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चैतर वसावा को गुजरात HC से राहत नहीं, 7 साल की सजा पर रोक की अर्जी खारिज

Mohammad Naved • 2026-09-07 12:37:17
चैतर वसावा को गुजरात HC से राहत नहीं, 7 साल की सजा पर रोक की अर्जी खारिज

गुजरात HC ने चैतर वसावा की जमानत और सात साल की सजा पर रोक की अर्जी खारिज की। विधायक फिलहाल जेल में हैं। विधानसभा सत्र में जाने के लिए पैरोल की अर्जी भी वापस ली गई।


लोकेशन

अहमदाबाद, गुजरात

डेट

7 सितंबर 2026

By Mohd Naved


गुजरात में आम आदमी पार्टी के विधायक चैतर वसावा को फिलहाल अदालत से राहत नहीं मिली है। गुजरात हाईकोर्ट ने वन विभाग के कर्मचारियों से मारपीट और जबरन वसूली से जुड़े मामले में उनकी सात साल की सजा पर रोक लगाने और जमानत देने की अर्जी खारिज कर दी। यह फैसला २४ अगस्त २०२६ को आया था।

चैतर वसावा नर्मदा जिले की डेडियापाड़ा विधानसभा सीट से विधायक हैं। जून २०२६ में राजपीपला की सत्र अदालत ने उन्हें और इस मामले में आठ अन्य दोषियों को सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद वसावा ने गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया था।

हाईकोर्ट से जमानत नहीं मिली

गुजरात हाईकोर्ट की एकल पीठ ने चैतर वसावा की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनकी सजा पर रोक और जमानत की मांग अस्वीकार कर दी। अदालत ने मामले के रिकॉर्ड, उनकी पूर्व कानूनी पृष्ठभूमि और कथित आचरण को अपने फैसले में महत्वपूर्ण माना।

अदालत ने यह भी कहा कि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि से अपेक्षा होती है कि वह विवाद की स्थिति में संबंधित लोगों को कानूनी रास्ता अपनाने की सलाह दे। अदालत के मुताबिक रिकॉर्ड में प्रथम दृष्टया ऐसे तथ्य मौजूद हैं जिनसे सरकारी कर्मचारियों पर दबाव डालने और उन्हें डराने-धमकाने के आरोप सामने आते हैं।

क्या है पूरा मामला

मामला वर्ष २०२३ का है और नर्मदा जिले के डेडियापाड़ा इलाके से जुड़ा है। अभियोजन के मुताबिक वन विभाग की जमीन पर कथित अतिक्रमण और खेती को लेकर विवाद हुआ था। वन विभाग ने सरकारी जमीन पर की गई खेती को हटाने की कार्रवाई की थी।

इसके बाद वन विभाग के कुछ कर्मचारियों को चैतर वसावा के आवास पर बुलाए जाने का आरोप है। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि वहां कर्मचारियों के साथ मारपीट, धमकी और जबरन वसूली की गई। मामले में हवाई फायरिंग का आरोप भी लगाया गया था।

मामले की जांच के बाद पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया और मुकदमा राजपीपला की सत्र अदालत में चला। २३ जून २०२६ को अदालत ने चैतर वसावा समेत नौ लोगों को दोषी ठहराते हुए सात-सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने प्रत्येक दोषी पर २५ हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।

अन्य आरोपियों को मिली राहत

इसी मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने जुलाई २०२६ में चैतर वसावा की पत्नी शकुंतला वसावा समेत पांच दोषियों को जमानत दी थी। अदालत ने उनके बारे में कहा था कि वे मुख्य आरोपी नहीं थे और उनके खिलाफ किसी व्यक्ति को चोट पहुंचाने की प्रत्यक्ष भूमिका सामने नहीं आई थी।

इसके बाद चैतर वसावा की अपनी जमानत याचिका पर अगस्त में सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने उनकी अर्जी खारिज कर दी। उनके निजी सहायक की जमानत याचिका भी खारिज हुई, जबकि मामले के एक अन्य आरोपी को राहत मिली।

