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आजम खान पर ED का शिकंजा, छापेमारी पर विपक्ष ने BJP को घेरा

Asif Khan • 2026-08-19 13:18:08
आजम खान पर ED का शिकंजा, छापेमारी पर विपक्ष ने BJP को घेरा
  • आजम खान के ठिकानों पर ED की दस्तक, विपक्ष का पलटवार
  • जौहर यूनिवर्सिटी फिर जांच के घेरे में, सियासत तेज
  • ED की कार्रवाई पर विपक्ष का आरोप, राजनीतिक बदले की राजनीति

  • ईडी ने आजम खान, मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े करीब 10 ठिकानों पर तलाशी ली। कार्रवाई धनशोधन जांच से जुड़ी बताई गई है। विपक्ष ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया। यूनिवर्सिटी पहले से 38 इमारतों के ध्वस्तीकरण विवाद में है। मामला अब कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर अहम है।


    स्थान: लखनऊ, रामपुर, सहारनपुर और दिल्ली
    तारीख: 19 अगस्त 2026
    बाय:Mohd Naved

    आजम खान पर ED का शिकंजा, विपक्ष ने BJP को घेरा

    आजम खान से जुड़े मामलों में प्रवर्तन निदेशालय की नई कार्रवाई ने उत्तर प्रदेश की सियासत को फिर गर्म कर दिया है। 19 अगस्त को ईडी ने समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान, मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े करीब 10 ठिकानों पर तलाशी ली। कार्रवाई रामपुर और सहारनपुर के अलावा दिल्ली में भी हुई। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक जांच धनशोधन और कथित वित्तीय लेनदेन से जुड़े पहलुओं पर केंद्रित है।

    इस कार्रवाई के बाद समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर निशाना साधा। विपक्षी नेताओं ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया, जबकि ईडी की कार्रवाई को जांच एजेंसी की वैधानिक कार्रवाई के तौर पर रिपोर्ट किया गया है। आरोप और जांच के निष्कर्षों को अलग-अलग रखना इस मामले में अहम है।

    क्या हुआ?

    ईडी ने बुधवार को आजम खान से जुड़े परिसरों के साथ मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट और मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी से संबंधित परिसरों की तलाशी ली। रिपोर्टों के अनुसार कुल करीब 10 स्थानों पर कार्रवाई हुई। इनमें उत्तर प्रदेश के रामपुर और सहारनपुर तथा दिल्ली के इलाके शामिल हैं।

    द स्टेट्समैन की रिपोर्ट के अनुसार ईडी की लखनऊ जोनल टीम ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत तलाशी कार्रवाई की। जांच में कथित तौर पर सरकारी ठेकों की रकम के निजी ठेकेदारों के जरिये डायवर्जन और उसके बाद ट्रस्ट तथा यूनिवर्सिटी से जुड़े परिसंपत्ति निर्माण में इस्तेमाल की जांच की जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक वित्तीय रिकॉर्ड, दस्तावेज और डिजिटल साक्ष्य तलाशे जा रहे हैं।

    इन आरोपों का अंतिम निर्धारण जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया से होगा। तलाशी को अपने आप में दोष सिद्धि नहीं माना जा सकता।

    पूरा संदर्भ क्या है?

    आजम खान और मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी लंबे समय से उत्तर प्रदेश की राजनीति और कानूनी विवादों के केंद्र में रहे हैं। रामपुर में 2006 में स्थापित यूनिवर्सिटी को आजम खान की प्रमुख संस्थागत परियोजनाओं में गिना जाता है।

    हाल के महीनों में यूनिवर्सिटी पर प्रशासनिक और नियामकीय दबाव बढ़ा है। रामपुर विकास प्राधिकरण ने परिसर की 40 में से 38 इमारतों को कथित तौर पर स्वीकृत नक्शे के बिना निर्मित बताते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया था।

    जुलाई के अंत में इस कार्रवाई को फिलहाल अंतरिम राहत मिली। मुरादाबाद मंडल आयुक्त ने ध्वस्तीकरण पर रोक लगाई थी, जिसके बाद यूनिवर्सिटी को तत्काल बुलडोजर कार्रवाई से राहत मिली।

    इसलिए 19 अगस्त की ईडी कार्रवाई को उस व्यापक विवाद से अलग करके देखना मुश्किल है। हालांकि दोनों कार्रवाइयों का कानूनी आधार अलग है। ध्वस्तीकरण विवाद मुख्यतः निर्माण स्वीकृति और शहरी नियोजन से जुड़ा है, जबकि ईडी की मौजूदा कार्रवाई धनशोधन जांच से संबंधित बताई गई है।

    पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

    जौहर यूनिवर्सिटी के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई का एक अहम आधार कथित तौर पर भवन निर्माण की स्वीकृतियों से जुड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार रामपुर विकास प्राधिकरण ने 38 इमारतों को बिना मंजूर नक्शे के निर्मित बताया था। प्राधिकरण ने इन संरचनाओं को हटाने के लिए समयसीमा भी तय की थी।

    यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इस कार्रवाई का विरोध किया और कानूनी रास्ता अपनाया। उसका पक्ष रहा है कि निर्माण का बड़ा हिस्सा उस समय हुआ जब मौजूदा नियामकीय व्यवस्था और अधिकार क्षेत्र की स्थिति अलग थी। यह दावा विवादित है और संबंधित कानूनी प्रक्रिया में इसका परीक्षण होना बाकी है।

    27 जुलाई को मुरादाबाद मंडल आयुक्त ने ध्वस्तीकरण पर अंतरिम रोक लगा दी। इससे प्रशासन और यूनिवर्सिटी के बीच विवाद तत्काल ध्वस्तीकरण से हटकर कानूनी सुनवाई के अगले चरण में पहुंच गया।

    अब ईडी की तलाशी ने मामले में वित्तीय जांच का एक नया आयाम जोड़ दिया है।

    प्रमुख पक्षकारों का रुख

    समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष वर्मा ने ईडी की कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध से जोड़ते हुए भाजपा पर पिछली सरकारों से जुड़े नेताओं को निशाना बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि भाजपा सरकार के पास जनता को देने के लिए नया एजेंडा नहीं है और इसलिए विपक्षी नेताओं को परेशान किया जा रहा है।

    सपा नेता उदयवीर सिंह ने भी ईडी और सीबीआई की कार्रवाइयों को राजनीतिक बदले की भावना से जोड़ने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि आजम खान और उनके समर्थकों को लंबे समय से विभिन्न मामलों में निशाना बनाया जा रहा है।

    उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने भी कार्रवाई को आजम खान को कमजोर करने की कोशिश बताया।

    इन बयानों को विपक्ष का राजनीतिक पक्ष माना जाना चाहिए। इनके समर्थन में स्वतंत्र प्रमाण इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं हैं।

    दूसरी तरफ ईडी की कार्रवाई से जुड़े अधिकारियों के हवाले से रिपोर्टिंग में वित्तीय लेनदेन और कथित धनशोधन की जांच का उल्लेख है। एजेंसी के जांच निष्कर्ष अभी सार्वजनिक रूप से पूरी तरह सामने नहीं आए हैं।

    उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?

    इस समय तीन अलग-अलग स्तरों को अलग रखना जरूरी है।

    पहला, ईडी ने तलाशी कार्रवाई की है। कई रिपोर्टों में करीब 10 परिसरों में कार्रवाई की पुष्टि हुई है।

    दूसरा, जांच कथित तौर पर सरकारी ठेकों की रकम, निजी ठेकेदारों और जौहर ट्रस्ट तथा यूनिवर्सिटी से जुड़े वित्तीय लेनदेन पर केंद्रित है। यह जांच का आरोपित आधार है, अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं।

    तीसरा, जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को लेकर अलग प्रशासनिक विवाद पहले से चल रहा है। इस मामले में ध्वस्तीकरण कार्रवाई पर अंतरिम रोक लग चुकी है।

    इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईडी की तलाशी से कोई वित्तीय अपराध सिद्ध हो गया है। जांच के दौरान बरामद दस्तावेज और डिजिटल सामग्री के आधार पर आगे की कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होगी।

    संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं?

    ईडी की कार्रवाई से आजम खान और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े कानूनी मामलों का दायरा बढ़ सकता है। यदि जांच एजेंसी को वित्तीय अनियमितताओं से संबंधित ठोस साक्ष्य मिलते हैं, तो मामला आगे गिरफ्तारी, संपत्ति संबंधी कार्रवाई या अभियोजन तक जा सकता है। फिलहाल ऐसी किसी आगामी कार्रवाई को निश्चित मानना उचित नहीं होगा।

    दूसरी तरफ यदि तलाशी के बाद कोई ठोस वित्तीय अनियमितता सामने नहीं आती, तो विपक्ष अपने राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप को और मजबूती से उठाने की कोशिश करेगा।

    यानी अगला महत्वपूर्ण चरण ईडी की तलाशी से ज्यादा उसके बाद की जांच और आधिकारिक निष्कर्ष होंगे।

    राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव

    उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजम खान का मामला केवल एक नेता से जुड़ा कानूनी विवाद नहीं है। रामपुर और आसपास के इलाकों में इसका राजनीतिक असर लंबे समय से दिखाई देता रहा है।

