भारत में शिक्षा पर सरकारी खर्च की तस्वीर मिश्रित है। UNESCO के उपलब्ध आंकड़ों में शिक्षा पर खर्च GDP के 4.1% के बराबर है, लेकिन कुल सार्वजनिक खर्च में इसकी हिस्सेदारी 14.2% है। वहीं secondary completion में lower secondary 86% और upper secondary 51% रही, जिससे access और retention पर सवाल कायम हैं।
📍 Location: New Delhi
📰 Date: 9 August 2026
✍️ Byline: Apurva Choudhary
शिक्षा खर्च में दिखी दोहरी तस्वीर
भारत में शिक्षा पर सरकारी खर्च को लेकर UNESCO की ताज़ा निगरानी एक ऐसी तस्वीर सामने रखती है जिसमें उपलब्धि और कमी दोनों साथ दिखाई देती हैं। एक तरफ शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च GDP के 4% वाले अंतरराष्ट्रीय benchmark से ऊपर है, वहीं कुल सरकारी खर्च में शिक्षा की हिस्सेदारी 15% के न्यूनतम benchmark से नीचे है।
UNESCO Institute for Statistics के भारत प्रोफाइल में शिक्षा पर सरकारी खर्च 2022 में GDP का 4.1% और कुल सरकारी खर्च का 14.2% दर्ज है। यानी GDP के पैमाने पर भारत न्यूनतम वैश्विक threshold पार करता है, लेकिन दूसरे प्रमुख पैमाने पर थोड़ा पीछे रह जाता है।
यहां एक जरूरी संपादकीय सावधानी भी है। इन आंकड़ों को 2026 का प्रत्यक्ष बजट अनुपात नहीं समझना चाहिए; उपलब्ध UNESCO डेटाबेस में इन दोनों वित्तीय आंकड़ों का संदर्भ वर्ष 2022 है। 2026 Scorecard का मकसद अलग-अलग वर्षों के उपलब्ध data के आधार पर SDG 4 commitments की प्रगति का आकलन करना है।
भारत शिक्षा बजट के दो benchmarks में कहां खड़ा है
Education 2030 framework के तहत UNESCO लंबे समय से दो प्रमुख वित्तीय benchmarks को ट्रैक करता है। देशों से शिक्षा पर कम से कम 4% GDP या कुल सार्वजनिक खर्च का 15% खर्च करने की अपेक्षा की जाती है। 2026 Scorecard में भी यही twin thresholds इस्तेमाल किए गए हैं।
भारत का 4.1% GDP वाला आंकड़ा पहले threshold को मामूली अंतर से पार करता है। लेकिन 14.2% public expenditure share 15% से 0.8 percentage point कम है। इसलिए भारत को वित्तीय तस्वीर में पूरी तरह benchmark-compliant कहना सही नहीं होगा।
भारत ने अपने राष्ट्रीय SDG 4 benchmarks इससे भी अधिक महत्वाकांक्षी रखे हैं। UNESCO के benchmark database में भारत ने 2025 और 2030 के लिए public education expenditure को कुल सरकारी खर्च का 17% और GDP का 6% रखने का लक्ष्य दर्ज किया है।
इस लिहाज से बहस केवल 15% की अंतरराष्ट्रीय न्यूनतम सीमा तक सीमित नहीं है। भारत का अपना राष्ट्रीय लक्ष्य 17% और 6% है, जिससे मौजूदा 14.2% और 4.1% के बीच का अंतर और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
2015 से बदली तस्वीर
UNESCO से जुड़े हालिया आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल सार्वजनिक खर्च में शिक्षा की हिस्सेदारी 2015 में लगभग 15.7% थी, जो उपलब्ध 2022 आंकड़े में घटकर 14.2% रह गई। यानी हिस्सेदारी में लगभग 1.5 percentage point की कमी दर्ज हुई।
इस बदलाव को केवल nominal budget allocation की कमी के रूप में पढ़ना सही नहीं होगा। किसी देश का कुल शिक्षा बजट बढ़ सकता है, लेकिन यदि सरकार का कुल खर्च उससे तेज गति से बढ़ता है तो शिक्षा की percentage share नीचे आ सकती है।
यही वजह है कि UNESCO का benchmark केवल रुपये या डॉलर की रकम नहीं देखता। वह यह भी देखता है कि सरकार अपने कुल सार्वजनिक संसाधनों में शिक्षा को कितनी प्राथमिकता दे रही है।
भारत शिक्षा बजट और स्कूल पूरा करने की चुनौती
पैसे की कहानी शिक्षा व्यवस्था के परिणामों से अलग नहीं की जा सकती। UNESCO और उससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय datasets में भारत की lower secondary completion rate 86% और upper secondary completion rate 51% दर्ज की गई है। ये आंकड़े 2021 के हैं और इसलिए इन्हें मौजूदा 2026 school-year outcome के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
