में कम कोयला स्टॉक का सबसे बड़ा जोखिम बिजली उत्पादन की निरंतरता से जुड़ा है। किसी संयंत्र में स्टॉक तेजी से खत्म होने की स्थिति में उत्पादन घटाना पड़ सकता है। कई संयंत्र एक साथ दबाव में आएं तो क्षेत्रीय बिजली आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।
इसका असर उद्योग, वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों और घरेलू उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। बिजली की कमी होने पर डिस्कॉम को मांग और उपलब्ध आपूर्ति के बीच संतुलन बनाने के लिए अतिरिक्त उपाय करने पड़ते हैं।
हालांकि किसी खास अवधि में बिजली कटौती का कारण केवल कोयला स्टॉक को बताना उचित नहीं होगा। ग्रिड की स्थिति, ट्रांसमिशन क्षमता, प्लांट आउटेज, मौसम और क्षेत्रीय मांग भी बिजली आपूर्ति को प्रभावित करते हैं।
सरकार के सामने चुनौती
सरकार के सामने उस समय दो समानांतर चुनौतियां थीं। पहली, थर्मल पावर प्लांटों तक पर्याप्त कोयला पहुंचाना। दूसरी, बढ़ती बिजली मांग के बीच उत्पादन क्षमता को उपलब्ध रखना।
इसके लिए कोल इंडिया से उत्पादन और डिस्पैच बढ़ाने, रेलवे के जरिए कोयला परिवहन में सुधार करने और पावर प्लांटों के स्टॉक की निगरानी मजबूत करने जैसे कदम महत्वपूर्ण थे।
लंबी अवधि में रणनीति
भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए कोयला आधारित बिजली अभी भी महत्वपूर्ण रही है। इसके साथ नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का विस्तार भी ऊर्जा नीति का प्रमुख हिस्सा है।
सौर और पवन ऊर्जा के विस्तार से बिजली उत्पादन के स्रोतों में विविधता आती है। लेकिन इन स्रोतों की उत्पादन क्षमता मौसम और समय पर निर्भर करती है। इसलिए बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण, मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क और मांग प्रबंधन की जरूरत बढ़ती है।
थर्मल पावर सेक्टर में भी बेहतर स्टॉक प्रबंधन जरूरी है। मानसून या मांग बढ़ने वाले महीनों से पहले पर्याप्त कोयला भंडार तैयार करना आपूर्ति जोखिम को कम करने में मदद करता है।
२०२२ के संकट से क्या सीख मिली
अप्रैल २०२२ का कोयला स्टॉक संकट भारत की ऊर्जा व्यवस्था के लिए एक अहम चेतावनी था। समस्या केवल खदानों में उपलब्ध कोयले की मात्रा से जुड़ी नहीं थी। बिजली की मांग, उत्पादन, परिवहन, आयात, स्टॉक प्रबंधन और मौसम जैसे कई कारक एक साथ काम कर रहे थे।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी दिखाया कि भारत जैसे बड़े ऊर्जा बाजार में बिजली सुरक्षा के लिए केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। ईंधन की उपलब्धता और उसकी समय पर डिलीवरी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सबसे जरूरी बात यह है कि ५० से अधिक थर्मल प्लांटों में १० प्रतिशत से कम स्टॉक वाला आंकड़ा अप्रैल २०२२ की स्थिति से संबंधित है। इसे वर्तमान २०२६ की स्थिति बताना सही नहीं होगा। २०२६ में कोयला स्टॉक से जुड़े आंकड़े अलग परिस्थितियों को दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए, जुलाई २०२६ में बिजली मंत्रालय ने बताया था कि १२ जुलाई तक थर्मल पावर प्लांटों के पास ४२.८ मिलियन टन कोयला स्टॉक था, जो ८५ प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर पर करीब १४ दिनों के लिए पर्याप्त बताया गया।
पाठकों के लिए इसका सीधा मतलब
भारत में बिजली की मांग बढ़ने के साथ थर्मल पावर की भूमिका आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण रहेगी। इसलिए कोयला आपूर्ति में किसी भी बड़े व्यवधान का असर व्यापक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा का स्थायी समाधान उत्पादन बढ़ाने के साथ बेहतर लॉजिस्टिक्स, पर्याप्त बफर स्टॉक, मजबूत ग्रिड, ऊर्जा भंडारण और नवीकरणीय स्रोतों के संतुलित विस्तार में है। अप्रैल २०२२ की स्थिति ने इसी व्यापक चुनौती को सामने रखा था।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।