    जौहर यूनिवर्सिटी का विवाद भी इसी वजह से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। सपा इसे शिक्षा और संस्थागत अधिकारों के सवाल से जोड़ रही है, जबकि प्रशासनिक कार्रवाई निर्माण नियमों और वैधानिक अनुपालन के संदर्भ में आगे बढ़ी है।

    इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह रहेगा कि क्या कानून का इस्तेमाल सभी संस्थानों पर समान मानदंडों के साथ हो रहा है। इसका जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि आदेशों, दस्तावेजों और न्यायिक फैसलों से मिलेगा।

    आर्थिक और सामाजिक असर

    जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़ी कार्रवाई का सीधा असर वहां पढ़ने वाले छात्रों और कर्मचारियों पर पड़ सकता है। 38 इमारतों के ध्वस्तीकरण का प्रस्ताव पहले ही छात्रों के बीच चिंता पैदा कर चुका है।

    किसी भी शैक्षणिक संस्थान से जुड़े नियामकीय विवाद में सबसे संवेदनशील पक्ष विद्यार्थी होते हैं। प्रशासनिक या कानूनी कार्रवाई का अंतिम असर उनकी पढ़ाई, परीक्षा, डिग्री और भविष्य की शैक्षणिक निरंतरता पर नहीं पड़ना चाहिए।

    इसी वजह से विवाद का समाधान पारदर्शी दस्तावेजी प्रक्रिया और समयबद्ध कानूनी सुनवाई के जरिये होना महत्वपूर्ण है।

    अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रभाव

    इस मामले का प्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय असर सीमित है। हालांकि अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े एक बड़े निजी विश्वविद्यालय पर सरकारी कार्रवाई का मुद्दा मानवाधिकार, संस्थागत स्वायत्तता और कानून के समान अनुप्रयोग से जुड़े व्यापक विमर्श में जगह बना सकता है।

    क्षेत्रीय स्तर पर इसका प्रभाव ज्यादा महत्वपूर्ण है। रामपुर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक संवेदनशील राजनीतिक और सामाजिक केंद्र है। आजम खान से जुड़े घटनाक्रम यहां की राजनीतिक लामबंदी और सपा के स्थानीय संगठन को प्रभावित कर सकते हैं।

    कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि ईडी की तलाशी में कौन से दस्तावेज या डिजिटल साक्ष्य मिले।

    दूसरा सवाल यह है कि जिन कथित वित्तीय लेनदेन की जांच हो रही है, उनका जौहर ट्रस्ट या यूनिवर्सिटी से संबंध किस स्तर तक है।

    तीसरा सवाल जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों के ध्वस्तीकरण विवाद का है। अंतरिम रोक के बाद संबंधित प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में जाती है, यह आगे महत्वपूर्ण रहेगा।

    चौथा सवाल राजनीतिक है। क्या विपक्ष का राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप स्वतंत्र जांच या न्यायिक प्रक्रिया में पुष्ट होता है, या ईडी की जांच से अलग तथ्य सामने आते हैं।

    आगे क्या होगा?

    अब नजर ईडी की जांच के अगले चरण पर होगी। तलाशी के दौरान मिले दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जांच की दिशा तय कर सकते हैं।

    जौहर यूनिवर्सिटी के 38 भवनों का विवाद भी अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगा। फिलहाल ध्वस्तीकरण पर मिली अंतरिम राहत को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।

    राजनीतिक स्तर पर सपा और कांग्रेस इस कार्रवाई को भाजपा सरकार की कथित प्रतिशोधात्मक राजनीति के उदाहरण के तौर पर पेश कर सकती हैं। भाजपा और राज्य प्रशासन का पक्ष इस रिपोर्ट में उपलब्ध सामग्री में विस्तार से दर्ज नहीं है, इसलिए उसके बारे में कोई अतिरिक्त दावा करना उचित नहीं होगा।

    संपादकीय निष्कर्ष

    आजम खान से जुड़े परिसरों पर ईडी की कार्रवाई ने उत्तर प्रदेश की सियासत में एक पुराने विवाद को नए कानूनी मोर्चे से जोड़ दिया है। एक तरफ एजेंसी की धनशोधन जांच है, दूसरी तरफ जौहर यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को लेकर प्रशासनिक विवाद और तीसरी तरफ विपक्ष के राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप हैं।

    इस मामले में निष्पक्ष निष्कर्ष के लिए राजनीतिक बयानों से ज्यादा जांच के दस्तावेज, आधिकारिक निष्कर्ष और अदालतों के फैसले महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल उपलब्ध तथ्य यह बताते हैं कि जांच जारी है और आजम खान तथा जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े विवाद का कानूनी अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है।


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    Asif Khan

    Asif Khan

    Shah Times Reporter

    शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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