इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने कहा कि गाजा से फिलिस्तीनियों को हटाने की योजना खत्म नहीं हुई है। उनके मुताबिक ट्रंप ने इसे सिर्फ फ्रीज़ किया है और इजरायल तैयार है।
तेल अवीव/गाजा | 3 सितंबर 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
गाजा को लेकर इजरायल और अमेरिका की नीति पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने कहा है कि गाजा से फिलिस्तीनियों को हटाने की योजना अभी भी चर्चा में है। उनके मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस योजना को रद्द नहीं किया है, बल्कि फिलहाल “फ्रीज़” किया हुआ है।
काट्ज़ ने यह टिप्पणी 2 सितंबर को यनेट और यदीओत अहरोनोत द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में की।
काट्ज़ के मुताबिक गाजा के संकट का “अंत में कोई वास्तविक समाधान” फिलिस्तीनियों के क्षेत्र से बाहर जाने के बिना नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि इजरायल सरकार उन्हें बाहर ले जाने के लिए तैयार है और इसके लिए समुद्र, हवा तथा दूसरे रास्तों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब गाजा के भविष्य, युद्धविराम और युद्ध के बाद के प्रशासन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बातचीत चल रही है।
काट्ज़ ने यह भी कहा कि योजना अभी चर्चा से बाहर नहीं हुई है।
काट्ज़ का कहना है कि ट्रंप ने फिलिस्तीनियों के बड़े पैमाने पर स्थानांतरण की योजना को पूरी तरह खत्म नहीं किया है।
उनके मुताबिक अमेरिका को उन देशों के लिए समर्थन देना होगा जो फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने के लिए तैयार हों। उन्होंने कहा कि जब तक ऐसा समर्थन और संभावित गंतव्य तय नहीं होते, योजना आगे नहीं बढ़ सकती।
यहां एक महत्वपूर्ण संपादकीय सावधानी जरूरी है।
ट्रंप प्रशासन की मौजूदा स्थिति की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है कि वह काट्ज़ द्वारा बताए गए रूप में योजना को अभी भी सक्रिय विकल्प मानता है। इसलिए इसे “अमेरिका ने योजना मंजूर कर दी” के तौर पर पेश करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
काट्ज़ ने सम्मेलन में दावा किया कि गाजा के करीब 80 प्रतिशत लोग वहां से बाहर जाना चाहते हैं।
लेकिन उन्होंने इस आंकड़े के समर्थन में कोई सार्वजनिक सर्वेक्षण या स्वतंत्र शोध उपलब्ध नहीं कराया। टाइम्स ऑफ इजरायल ने भी इसे काट्ज़ द्वारा
बताए गए दावे के रूप में रिपोर्ट किया है।
इसलिए इस संख्या को स्वतंत्र रूप से सत्यापित आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा।
गाजा में बड़े पैमाने पर विस्थापन पहले ही हो चुका है। लेकिन युद्ध, तबाही और असुरक्षा के बीच लोगों का सुरक्षित स्थान की तलाश करना और स्थायी रूप से अपनी जमीन छोड़ने की इच्छा रखना दो अलग-अलग बातें हैं।
गाजा से फिलिस्तीनियों के बाहर जाने के मुद्दे पर सबसे बड़ा विवाद शब्दों को लेकर है।
इजरायल के कुछ अधिकारी इसे “वॉलंटरी माइग्रेशन” यानी स्वैच्छिक पलायन के रूप में पेश करते रहे हैं।
दूसरी तरफ मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी आबादी को युद्ध, प्रतिबंधों या असहनीय जीवन परिस्थितियों के बीच अपना क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है, तो उसे केवल “स्वैच्छिक” कहना पर्याप्त नहीं है।
यही वजह है कि प्रस्ताव को लेकर “फोर्स्ड डिस्प्लेसमेंट” और “एथनिक क्लीनजिंग” जैसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय कानूनी और राजनीतिक शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं।
नागरिक आबादी के जबरन स्थानांतरण पर अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून में गंभीर प्रतिबंध हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, कब्जे वाले क्षेत्र से नागरिकों का जबरन विस्थापन जिनेवा कन्वेंशंस के तहत युद्ध अपराध माना जा सकता है।
हालांकि किसी विशेष योजना या कार्रवाई को कानूनी तौर पर किस श्रेणी में रखा जाएगा, इसका निर्धारण उसके वास्तविक स्वरूप, परिस्थितियों और उपलब्ध कानूनी तथ्यों पर निर्भर करता है।
इसलिए खबर में यह कहना अधिक सटीक है कि मानवाधिकार समूह और कानूनी विशेषज्ञ ऐसी नीति को संभावित जबरन विस्थापन या जातीय सफाए के रूप में देखते हैं, बजाय इसके कि किसी विशिष्ट प्रस्ताव पर अंतिम कानूनी फैसला घोषित कर दिया जाए।
फिलिस्तीनियों के बड़े पैमाने पर स्थानांतरण का विचार पहली बार केवल काट्ज़ के बयान से सामने नहीं आया।
2025 की शुरुआत में ट्रंप ने गाजा के करीब 20 लाख फिलिस्तीनियों को दूसरे देशों में स्थानांतरित करने और गाजा के पुनर्विकास की योजना का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था।
उस प्रस्ताव को अरब देशों और फिलिस्तीनियों सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया मिली। बाद में ट्रंप प्रशासन की प्रस्तावित 20-सूत्रीय योजना में जबरन विस्थापन को शामिल नहीं किया गया था।
यही कारण है कि काट्ज़ का नया बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह संकेत देता है कि कम से कम इजरायली सरकार के भीतर कुछ प्रभावशाली आवाजें इस विचार को अभी भी भविष्य के विकल्प के रूप में देख रही हैं।