UNESCO के Scorecard में भारत का 2015 lower secondary completion baseline 81% था और उपलब्ध latest value 86% रही। भारत का 2025 national benchmark 99% था। Upper secondary में 2015 का baseline 43%, latest value 51% और 2025 benchmark 84% था। दोनों स्तरों पर UNESCO ने भारत की progress को slow category में रखा।
यहां अंतर काफी बड़ा है। Lower secondary में 86% completion का मतलब यह नहीं कि व्यवस्था विफल है; 2015 के 81% से सुधार हुआ है। लेकिन 99% के राष्ट्रीय benchmark तक पहुंचने के लिए अभी substantial acceleration की जरूरत है।
Upper secondary की स्थिति और कठिन है। 51% completion का आंकड़ा बताता है कि secondary schooling के अंतिम चरण में लगभग आधे relevant age group के विद्यार्थियों के completion तक पहुंचने से पहले सिस्टम से बाहर हो जाने या देरी होने की चुनौती बनी हुई है।
खर्च बढ़ाना जरूरी, लेकिन अकेला समाधान नहीं
शिक्षा बजट बढ़ाने की मांग अपने आप में पर्याप्त policy prescription नहीं है। असल सवाल यह है कि अतिरिक्त संसाधन कहां और किस परिणाम के लिए खर्च किए जाएंगे।
स्कूलों की infrastructure जरूरतें, teacher availability, foundational learning, डिजिटल access, छात्राओं की retention, secondary schooling तक transition और economically disadvantaged परिवारों के लिए support—इन सभी क्षेत्रों की जरूरतें अलग हैं। केवल allocation बढ़ने से learning और completion अपने आप बेहतर नहीं होते।
UNESCO का 2026 Scorecard भी इसी broader picture पर जोर देता है। रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में education spending के मामले में देश 4% GDP और 15% public expenditure के twin thresholds से दूर जा रहे हैं, जबकि completion rates में progress असमान है।
इसका अर्थ यह है कि funding और outcomes के बीच एक मजबूत implementation chain जरूरी है। बजट, teacher deployment, school quality और student retention को अलग-अलग policy silos में देखने से अपेक्षित असर सीमित रह सकता है।
भारत की योजनाएं बड़े पैमाने पर पहुंच रही हैं
यह भी तथ्य है कि भारत का education policy architecture केवल budget allocation तक सीमित नहीं है। केंद्र की Samagra Shiksha scheme school education के pre-primary से senior secondary स्तर तक interventions को support करती है।
सरकारी दस्तावेज के अनुसार Samagra Shiksha का दायरा 11.6 लाख स्कूलों, 15.6 करोड़ से अधिक विद्यार्थियों और लगभग 57 लाख शिक्षकों तक है। योजना में infrastructure, foundational literacy and numeracy, inclusive education, teacher training, डिजिटल initiatives और vocational education जैसे components शामिल हैं।
इसी तरह PM-POSHAN school education और nutrition को जोड़ने वाला बड़ा programme है। सरकारी और संसदीय दस्तावेजों में इसकी coverage करीब 11.8 करोड़ विद्यार्थियों और 11.2 लाख स्कूलों की बताई गई है।
इसलिए UNESCO के spending data को यह निष्कर्ष निकालने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि भारत में education programmes पर निवेश नहीं हो रहा। असली सवाल spending की relative priority और उससे पैदा होने वाले measurable outcomes का है।
वैश्विक तस्वीर भी आसान नहीं
भारत की स्थिति को वैश्विक संदर्भ से काटकर देखना भी सही नहीं होगा। UNESCO के 2026 Scorecard में 205 देशों के लिए public education expenditure का विश्लेषण किया गया। उपलब्ध data वाले 172 देशों में केवल 34 देश दोनों—4% GDP और 15% total public expenditure—benchmarks को हासिल कर पाए।
इसका मतलब है कि education financing का दबाव केवल भारत की समस्या नहीं है। दुनिया भर में governments को defence, debt servicing, social protection, health, infrastructure और economic transition जैसे competing priorities के बीच संसाधनों का बंटवारा करना पड़ रहा है।
फिर भी अंतरराष्ट्रीय benchmark का महत्व खत्म नहीं होता। शिक्षा में कम निवेश का असर अक्सर तत्काल fiscal data में नहीं, बल्कि कई वर्षों बाद workforce quality, productivity, social mobility और inequality के रूप में सामने आता है।
