मुजफ्फरनगर आईआईए ने दिवाला मामलों में अति सूक्ष्म और लघु उद्योगों के बकाये को प्राथमिकता, न्यूनतम भुगतान, जीएसटी समायोजन और पारदर्शिता की मांग उठाई।
📍 मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश
🗓️ 09 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui
दिवाला मामलों में छोटे उद्योगों के भुगतान का मुद्दा
मुजफ्फरनगर में इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन यानी आईआईए ने दिवाला और दिवालियापन मामलों में सूक्ष्म और लघु उद्योगों के वित्तीय हितों को लेकर केंद्र सरकार से व्यापक कानूनी सुधार की मांग की है। संगठन का कहना है कि किसी बड़े खरीदार या उद्योग के दिवाला प्रक्रिया में जाने पर छोटे सप्लायरों का बकाया लंबे समय तक अटक सकता है।
आईआईए मुजफ्फरनगर चैप्टर के चेयरमैन अमित जैन की ओर से केंद्रीय वित्त मंत्री को भेजे गए पत्र में दिवाला एवं दिवालियापन संहिता और राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण से जुड़े प्रावधानों में बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है। संगठन ने अति सूक्ष्म और लघु इकाइयों के दावों को अधिक प्रभावी सुरक्षा देने की मांग की है।
कार्यशील पूंजी पर पड़ता है असर
आईआईए के मुताबिक छोटे उद्योगों के लिए ग्राहकों से मिलने वाला भुगतान उनकी कार्यशील पूंजी का अहम हिस्सा होता है। भुगतान अटकने से कच्चे माल की खरीद, मजदूरी और रोजमर्रा के कारोबारी खर्च प्रभावित हो सकते हैं।
अमित जैन ने कहा कि छोटे उद्योग का बकाया केवल एक कारोबारी बिल नहीं होता। उनके मुताबिक यह उद्योग की कार्यशील पूंजी और उसके संचालन से जुड़ा महत्वपूर्ण वित्तीय संसाधन है। उन्होंने दिवाला प्रक्रिया में सूक्ष्म और लघु उद्योगों को सामान्य लेनदार की स्थिति से अलग सुरक्षा देने की आवश्यकता जताई।
जीएसटी भुगतान को लेकर भी चिंता
आईआईए सहारनपुर मंडल के चेयरमैन पवन कुमार गोयल ने बैठक में वस्तु एवं सेवा कर से जुड़े पहलू को भी प्रमुखता से उठाया। उनका कहना था कि कारोबारी माल की आपूर्ति के बाद कर संबंधी दायित्व पूरा करता है, लेकिन खरीदार के दिवाला प्रक्रिया में जाने पर मूल भुगतान अटक सकता है।
आईआईए ने इसी आधार पर कर कानून और दिवाला कानून के बीच बेहतर समन्वय की मांग की है। संगठन चाहता है कि जिस आपूर्ति का भुगतान दिवाला प्रक्रिया के कारण नहीं मिल पाया, उससे जुड़े पहले से जमा कर के लिए वापसी या समायोजन की स्पष्ट व्यवस्था हो।
आईआईए की 6 प्रमुख मांगें
आईआईए ने अपने प्रस्ताव में अति सूक्ष्म और लघु उद्योगों के बकाये को दिवाला प्रक्रिया में विशेष प्राथमिकता देने की मांग की है। संगठन का सुझाव है कि इनके दावों को कर्मकार देय की तरह उच्च प्राथमिकता वाली श्रेणी में रखा जाए।
दूसरी मांग न्यूनतम सुरक्षित भुगतान की है। आईआईए के अनुसार समाधान योजना या परिसमापन से मिलने वाली राशि में अति सूक्ष्म और लघु इकाइयों के लिए न्यूनतम भुगतान का प्रावधान होना चाहिए।
तीसरी मांग अधिकरण की कार्यवाही में छोटे उद्योगों के हितों की प्रभावी पैरवी से जुड़ी है। संगठन ने अति सूक्ष्म और लघु इकाइयों की ओर से आवाज रखने के लिए अधिकृत प्रतिनिधि या सुविधादाता की व्यवस्था का सुझाव दिया है।
चौथी मांग सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 और दिवाला एवं दिवालियापन संहिता के बीच कानूनी समन्वय की है। आईआईए का कहना है कि एमएसएमई को उपलब्ध भुगतान सुरक्षा अधिकारों को दिवाला प्रक्रिया में भी प्रभावी मान्यता मिलनी चाहिए।