गाजा की भौगोलिक स्थिति इस पूरी बहस को और जटिल बनाती है।
गाजा की सीमा मिस्र से लगती है और बड़े पैमाने पर फिलिस्तीनियों को बाहर ले जाने की किसी भी योजना में मिस्र की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
लेकिन मिस्र लंबे समय से स्थायी तौर पर फिलिस्तीनियों को गाजा से बाहर स्थानांतरित करने वाली किसी व्यवस्था का विरोध करता रहा है।
काट्ज़ ने भी स्वीकार किया कि मिस्र फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने का विकल्प नहीं है और दूसरे देशों को अमेरिकी समर्थन की जरूरत होगी।
यानी सिर्फ इजरायल की तैयारी से ऐसी योजना लागू नहीं हो सकती।
इसके लिए दूसरे देशों की सहमति और व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की जरूरत होगी।
गाजा युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी अपने घरों से विस्थापित हुए हैं।
युद्ध के अलग-अलग चरणों में लोगों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने के निर्देश दिए गए। कई परिवारों ने कई बार अपना स्थान बदला।
यही पृष्ठभूमि “स्वैच्छिक पलायन” की बहस को और संवेदनशील बनाती है।
अगर किसी आबादी के पास सुरक्षित आवास, भोजन, स्वास्थ्य सेवा और सामान्य जीवन की परिस्थितियां नहीं हैं, तो उसके किसी क्षेत्र से बाहर जाने के
फैसले को पूरी तरह स्वतंत्र निर्णय मानना अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के लिए गंभीर सवाल पैदा करता है।
काट्ज़ के बयान के साथ ही प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मौजूदा नीति भी चर्चा में है।
द टाइम्स ऑफ इजरायल के मुताबिक काट्ज़ की टिप्पणी के उसी समय नेतन्याहू ने गाजा के भीतर एक इजरायली सैन्य चौकी का दौरा किया और
कहा कि इजरायल की सेना मौजूदा कब्जे वाले इलाकों से पीछे हटने की योजना नहीं बना रही है।
इससे गाजा के भविष्य को लेकर एक और सवाल उठता है।
क्या इजरायल सीमित सैन्य नियंत्रण चाहता है, स्थायी सुरक्षा उपस्थिति चाहता है या गाजा की जनसांख्यिकी को बदलने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता
है?
इन तीनों विकल्पों के राजनीतिक और कानूनी परिणाम अलग-अलग होंगे।
काट्ज़ के बयान के बावजूद इस योजना के सामने कई व्यावहारिक अड़चनें हैं।
सबसे पहली बाधा यह है कि फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने के लिए कौन से देश तैयार होंगे।
दूसरी बाधा अमेरिका की वास्तविक नीति है।
तीसरी बाधा मिस्र और दूसरे अरब देशों का रुख है।
चौथी बाधा अंतरराष्ट्रीय कानून और संभावित कानूनी कार्रवाई है।
और सबसे महत्वपूर्ण बाधा खुद फिलिस्तीनियों की प्रतिक्रिया होगी, क्योंकि गाजा को वे अपनी राष्ट्रीय भूमि का हिस्सा मानते हैं।
यह संभावना भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती।
इजरायल में गाजा के भविष्य को लेकर सरकार और उसके दक्षिणपंथी सहयोगियों के भीतर अलग-अलग विचार मौजूद हैं। कुछ नेता गाजा में स्थायी इजरायली नियंत्रण या पुनर्वास की वकालत करते रहे हैं, जबकि अन्य मौजूदा अंतरराष्ट्रीय समझौतों के भीतर सुरक्षा व्यवस्था पर जोर देते हैं।
इसलिए काट्ज़ का बयान इजरायल सरकार की पूरी नीति का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता।
लेकिन यह जरूर दिखाता है कि गाजा से बड़े पैमाने पर फिलिस्तीनियों के स्थानांतरण का विचार इजरायली राजनीतिक विमर्श से पूरी तरह गायब नहीं
हुआ है।
अगर काट्ज़ की बात सही है कि इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका की मंजूरी जरूरी है, तो अगला बड़ा सवाल वॉशिंगटन की स्थिति का है।
अमेरिका इजरायल का प्रमुख रणनीतिक सहयोगी है।
लेकिन गाजा के स्थायी विस्थापन की किसी भी योजना को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी विरोध का सामना करना पड़ेगा।
इसलिए ट्रंप प्रशासन के लिए भी यह फैसला केवल इजरायल-अमेरिका संबंधों का मुद्दा नहीं होगा। इसमें मिस्र, जॉर्डन, खाड़ी देश, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र सहित कई पक्षों की प्रतिक्रिया शामिल होगी।
गाजा के आम नागरिकों के लिए यह बहस बेहद संवेदनशील है।
वर्षों के संघर्ष, विस्थापन और तबाही के बाद स्थायी रूप से क्षेत्र छोड़ने का प्रस्ताव उनके लिए केवल आवास बदलने का सवाल नहीं है।
यह जमीन, वापसी के अधिकार, राष्ट्रीय पहचान और भविष्य की फिलिस्तीनी राज्य की मांग से जुड़ा मामला है।
इसी वजह से गाजा से आबादी के बड़े पैमाने पर स्थानांतरण की किसी भी योजना पर फिलिस्तीनी नेतृत्व और नागरिक समाज की प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होगी।
इजरायली रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ का नया बयान गाजा के भविष्य पर चल रही बहस को फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ले आया है।
काट्ज़ का दावा है कि फिलिस्तीनियों को गाजा से बाहर ले जाने की योजना खत्म नहीं हुई है। उनके मुताबिक ट्रंप ने इसे केवल रोक रखा है और अमेरिका की मंजूरी मिलने पर इजरायल इसे लागू करने के लिए तैयार है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।