क्या केवल GDP वाला आंकड़ा पर्याप्त है
भारत के मामले में 4.1% GDP figure देखने पर तस्वीर अपेक्षाकृत सकारात्मक लग सकती है। लेकिन public expenditure share 14.2% होने पर सवाल बदल जाता है।
GDP education spending की economy के आकार के मुकाबले स्थिति बताता है। वहीं total public expenditure share यह संकेत देता है कि सरकार अपने उपलब्ध fiscal resources में शिक्षा को कितनी प्राथमिकता दे रही है।
दोनों indicators इसलिए जरूरी हैं। यदि GDP तेजी से बढ़ रहा हो और शिक्षा spending भी बढ़ रही हो, फिर भी education का public expenditure share घट सकता है। ऐसी स्थिति में nominal growth और policy priority अलग-अलग narratives पेश कर सकते हैं।
Completion rate को भी सही संदर्भ में पढ़ना होगा
स्कूल completion की दर को dropout का सीधा पर्याय मानना भी सावधानी के बिना सही नहीं है। UNESCO completion rate की गणना एक निर्धारित methodology के तहत करता है और इसमें late completion को समझने के लिए age-based estimates का इस्तेमाल होता है।
इसलिए 51% upper secondary completion को यह कहकर पेश करना कि बाकी 49% बच्चे निश्चित रूप से school dropout हैं, डेटा की सीमा से आगे जाना होगा। कुछ विद्यार्थी देर से completion कर सकते हैं, education pathways बदल सकते हैं या अलग प्रकार की schooling में जा सकते हैं।
लेकिन यह caveat भी मूल समस्या को खत्म नहीं करता। 51% का completion level और 84% का national benchmark एक बड़ा gap दिखाते हैं। नीति के लिए यही gap अधिक महत्वपूर्ण है।
आगे की नीति में क्या बदलना होगा
भारत के सामने अब challenge केवल education budget को बढ़ाने का नहीं, बल्कि expenditure quality और accountability को मजबूत करने का है। अतिरिक्त funding को उन क्षेत्रों में ज्यादा targeted करना होगा जहां completion और learning में सबसे ज्यादा bottlenecks हैं।
Secondary education इस debate का केंद्रीय हिस्सा होना चाहिए। Primary access में सुधार के बाद बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि विद्यार्थी lower और upper secondary स्तर तक पहुंचें, पढ़ाई जारी रखें और meaningful completion हासिल करें।
इसके साथ teacher vacancies, classroom quality, learning assessment और disadvantaged students के लिए targeted support को expenditure planning से जोड़ना होगा। अगर budget allocation और measurable education outcomes के बीच स्पष्ट linkage बनेगा, तभी बढ़ा हुआ खर्च public value में बदल पाएगा।
भारत शिक्षा बजट के लिए असली सवाल
UNESCO के आंकड़े भारत की शिक्षा व्यवस्था को न तो पूरी तरह नाकाम बताते हैं और न ही संतोषजनक स्थिति की पुष्टि करते हैं। तस्वीर मिश्रित है—GDP के मुकाबले शिक्षा spending 4% threshold से ऊपर है, लेकिन total public expenditure में 14.2% share 15% benchmark से नीचे है। वहीं भारत का अपना national benchmark 6% GDP और 17% public expenditure share का है।
दूसरी तरफ school completion में lower secondary स्तर पर 86% और upper secondary में 51% की उपलब्ध दरें यह बताती हैं कि access के बाद retention और completion की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। खासकर upper secondary level पर gap काफी बड़ा है।
आने वाले वर्षों में शिक्षा नीति की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि बजट कितना बढ़ा। असली कसौटी यह होगी कि उस खर्च से कितने बच्चे स्कूल में टिके, कितनों ने secondary education पूरी की, learning outcomes कितने बेहतर हुए और disadvantaged विद्यार्थियों के बीच gaps कितने घटे।
भारत के लिए UNESCO का संदेश इसलिए सिर्फ “और खर्च कीजिए” नहीं है। ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि शिक्षा को सार्वजनिक खर्च में कितनी प्राथमिकता दी जाती है और उस प्राथमिकता का असर कक्षा तक कितना पहुंचता है। यही वह बिंदु है जहां बजट की रकम एक वास्तविक education reform में बदलती है।