पांचवीं मांग कर व्यवस्था से संबंधित है। संगठन ने ऐसे मामलों में पहले जमा किए गए वस्तु एवं सेवा कर की वापसी या समायोजन की व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव रखा है, जहां आपूर्ति का भुगतान दिवाला प्रक्रिया के कारण प्राप्त नहीं हुआ।
छठी मांग समाधान प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने की है। आईआईए चाहता है कि समाधान पेशेवरों द्वारा अति सूक्ष्म और लघु उद्योगों के दावों का समयबद्ध निपटारा किया जाए और समाधान योजना के तहत उन्हें मिलने वाली राशि की स्पष्ट जानकारी दी जाए।
केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को भेजा गया प्रस्ताव
आईआईए के अनुसार मांग पत्र केवल वित्त मंत्रालय तक सीमित नहीं रखा गया है। इसे प्रधानमंत्री, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय, कंपनी कार्य मंत्रालय, दिवाला एवं दिवालियापन बोर्ड, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और प्रमुख सचिव, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम को भी भेजा गया है।
संगठन ने सरकार से इन प्रस्तावों पर जल्द विचार करने की अपील की है। आईआईए ने कहा है कि मांगों पर निर्णय नहीं होने की स्थिति में देशभर के सूक्ष्म और लघु उद्यमियों को आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। यह संगठन की ओर से व्यक्त किया गया रुख है।
मुजफ्फरनगर में हुई मंथन बैठक
इन मुद्दों को लेकर आईआईए कार्यालय में मंथन बैठक आयोजित की गई। बैठक में सहारनपुर मंडल के चेयरमैन पवन कुमार गोयल, पूर्व चेयरमैन विपुल भटनागर, सचिव राहुल मित्तल और कोषाध्यक्ष सुधीर अग्रवाल मौजूद रहे।
इसके अलावा उद्योग बंधु एवं पावर कमेटी के चेयरमैन दीपक सिंगल, पब्लिक रिलेशन कमेटी के चेयरमैन राज शाह, युवा विंग कैप्टन अनमोल अग्रवाल, प्रेरक जैन, नमन जैन, शरद जैन, अर्णव अग्रवाल और एडवोकेट तुषार गुप्ता समेत अन्य सदस्य उपस्थित रहे।
छोटे उद्योगों के लिए क्यों अहम है मुद्दा
दिवाला प्रक्रिया में भुगतान की प्राथमिकता किसी भी आपूर्तिकर्ता की वित्तीय स्थिति पर सीधा असर डालती है। बड़े कारोबारी समूहों की तुलना में छोटे उद्योगों के पास लंबे समय तक भुगतान अटके रहने की स्थिति से निपटने के लिए सीमित वित्तीय गुंजाइश रहती है।
आईआईए की मौजूदा मांग इसी वित्तीय जोखिम को कम करने पर केंद्रित है। संगठन विशेष प्राथमिकता, न्यूनतम सुरक्षित भुगतान और कर समायोजन जैसे उपायों के जरिए छोटे उद्योगों के लिए अधिक स्पष्ट सुरक्षा चाहता है।
हालांकि, इन प्रस्तावों को लागू करने के लिए केंद्र सरकार को मौजूदा दिवाला कानून, एमएसएमई भुगतान प्रावधानों और कर व्यवस्था के बीच कानूनी एवं वित्तीय प्रभावों का परीक्षण करना होगा। सरकार की ओर से इन मांगों पर किसी निर्णय या प्रस्तावित संशोधन की जानकारी इस समाचार सामग्री में उपलब्ध नहीं है।
अब सरकार के रुख पर नजर
आईआईए ने अपने प्रस्ताव में छोटे उद्योगों के बकाये को दिवाला प्रक्रिया में अधिक सुरक्षित बनाने की मांग रखी है। साथ ही संगठन ने भुगतान और कर देयता के बीच पैदा होने वाली समस्या के समाधान की जरूरत बताई है।
अब निगाह केंद्र सरकार और संबंधित संस्थानों की प्रतिक्रिया पर रहेगी। यदि इन प्रस्तावों पर औपचारिक विचार शुरू होता है, तो दिवाला मामलों में एमएसएमई लेनदारों की स्थिति, भुगतान प्राथमिकता और जीएसटी समायोजन जैसे मुद्दों पर व्यापक नीति विमर्श की राह खुल सकती है