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दिल्ली सॉकर एसोसिएशन चुनाव 6 सितंबर तय, गुटबाजी तेज

Asif Khan 2026-08-10 16:56:13
दिल्ली सॉकर एसोसिएशन चुनाव 6 सितंबर तय, गुटबाजी तेज
  • डीएसए चुनाव 6 सितंबर, दो गुट आमने-सामने
  • दिल्ली फुटबॉल में टकराव, डीएसए चुनाव पर विवाद
  • डीएसए चुनाव तारीख पर घमासान, गुटबाजी खुलकर सामने

  • दिल्ली सॉकर एसोसिएशन ने 6 सितंबर को चुनाव का ऐलान किया है, लेकिन एक अन्य गुट 24 अगस्त पर अड़ा है। दोनों पक्ष समर्थन का दावा कर रहे हैं। मामला अब एआईएफएफ की मंजूरी और हस्तक्षेप पर टिका है।


    📍 नई दिल्ली
    📰 10 अगस्त 2026
    ✍️ By Asif Khan


    दिल्ली सॉकर एसोसिएशन चुनाव: विवाद की नई पारी

    दिल्ली सॉकर एसोसिएशन चुनाव को लेकर राजधानी की फुटबॉल सियासत एक बार फिर तनाव में है। एसोसिएशन के अध्यक्ष अनुज गुप्ता की अगुआई में 6 सितंबर को चुनाव कराने की घोषणा हुई है। इसी के साथ एक दूसरा गुट 24 अगस्त को चुनाव कराने पर अड़ा हुआ है। दोनों पक्ष अपने-अपने दावे कर रहे हैं। यह टकराव अब संस्थागत वैधता और एआईएफएफ की मान्यता पर केंद्रित हो गया है।

    यह विवाद केवल तारीख का नहीं है। यह दिल्ली फुटबॉल के प्रशासनिक कंट्रोल, संसाधनों के इस्तेमाल और संस्थागत पारदर्शिता से जुड़ा मसला बन चुका है।

    नया संविधान और एआईएफएफ की भूमिका

    विशेष आम सभा में डीएसए ने ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन के नए दिशा-निर्देशों के अनुरूप नया संविधान अपनाने की बात कही। यह कदम प्रशासनिक सुधार और संरचनात्मक बदलाव के तौर पर पेश किया गया है।

    एआईएफएफ के गाइडलाइंस के तहत राज्य इकाइयों को अपने संविधान में संशोधन करना होता है। इसमें चुनाव प्रक्रिया, पदाधिकारियों का कार्यकाल और पारदर्शिता से जुड़े प्रावधान शामिल होते हैं।

    अब असली सवाल यह है कि एआईएफएफ किस गुट को मान्यता देता है। यही फैसला चुनाव की वैधता तय करेगा।

    गुटबाजी का खुला प्रदर्शन

    दिल्ली फुटबॉल में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार टकराव अधिक खुलकर सामने आया है।

    बीएस मेहरा गुट के साथ कोषाध्यक्ष लियाकत अली, सुशांत देव, मगन सिंह पटवाल और हेमचंद जैसे नाम जुड़े हैं। उपाध्यक्ष शराफत उल्लाह और स्क्वाड्रन लीडर एसके सिंह भी इसी पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।

    दूसरी तरफ अनुज गुप्ता का गुट है, जो अपने पुराने सहयोगियों के साथ खड़ा है। यह धड़ा खुद को संस्थागत निरंतरता और प्रशासनिक अनुभव का प्रतिनिधि बता रहा है।

    आरोप और बचाव का दौर

    कोषाध्यक्ष लियाकत अली द्वारा डीएसए के बैंक खातों को फ्रीज करने का मुद्दा विवाद का केंद्र बन गया है। अनुज गुप्ता ने इस कदम को गलत करार दिया है। उनका कहना है कि इससे एसोसिएशन की रोजमर्रा की गतिविधियां प्रभावित हुईं।

    दूसरी तरफ वित्तीय पारदर्शिता को लेकर सवाल भी उठे हैं। हालांकि अनुज गुप्ता ने सभी आरोपों को निराधार बताया है। उन्होंने दावा किया कि फुटबॉल गतिविधियों को जारी रखने के लिए उन्होंने निजी संसाधनों का इस्तेमाल किया।

    उनका कहना है कि सुदेवा अकादमी का ग्राउंड मुफ्त में उपलब्ध कराया गया, ताकि लीग और ट्रेनिंग प्रभावित न हो।