विधानसभा सत्र में जाने की कोशिश

जमानत अर्जी खारिज होने के बाद चैतर वसावा ने गुजरात विधानसभा के मानसून सत्र में शामिल होने के लिए पैरोल की मांग की थी। विधानसभा का सत्र ९ से ११ सितंबर २०२६ तक प्रस्तावित है।

२ सितंबर को गुजरात हाईकोर्ट में उनकी पैरोल याचिका पर सुनवाई हुई। अदालत ने याचिका की प्रक्रिया और उसके अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवाल उठाए। इसके बाद वसावा के वकील ने अर्जी वापस लेने की अनुमति मांगी। अदालत ने अर्जी वापस लेने की अनुमति देते हुए कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी के सामने आवेदन करने की छूट दी।

अदालत ने अस्थायी जमानत के विकल्प की ओर भी संकेत किया था। इसका अर्थ यह नहीं है कि उस तारीख तक चैतर वसावा को सात दिन की अस्थायी जमानत मंजूर हो चुकी थी। उपलब्ध ताज़ा रिपोर्ट में ऐसी कोई मंजूरी दर्ज नहीं है।

विधायक पद पर भी सवाल

चैतर वसावा की सजा के बाद उनके विधानसभा सदस्य बने रहने का मुद्दा भी चर्चा में है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार गुजरात विधानसभा की ओर से उनकी अयोग्यता की औपचारिक प्रक्रिया उस समय तक पूरी नहीं हुई थी। वहीं उनकी दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगी है।

यह स्थिति इसलिए अहम है क्योंकि किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि की दोषसिद्धि के बाद सदस्यता और अयोग्यता से जुड़े संवैधानिक तथा वैधानिक प्रावधान लागू होते हैं। अंतिम स्थिति संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया और अदालत के आगे के आदेशों पर निर्भर करेगी।

अदालत के फैसले का व्यापक संदर्भ

चैतर वसावा मामले में अदालत की टिप्पणी केवल जमानत के सवाल तक सीमित नहीं रही। हाईकोर्ट ने जनप्रतिनिधियों के आचरण और कानून के पालन से जुड़ी अपेक्षाओं को भी अपने आदेश में महत्व दिया।

अदालत ने माना कि निर्वाचित प्रतिनिधि से सार्वजनिक पद की गरिमा के अनुरूप व्यवहार की अपेक्षा रहती है। हालांकि अदालत का आदेश मामले की न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और आरोपों तथा अभियोजन के दावों को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

वर्तमान स्थिति

७ सितंबर २०२६ तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर चैतर वसावा को २४ अगस्त के हाईकोर्ट आदेश में नियमित जमानत नहीं मिली है। सात साल की सजा भी प्रभावी है। २ सितंबर को विधानसभा सत्र में शामिल होने के लिए दायर पैरोल याचिका वापस ली जा चुकी है।

इसलिए “गुजरात HC से चैतर वसावा को ७ दिन की अस्थायी जमानत मिल गई” शीर्षक को प्रकाशित करने से पहले आधिकारिक अदालत आदेश या जेल प्रशासन की नई पुष्टि जरूरी होगी।

आगे क्या

अब चैतर वसावा के लिए अगला कानूनी रास्ता सजा के खिलाफ अपील और उपयुक्त अंतरिम राहत की मांग से जुड़ा है। विधानसभा सत्र में शामिल होने के लिए भी उन्हें कानून में निर्धारित प्रक्रिया के तहत सक्षम प्राधिकारी या अदालत से अनुमति हासिल करनी होगी।

मामले का अंतिम कानूनी परिणाम आगे की अपील और न्यायिक कार्यवाही पर निर्भर करेगा। फिलहाल उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों में सात दिन की अस्थायी जमानत की पुष्टि नहीं है। यही तथ्यात्मक स्थिति पाठकों तक पहुंचाना जरूरी है।

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Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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