    कार्यकाल और उपलब्धियों का दावा

    अनुज गुप्ता ने अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बनाया है। उनके अनुसार सभी लीग मुकाबलों का आयोजन चुनौतीपूर्ण था, जिसे सफलतापूर्वक पूरा किया गया।

    सब-जूनियर, जूनियर और सीनियर टीमों पर निवेश का भी हवाला दिया गया। उनका दावा है कि इन निवेशों के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।

    हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है। विरोधी गुट प्रशासनिक फैसलों और संसाधनों के इस्तेमाल पर सवाल उठाता रहा है।

    ऐतिहासिक संदर्भ और पुरानी दरारें

    दिल्ली फुटबॉल में गुटबाजी का इतिहास लंबा है। लगभग पांच दशक पहले भी इसी तरह का विवाद सामने आया था। उस दौर में भी प्रशासनिक विभाजन ने खेल के विकास को प्रभावित किया था।

    वर्तमान स्थिति उसी पुराने पैटर्न की पुनरावृत्ति जैसी दिखती है। इससे यह संकेत मिलता है कि संस्थागत सुधार अभी अधूरा है।

    क्यों अहम है यह विवाद

    यह विवाद केवल एसोसिएशन के भीतर का संघर्ष नहीं है। इसका सीधा असर खिलाड़ियों, क्लबों और स्थानीय लीग पर पड़ता है।

    यदि दो समानांतर चुनाव होते हैं, तो वैधता का संकट पैदा हो सकता है। इससे खिलाड़ियों के चयन, टूर्नामेंट आयोजन और फंडिंग प्रभावित हो सकती है।

    फुटबॉल प्रशासन में अस्थिरता का असर जमीनी स्तर पर खेल के विकास पर पड़ता है।

    अलग-अलग नजरिए

    अनुज गुप्ता गुट इसे सुधार और निरंतरता का मामला बता रहा है। उनका फोकस एआईएफएफ के दिशा-निर्देशों के अनुरूप संस्थागत ढांचे को मजबूत करना है।

    वहीं मेहरा गुट इसे पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मुद्दा मानता है। उनका कहना है कि चुनाव जल्द कराया जाना चाहिए और मौजूदा नेतृत्व पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।

    दोनों पक्षों के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन स्वतंत्र ऑडिट और संस्थागत समीक्षा की जरूरत महसूस होती है।

    राजनीतिक और संस्थागत असर

    खेल संस्थाओं में गुटबाजी अक्सर राजनीतिक समर्थन से भी जुड़ जाती है। हालांकि इस मामले में प्रत्यक्ष राजनीतिक हस्तक्षेप सामने नहीं आया है, लेकिन प्रशासनिक फैसलों में प्रभाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

    एआईएफएफ की भूमिका यहां निर्णायक बनती है। यदि वह स्पष्ट दिशा नहीं देता, तो विवाद लंबा खिंच सकता है।

    आर्थिक पहलू

    डीएसए के बैंक खाते फ्रीज होने का असर सीधे संचालन पर पड़ा है। लीग आयोजन, खिलाड़ियों की सुविधा और स्टाफ भुगतान जैसे मुद्दे प्रभावित हो सकते हैं।

    अगर यह स्थिति जारी रहती है, तो स्पॉन्सरशिप और निवेश पर भी असर पड़ सकता है। इससे दिल्ली फुटबॉल की आर्थिक संरचना कमजोर हो सकती है।

    आगे क्या

    आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल एआईएफएफ के फैसले का है। वही तय करेगा कि कौन सा चुनाव वैध माना जाएगा।

    अगर दोनों गुट समझौते की दिशा में नहीं आते, तो मामला कानूनी विवाद तक जा सकता है। इससे चुनाव प्रक्रिया और लंबी खिंच सकती है।

    दिल्ली फुटबॉल के हित में संस्थागत स्पष्टता और पारदर्शिता जरूरी है। अन्यथा गुटबाजी का यह दौर खेल के विकास को पीछे धकेल सकता है।


    दिल्ली सॉकर एसोसिएशन चुनाव अब सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहा। यह संस्थागत विश्वसनीयता, पारदर्शिता और नियंत्रण की लड़ाई बन गया है।

    जब तक एआईएफएफ स्पष्ट रुख नहीं लेता, स्थिति अनिश्चित बनी रहेगी। इस पूरे विवाद का असर अंततः खिलाड़ियों और खेल पर पड़ेगा

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    Asif Khan

    Asif Khan

    Shah Times Reporter

    शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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